उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित यूपी पीसीएस प्रारंभिक परीक्षा 2024 राज्य की सबसे महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक है। परीक्षा के बाद अभ्यर्थियों द्वारा सबसे अधिक खोजा जाने वाला विषय होता है –
“यूपी पीसीएस प्रारंभिक परीक्षा 2024 प्रश्न पत्र हिंदी में हल सहित”।
हम आपके लिए यूपी पीसीएस प्रारंभिक परीक्षा 2024 का संपूर्ण प्रश्न पत्र हिंदी भाषा में, सभी प्रश्नों के सही उत्तर तथा सरल एवं विस्तृत व्याख्या के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं।
- बेकिंग सोडा का सूत्र है:
(a) NaHCO₃
(b) K₂CO₃
(c) KHCO₃
(d) Na₂CO₃
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- बेकिंग सोडा (सोडियम बाइकार्बोनेट, NaHCO₃) एक सफेद, क्रिस्टलीय पाउडर है जिसका मुख्य उपयोग खाद्य पदार्थों को फुलाने में होता है। यह अम्लीय पदार्थों—नींबू का रस, दही, सिरका आदि—के साथ प्रतिक्रिया कर कार्बन डाइऑक्साइड गैस उत्पन्न करता है, जिससे केक और अन्य बेक्ड वस्तुएँ हल्की व फूली बनती हैं। यह एक प्रभावी सफाई सामग्री है और सिंक, बर्तन, रेफ्रिजरेटर तथा बाथरूम की सफाई में उपयोग किया जाता है। यह गंधनाशक के रूप में भी बदबू दूर करने में सहायक है। स्वास्थ्य में यह एंटासिड की तरह पेट की अम्लता कम करने और कीड़े के काटने पर खुजली से राहत देने में उपयोग किया जाता है, परंतु अधिक सोडियम होने के कारण इसका सेवन सीमित मात्रा में ही उचित है।
- पोटैशियम कार्बोनेट (K₂CO₃), जिसे पोटाश या पर्ल ऐश भी कहा जाता है, एक सफेद, गंधहीन, पानी में अत्यधिक घुलनशील और अत्यधिक क्षारीय अकार्बनिक नमक है। यह हवा से नमी सोखने वाला (आर्द्रताग्राही) पदार्थ है और त्वचा व आँखों में जलन पैदा कर सकता है, इसलिए इसे सावधानीपूर्वक संभालना आवश्यक है। पानी में घुलने पर यह अत्यधिक क्षारीय घोल बनाता है, जबकि इथेनॉल में अघुलनशील रहता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण उपयोग कांच निर्माण, विशेषकर ऑप्टिकल कांच में होता है। इसके अलावा यह साबुन और डिटर्जेंट बनाने, खाद्य उद्योग में कोको पाउडर के प्रसंस्करण तथा बुदबुदाती गोलियों में, कृषि में उर्वरकों और रसायनों में, तथा प्रयोगशालाओं में सुखाने वाले एजेंट के रूप में प्रयोग किया जाता है।
- पोटेशियम बाइकार्बोनेट (KHCO₃), जिसे पोटेशियम हाइड्रोजन कार्बोनेट भी कहा जाता है, एक सफेद, गंधहीन और क्रिस्टलीय ठोस है जो हल्का क्षारीय होता है तथा विभिन्न रासायनिक एवं औद्योगिक प्रक्रियाओं में बफरिंग एजेंट के रूप में उपयोग किया जाता है। यह सोडियम बाइकार्बोनेट जैसा ही है, लेकिन इसमें सोडियम के स्थान पर पोटाशियम होता है। खाद्य पदार्थों में इसे बेकिंग सोडा के विकल्प के रूप में लीविंग एजेंट की तरह प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त यह तरल पदार्थों के pH नियंत्रण, कृषि में बीज उपचार, रासायनिक संश्लेषण और चिकित्सा के कुछ उपयोगों में महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका आईयूपीएसी नाम पोटेशियम हाइड्रोजनकार्बोनेट है।
- सोडियम कार्बोनेट (Na₂CO₃), जिसे सोडा ऐश या धावन सोडा भी कहा जाता है, एक सफेद, गंधहीन और पानी में घुलनशील अकार्बनिक रसायन है। यह पानी में घुलकर क्षारीय घोल बनाता है और घरेलू तथा औद्योगिक दोनों प्रकार के उपयोगों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है। इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन सोल्वे प्रक्रिया द्वारा साधारण नमक और चूना पत्थर से किया जाता है। यह पदार्थ कपड़े धोने और पानी की कठोरता कम करने में सहायक होता है, इसलिए इसे डिटर्जेंट और घरेलू सफाई में आमतौर पर इस्तेमाल किया जाता है। उद्योगों में इसका उपयोग कांच, साबुन, डिटर्जेंट, कागज, कपड़ा निर्माण और जल उपचार जैसी प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्वरूप की दृष्टि से यह सफेद पाउडर या दानेदार ठोस के रूप में पाया जाता है और क्षारीय प्रकृति के कारण इसकी pH लगभग 11 होती है।
- इसलिए, बेकिंग सोडा का सही सूत्र NaHCO₃ है।
- CPR (सीपीआर) का मतलब है:
(a) कार्डियोपल्मोनरी संशोधन
(b) कार्डियोपल्मोनरी पुनर्जीवन
(c) कार्डियो प्रोग्राम बचाव
(d) कार्डियक पल्सेटाइल संशोधन
उत्तर: (b)
व्याख्या:
सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी पुनर्जीवन) एक आपातकालीन जीवन-रक्षक प्रक्रिया है, जिसे तब किया जाता है जब व्यक्ति बेहोश हो, सांस न ले रहा हो या हृदय रुक गया हो। इसका उद्देश्य छाती पर तेज़ और गहरे दबाव (और प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा बचाव श्वास) देकर शरीर में ऑक्सीजनयुक्त रक्त का प्रवाह बनाए रखना है, ताकि चिकित्सकीय सहायता पहुँचने तक मस्तिष्क और महत्वपूर्ण अंग सुरक्षित रहें। अप्रशिक्षित लोगों द्वारा केवल छाती दबाव देना पर्याप्त है, जबकि प्रशिक्षित व्यक्ति 30 दबाव : 2 श्वास के चक्र का पालन करते हैं। सीपीआर में छाती पर दबाव स्टर्नम (छाती के मध्य स्थित हड्डी) के निचले हिस्से पर दिया जाता है। दबाव देने से हृदय और फेफड़ों पर बल पड़ता है, और दबाव हटाते ही छाती अपनी सामान्य स्थिति में लौट आती है। रेस्क्यू ब्रीथ देते समय पीड़ित की नाक बंद करके मुँह-से-मुँह हवा फूंकी जाती है, जिससे फेफड़े हवा से भरते हैं और छाती ऊपर उठती है तथा वक्ष गुहा में दबाव बढ़ता है। सामान्य सीपीआर व्यक्ति को पीठ के बल (सुपाइन स्थिति) लिटाकर किया जाता है, जबकि प्रोन सीपीआर उस स्थिति में किया जाता है जब व्यक्ति पेट के बल (प्रोन स्थिति) लेटा हो। इसमें सिर को एक ओर मोड़कर पीठ पर दबाव देकर छाती संकुचित की जाती है। सिर के एक ओर रहने से उलटी होने या उसके फेफड़ों में जाने (ऐस्पिरेशन) जैसी जटिलताओं का जोखिम कम हो सकता है।
- वह एकमात्र शिरा जो ऑक्सीजन युक्त रक्त वहन करती है, कहलाती है :
(a) हिपेटिक पोर्टल शिरा
(b) कार्डियक शिरा
(c) पल्मोनरी शिरा
(d) सिस्टिक शिरा
उत्तर: (c)
व्याख्या:
मानव परिसंचरण तंत्र में धमनियाँ और शिराएँ रक्त को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाने और वहाँ से लौटाने का मूल कार्य करती हैं। ये दोनों प्रकार की रक्त वाहिकाएँ संरचना, कार्य और रक्त के प्रकार—तीनों दृष्टियों से एक-दूसरे से भिन्न होती हैं, फिर भी दोनों मिलकर हृदय तथा शरीर के ऊतकों के बीच निरंतर और संतुलित रक्त प्रवाह सुनिश्चित करती हैं।
धमनियाँ (Arteries):
- धमनियाँ वे रक्त वाहिकाएँ हैं जो हृदय से रक्त को शरीर के विभिन्न अंगों तक ले जाती हैं।
- रक्त का प्रकार: अधिकांश धमनियाँ ऑक्सीजन-युक्त रक्त वहन करती हैं (अपवाद: फुफ्फुसीय धमनी)।
- भित्तियाँ : मोटी, मांसल और लोचदार होती हैं ताकि हृदय से निकलने वाले उच्च दाब को सह सकें।
- धड़कन: धमनियों में रक्त प्रवाह तेज होता है और इनमें नाड़ी महसूस की जा सकती है।
- मुख्य भूमिका: शरीर के ऊतकों तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुँचाना।
शिराएँ (Veins)
- शिराएँ वे रक्त वाहिकाएँ हैं जो शरीर से रक्त को पुनः हृदय की ओर लाती हैं।
- रक्त का प्रकार: अधिकांश शिराएँ ऑक्सीजन-रहित रक्त वहन करती हैं (अपवाद: फुफ्फुसीय शिरा)।
- भित्तियाँ: धमनियों की तुलना में पतली तथा कम लोचदार होती हैं क्योंकि इनमें रक्त दाब कम होता है।
- वाल्व: अधिकांश शिराओं में एकतरफा वाल्व होते हैं जो रक्त के उल्टे प्रवाह को रोकते हैं, विशेषकर पैरों से हृदय की ओर लौटते समय।
- मुख्य भूमिका: ऊतकों से अपशिष्ट (CO₂ एवं अन्य पदार्थ) लेकर हृदय तक वापस पहुँचाना।
सामान्यतः शरीर की सभी शिराएँ ऑक्सीजन-रहित रक्त को हृदय की ओर ले जाती हैं, लेकिन फुफ्फुसीय शिरा (पल्मोनरी शिरा) इसका महत्वपूर्ण अपवाद है। यह एकमात्र शिरा है जो ऑक्सीजन-युक्त रक्त को फेफड़ों से हृदय के बाएँ अलिंद तक पहुँचाती है।
मुख्य कार्य
- फुफ्फुसीय शिरा का प्रमुख कार्य गैस-विनिमय के बाद फेफड़ों में ऑक्सीजन से भर चुके रक्त को हृदय तक वापस लाना है, ताकि हृदय उसे पूरे शरीर में पंप कर सके।
अपवाद
- जहाँ सामान्य शिराएँ (जैसे वेना कावा) शरीर के विभिन्न भागों से ऑक्सीजन-रहित रक्त हृदय तक लाती हैं, वहीं फुफ्फुसीय शिरा अपनी संरचना तो शिरा जैसी ही रखती है, परंतु रक्त धमनी जैसा—ऑक्सीजन युक्त वहन करती है। इसी कारण यह परिसंचरण तंत्र में एक विशिष्ट और अपवादात्मक शिरा मानी जाती है।
- मधुमेह जो कि एक बहुत ही सामान्य विकार है, संबंधित होता है:
(a) अग्न्याशय
(b) यकृत
(c) वृक्क से
(d) पित्ताशय
उत्तर: (a)
व्याख्या:
मधुमेह एक दीर्घकालिक (क्रॉनिक) चयापचय विकार है, जिसमें इंसुलिन के अभाव, कमी या उसकी कार्यक्षमता घट जाने के कारण रक्त में ग्लूकोज़ का स्तर असामान्य रूप से बढ़ जाता है। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब अग्न्याशय पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन का निर्माण नहीं कर पाता, या फिर शरीर की कोशिकाएँ उपलब्ध इंसुलिन का प्रभावी रूप से उपयोग नहीं कर पातीं। परिणामस्वरूप, रक्त शर्करा नियंत्रित नहीं रह पाती और मधुमेह विकसित हो जाता है।
मुख्य प्रकार:
- टाइप–1 मधुमेह: शरीर इंसुलिन बनाना बंद कर देता है; आमतौर पर बचपन में शुरू; जीवनभर इंसुलिन आवश्यक।
- टाइप–2 मधुमेह: सबसे सामान्य प्रकार; शरीर इंसुलिन का प्रभावी उपयोग नहीं कर पाता; मोटापा, निष्क्रियता व अनुवांशिकता इसके प्रमुख कारण; उपचार में जीवनशैली सुधार, दवाएँ और आवश्यकता पर इंसुलिन।
- गर्भकालीन मधुमेह: गर्भावस्था में होता है; बाद में प्रायः ठीक, पर भविष्य में टाइप–2 का जोखिम बढ़ाता है।
सामान्य लक्षण: अत्यधिक प्यास, बार-बार पेशाब, भूख, थकान, वजन में परिवर्तन, घाव देर से भरना और दृष्टि धुंधली होना।
संभावित जटिलताएँ: हृदय रोग, स्ट्रोक, किडनी क्षति, नसों की खराबी, आंखों को नुकसान और पैरों में संक्रमण या अल्सर जैसी गंभीर समस्याएँ।
नियंत्रण एवं रोकथाम: संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण, मीठे व परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट का कम सेवन, नियमित रक्त शर्करा जांच (FBS, HbA1c), चिकित्सा परामर्श और दवाओं/इंसुलिन का उचित उपयोग।
- हाल ही में कोविड-19 महामारी के कारण वैश्विक विराम का कारण है।
(a) MERS-CoV-2
(b) SARS-CoV-2
(c) SARS-CoV-1
(d) H5N1
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- हाल ही में फैली महामारी का कारण गंभीर सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोनावायरस 2 (सार्स-कोव-2) था, जिसे संक्षेप में कोविड-19 के लिए जिम्मेदार वायरस कहा जाता है। यह रोग सबसे पहले दिसंबर 2019 में चीन के वुहान नगर में प्रकट हुआ और बाद में पूरे विश्व में फैलकर व्यापक बंदी तथा वैश्विक ठहराव का कारण बना।
- मर्स-कोव-2: इस नाम का कोई स्वीकृत या प्रचलित वायरस नहीं है। सही नाम मध्य–पूर्व श्वसन सिंड्रोम कोरोनावायरस (मर्स-कोव) है, जो वर्ष 2012 में मध्य–पूर्व क्षेत्र में फैला था। इसकी मृत्यु–दर अधिक थी, परंतु संक्रमण सीमित रहा और यह वैश्विक महामारी नहीं बना।
- सार्स-कोव-1: यह वायरस वर्ष 2002–2003 में फैली गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम (सार्स) बीमारी का कारण था। यह भी कोरोनावायरस परिवार का सदस्य है, परंतु इसका संक्रमण बहुत सीमित था और विश्व–व्यापी महामारी नहीं बनी।
- एच5एन1: यह एक एवियन इन्फ्लुएंजा (पक्षी ज्वर) का वायरस है, जिसे आम बोलचाल में बर्ड फ्लू कहा जाता है। यह मुख्यतः पक्षियों में मिलता है और मनुष्यों में बहुत कम तथा सीमित संक्रमण करता है। इसका कोविड-19 से कोई संबंध नहीं है।
- एक बस एक निश्चित दूरी की पहली आधी दूरी V1गति से पूरा करती है तथा अन्य आधी दूरी V2 गति से पूरा करती है। पूरी यात्रा में बस की औसत गति क्या होगी?
उत्तर:d
व्याख्या:
- मान लीजिए, कुल दूरी D है।
- पहली आधी दूरी D/2 तय की जाती है गति V1 से।
- दूसरी आधी दूरी D/2 तय की जाती है गति V2 से।
- अब, समय निकालने के लिए:
- पहली आधी दूरी का समय = D/2/V1=D/2V1
- दूसरी आधी दूरी का समय = D/2/V2=D/2V2
कुल समय = D/2 V1+D/2V2 –D×(1/2 V1+1/2V2 )
कुल दूरी = D
अब औसत गति = कुल दूरी/कुल समय= D/D×(1/2 V1+1/2V2 )
अत:
औसत गति= 2× V1×V2 2/ V1+V2
उत्तर:
कुल यात्रा के दौरान औसत गति है: 2×V1×V2 / V1+V2
- भूमि पर रहने वाले पौधे और जानवर क्या कहलाते हैं?
(a) जैविक
(b) स्थलीय निवासी
(c) अजैविक
(d) जलीय निवासी
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- भूमि पर रहने वाले पौधे और जानवर स्थलीय निवासी कहलाते हैं। ये ऐसे जीव होते हैं जो अपना जीवन मुख्य रूप से धरती की सतह पर बिताते हैं और जिनकी संरचना, शारीरिक प्रक्रियाएँ तथा जीवन-शैली स्थलीय पर्यावरण के अनुसार अनुकूलित होती हैं। इन जीवों में साँस लेने, चलने-फिरने, भोजन प्राप्त करने, तापमान सहने और प्रजनन करने जैसी क्रियाएँ भूमि पर ही संपन्न होती हैं। स्थलीय जीवों के उदाहरणों में शेर, बाघ, हाथी, घोड़ा, कुत्ता, बिल्ली, साँप, कीड़े-मकोड़े, पेड़-पौधे, झाड़ियाँ, घास आदि शामिल हैं। पौधों में जड़ें मिट्टी से पानी और पोषक तत्व ग्रहण करती हैं, जबकि जानवर भूमि पर उपलब्ध भोजन, आश्रय और अनुकूल पर्यावरण पर निर्भर रहते हैं।
- जलीय निवासी वे जीव होते हैं जो अपना पूरा या अधिकांश जीवन पानी में बिताते हैं और मीठे तथा खारे दोनों जल में पाए जाते हैं। इनमें सूक्ष्मजीव, शैवाल, जलीय पौधे, मछलियाँ, केकड़े, जेलीफ़िश, कछुए, डॉल्फ़िन और व्हेल जैसे स्तनधारी शामिल हैं। इनके शरीर और व्यवहार—जैसे गलफड़े, तैरने की क्षमता तथा जल दाब सहने की संरचना—उन्हें जल-जीवन के अनुकूल बनाते हैं। इन्हें प्लैंकटन, नेकटन और बेन्थोस जैसे समूहों में वर्गीकृत किया जाता है। जलीय निवासी पारिस्थितिक संतुलन, खाद्य श्रृंखला और मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव गंगा डॉल्फ़िन है।
- जैविक घटक पारिस्थितिकी तंत्र के सभी जीवित प्राणी—जैसे पौधे, जानवर, कवक, बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीव—हैं, जो ऊर्जा प्रवाह और पोषक चक्रण में मुख्य भूमिका निभाते हैं। इसके विपरीत, अजैविक घटक निर्जीव तत्व—जल, वायु, मिट्टी, तापमान, सूर्य का प्रकाश, आर्द्रता, pH और लवणता—हैं, जो जीवों के जीवन, वितरण और वृद्धि को नियंत्रित करते हैं।
- जैविक और अजैविक दोनों घटक एक-दूसरे पर आश्रित होते हैं, और इनकी परस्पर क्रिया से ही कोई पारिस्थितिकी तंत्र कार्यशील और संतुलित रहता है।
- वह जोड़ जहाँ गर्दन सिर से मिलती है:
(a) बॉल और सॉकेट जोड़
(b) हिंज जोड़
(c) पिवटल जोड़
(d) सैडल जोड़
उत्तर: ( c )
व्याख्या:
- गर्दन और सिर के बीच जो जोड़ पाया जाता है उसे घूर्णन जोड़ (पिवटल जोड़) कहा जाता है। यह जोड़ पहले और दूसरे ग्रीवा कशेरुक—ऐटलस (प्रथम कशेरुक) और एक्सिस (द्वितीय कशेरुक)—के बीच बनता है। एक्सिस की दन्ताकार आकृति प्रथम कशेरुक के भीतर फिट होकर सिर को दाएँ-बाएँ घुमाने की क्षमता प्रदान करती है। इसी कारण हम ना में सिर हिला पाते हैं। यह जोड़ मुख्यतः घूर्णन गति के लिए उपयुक्त होता है।
- कंदुक खल्लिका संधि या बॉल और सॉकेट जोड़ कंधे और कूल्हे में पाया जाता है, इसमें एक हड्डी का गोल सिर दूसरी हड्डी के गहरे गड्ढे जैसे भाग में बैठता है। यह जोड़ शरीर को बहु-दिशात्मक गति की क्षमता देता है, जैसे उठाना, घुमाना, आदि।
- हिंज जोड़ या घुटने और कोहनी में पाया जाने वाला जोड़ किवाड़ की तरह कार्य करता है। इसमें हड्डियाँ केवल आगे-पीछे मोड़ने और सीधा करने की अनुमति देती हैं, इसलिए इसे किवाड़ी जोड़ भी कहा जाता है।
- सैडल जोड़ या अंगूठे के आधार पर पाया जाने वाला जोड़ काठी जैसी संरचना बनाकर दो हड्डियों के बीच जुड़ता है। यह जोड़ अंगूठे को अधिक लचीला बनाता है और उसे अन्य उंगलियों के सामने लाने की क्षमता देता है, जिससे पकड़ मजबूत और नियंत्रण अधिक प्रभावी होता है।
मानव शरीर की प्रमुख संधियाँ/जोड़:
| क्रम | संधि का प्रकार (संरचना/प्रकृति) | उपप्रकार | हिन्दी नाम | स्थान/उदाहरण | प्रमुख गतियाँ |
| 1 | तन्तुमय संधि | – | स्थिर संधि | खोपड़ी की स्यूचर, टिबिया–फिबुला का संयोजन | अत्यल्प या बिना गति |
| 2 | उपास्थिमय संधि (कार्टिलेज संधि) | – | अर्ध-गतिशील संधि | प्रथम पसली–उरोस्थि संधि, कशेरुकाओं के बीच | सीमित गति, झुकना |
| 3 | साइनोवियल संधि | पिवटल | घूर्णन संधि | गर्दन: प्रथम व द्वितीय ग्रीवा कशेरुक (ऐटलस–एक्सिस), अग्र-भुजा की रेडियो–अल्ना संधि | दाएँ–बाएँ घूमना, घूर्णन |
| हिंज | किवाड़ी संधि | कोहनी, घुटना, उँगलियाँ | आगे–पीछे मोड़ना व सीधा करना | ||
| कंदुक-खल्लिका संधि (बॉल–एंड–सॉकेट) | बहुदिशीय संधि | कंधा, कूल्हा | सभी दिशाओं में गति, परिक्रमण | ||
| सैडल | काठी संधि | अंगूठे का आधार (कर्पो–मेटाकार्पल संधि) | पकड़ना, प्रत्यावर्तन, लचीलापन | ||
| अंडाकार (कॉन्डायलॉइड) | द्विदिशीय संधि | कलाई (रेडियो–कार्पल), जबड़ा (टेम्पोरो–मैंडिब्युलर) | आगे–पीछे, दाएँ–बाएँ गति | ||
| ग्लाइडिंग (समतल) | सरकनी संधि | हाथ के कार्पल, पैर के टार्सल, कंधे की ब्लेड की संधियाँ | हल्की सरकने जैसी गति |
- इनमें से रोग पैदा करने वाला सूक्ष्मजीव है:
(a) प्रोटोजोआ
(b) बैक्टीरिया
(c) आर्किया
(d) रोगाणु
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- प्रोटोजोआ यूकेरियोटिक, एककोशिकीय तथा परपोषी सूक्ष्मजीवों का एक विविध समूह है, जो प्रोटिस्टा जगत के अंतर्गत आते हैं। ये न पौधे हैं और न ही जन्तु, बल्कि स्वतंत्र रूप से या परजीवी के रूप में जल, मिट्टी और अन्य जीवों के शरीर में पाए जाते हैं। इनमें गति के लिए कूटपाद, कशाभिका या पक्ष्माभ जैसे संरचनाएँ होती हैं। इनकी प्रमुख विशेषताओं में- एककोशिकीय शरीर, झिल्ली-बद्ध केंद्रक, परपोषी पोषण तथा विभिन्न वातावरणों में अनुकूलन- शामिल हैं। इनके प्रमुख उदाहरण अमीबा, पैरामीशियम, ट्रिपैनोसोमा और प्लाज्मोडियम हैं। पर्यावरण में ये पोषक चक्रण में योगदान करते हैं, जबकि कुछ प्रजातियाँ मलेरिया, अमीबियासिस और नींद की बीमारी जैसी गंभीर मानव रोगों का कारण भी बनती हैं। कुछ प्रोटोजोआ रोग पैदा करते हैं, लेकिन सभी प्रोटोजोआ रोगकारी नहीं होते। इसलिए “प्रोटोजोआ” शब्द केवल रोग पैदा करने वाले जीवों के लिए सही नहीं है।
- बैक्टीरिया एक-कोशिकीय, सूक्ष्म जीव हैं जो पृथ्वी के हर पर्यावरण- मिट्टी, जल, वायु तथा मानव शरीर- में पाए जाते हैं। अधिकांश बैक्टीरिया उपयोगी होते हैं और पाचन में सहायता करने, विटामिन बनाने तथा हानिकारक रोगाणुओं को नियंत्रित करने जैसी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाते हैं, जबकि कुछ प्रजातियाँ निमोनिया, क्षय या खाद्य-विषाक्तता जैसे रोग उत्पन्न करती हैं। इनकी संरचना सरल होती है और इन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है। ये द्विविभाजन द्वारा अत्यंत तीव्र गति से प्रजनन करते हैं। आकार की दृष्टि से ये गोलाकार, छड़ाकार या सर्पिल रूप में पाए जाते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र में पोषक चक्रण, दही-पनीर जैसे खाद्य पदार्थों का निर्माण तथा औषधियों के उत्पादन में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अतः “बैक्टीरिया” शब्द भी केवल रोग पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों तक सीमित नहीं है।
- आर्किया एककोशिकीय, प्रोकैरियोटिक सूक्ष्मजीवों का वह विशिष्ट समूह है जो दिखने में बैक्टीरिया जैसे लगते हैं, किंतु आनुवंशिक और कोशिकीय स्तर पर उनसे तथा यूकैरियोटिक जीवों से भिन्न होते हैं। ये जीवन के तीन मूल डोमेनों में से एक- डोमेन आर्किया- का निर्माण करते हैं। आर्किया अत्यंत चरम परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध हैं, जैसे अत्यधिक गर्म झरने, बर्फीले प्रदेश, अत्यधिक खारे जलाशय और उच्च दबाव वाले गहरे समुद्री क्षेत्र। इनकी कोशिका में झिल्ली-बद्ध केंद्रक या कोशिकांग नहीं होते और इनकी कोशिका-भित्ति तथा आनुवंशिक संरचना बैक्टीरिया से स्पष्ट रूप से अलग होती है। यद्यपि ये चरम पर्यावरणों में अधिक पाए जाते हैं, फिर भी इनकी उपस्थिति मिट्टी, महासागरों और यहाँ तक कि मानव शरीर (विशेषकर आँत) में भी मिलती है। प्रमुख समूहों में-नमक-प्रिय हेलोफाइल, ऊष्मा व अम्लीयता सहने वाले थर्मोएसिडोफाइल तथा मीथेन उत्पन्न करने वाले मीथेनोजेन-विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अब तक के वैज्ञानिक ज्ञान के अनुसार ये सामान्यतः मानव रोगों के कारक नहीं माने जाते हैं।
- रोगाणु ऐसे सूक्ष्म जीव होते हैं-जैसे वायरस, जीवाणु, कवक और परजीवी-जो शरीर में प्रवेश करके संक्रमण और विभिन्न बीमारियाँ उत्पन्न कर सकते हैं। ये हवा, पानी, भोजन, स्पर्श-सतहों तथा अन्य जीवों के माध्यम से फैलते हैं। यद्यपि कई सूक्ष्म जीव शरीर में सहजीवी रूप से रहते हैं और हानि नहीं पहुँचाते, किन्तु रोगजनक रूपों से बीमारी उत्पन्न होती है। मुख्य प्रकारों में वायरस (फ्लू, कोविड), जीवाणु (गले का संक्रमण, निमोनिया), कवक (दाद) और परजीवी (मलेरिया, कालाजार) शामिल हैं। ये विभिन्न मार्गों से संक्रमण फैलाकर स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं, अतः स्वच्छता, स्वच्छ जल, सुरक्षित भोजन और सावधान व्यवहार रोगाणुजनित रोगों की रोकथाम के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। रोगाणु एक कार्य-आधारित (फंक्शनल) शब्द है – जो भी सूक्ष्मजीव रोग पैदा करे, उसके लिए रोगाणु शब्द प्रयोग होगा।
- इसलिए, सही उत्तर (d) रोगजनक है, क्योंकि यह किसी भी प्रकार के रोग पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव को दर्शाता है।
- दूध इनमें से किसका उदाहरण है?
(a) इमल्शन
(b) एरोसोल
(c) फोम
(d) सॉल
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- दूध एक इमल्शन है, जिसमें वसा की छोटी-छोटी बूंदें पानी में निलंबित रहती हैं। इमल्शन दो अमिश्रणीय तरल पदार्थों का वह मिश्रण है, जिसमें एक तरल अत्यंत सूक्ष्म बूंदों के रूप में दूसरे तरल में फैला रहता है। इनमें एक को परिक्षिप्त अवस्था और दूसरे को सतत अवस्था कहा जाता है। इमल्शन मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—तेल-में-पानी, जैसे दूध, और पानी-में-तेल, जैसे मक्खन। इनके विखरण को स्थिर बनाए रखने के लिए इमल्सीफायर नामक पदार्थ आवश्यक होता है, जो दोनों तरलों को अलग होने से रोकता है। रसायन विज्ञान में इन्हें कोलाइडल मिश्रण माना जाता है। सामान्य उदाहरणों में दूध, मक्खन, मेयोनेज़ और कुछ पेंट शामिल हैं।
- एरोसोल वे सूक्ष्म ठोस कण या तरल बूंदें हैं जो हवा या किसी अन्य गैस में निलंबित रहती हैं। ये प्राकृतिक स्रोतों-जैसे धूल, धुंध, कोहरा, ज्वालामुखीय राख-से भी बनते हैं और मानव गतिविधियों-जैसे धुआँ, औद्योगिक उत्सर्जन, स्प्रे पेंट, एयर फ्रेशनर-से भी उत्पन्न होते हैं। एरोसोल मौसम और जलवायु को प्रभावित करते हैं, क्योंकि ये सूर्य के विकिरण को परावर्तित या अवशोषित कर सकते हैं तथा बादलों के गठन में भूमिका निभाते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रदूषण-जनित एरोसोल श्वसन संबंधी समस्याएँ उत्पन्न कर सकते हैं, जबकि चिकित्सा में इन्हें दवा को धुंध के रूप में फेफड़ों तक पहुँचाने के लिए उपयोग किया जाता है, जैसे अस्थमा के इन्हेलर। तकनीकी क्षेत्र में स्प्रे डिब्बे एरोसोल तकनीक के माध्यम से पदार्थ को अत्यंत महीन फुहार के रूप में बाहर निकालते हैं।
- फोम वह पदार्थ है जिसमें गैस के अनेकों सूक्ष्म बुलबुले किसी तरल या ठोस माध्यम के भीतर फँसे रहते हैं, जिससे वह हल्का, झागदार और स्पंजी बन जाता है। इसमें गैस की मात्रा अधिक होती है और पतली परतें बुलबुलों को अलग बनाए रखती हैं। फोम दो प्रकार का होता है-तरल फोम, जैसे साबुन या बियर का झाग, और ठोस फोम, जैसे फोम रबर, गद्दों में प्रयुक्त पॉलीफोम या फोम काँच। इसका उपयोग गद्दे–तकिये जैसे आरामदायक उत्पादों में, नाजुक वस्तुओं की पैकिंग में, ताप एवं ध्वनि अवरोधन में तथा पेंटिंग संबंधी उपकरणों में किया जाता है। तरल फोम में बुलबुले लगातार बनते और टूटते रहते हैं, जबकि ठोस फोम में गैस-कोशिकाएँ स्थायी रूप से संरचना का हिस्सा रहती हैं।
- सोल एक कोलाइडल मिश्रण है जिसमें ठोस के अत्यंत सूक्ष्म कण किसी तरल माध्यम में समान रूप से फैले रहते हैं। ठोस कण परिक्षेपित अवस्था तथा तरल माध्यम परिक्षेपण अवस्था कहलाता है। सोल के कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि नीचे नहीं बैठते और प्रकाश को बिखेरते हुए टिंडल प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। कणों का आकार सामान्यतः 1 से 1000 नैनोमीटर के बीच होता है। स्याही, पेंट, रक्त, मिल्क ऑफ मैग्नेशिया और कीचड़ सोल के प्रमुख उदाहरण हैं, जहाँ ठोस कण तरल में स्थायी रूप से निलंबित रहते हैं और मिश्रण तरल जैसा दिखाई देता है।
11.निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा उनको कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए:
- विश्व विरासत दिवस
- विश्व थायराइड दिवस
- विश्व तंबाकू निषेध दिवस
- अंतर्राष्ट्रीय प्रकाश दिवस
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 4, 2, 3, 1
(b) 2, 3, 1,4
(c) 3, 1, 2, 4
(d) 1, 4, 2, 3
उत्तर : (d)
व्याख्या:
- 1. विश्व धरोहर दिवस – 18 अप्रैल
विश्व धरोहर दिवस, जिसे अंतर्राष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल दिवस भी कहा जाता है, हर वर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। इसे यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल परिषद (आईसीओएमओएस) द्वारा सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। इस दिन विश्वभर में धरोहर स्थलों की सुरक्षा, संरक्षण और पुनर्स्थापन से संबंधित कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह चारों घटनाओं में सबसे पहले आता है, इसलिए कालक्रम में प्रथम स्थान पर है।
- 2. अंतर्राष्ट्रीय प्रकाश दिवस – 16 मई
अंतर्राष्ट्रीय प्रकाश दिवस 16 मई को मनाया जाता है। यह यूनेस्को द्वारा प्रारंभ किया गया था और प्रकाश विज्ञान (ऑप्टीक्स ) के महत्व, प्रकाश आधारित तकनीकों, तथा इनका शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा और संचार पर प्रभाव समझाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। 16 मई की तिथि इसलिए चुनी गई क्योंकि इसी दिन 1960 में थियोडोर मैमन ने दुनिया का पहला लेज़र विकसित किया था। यह चार घटनाओं में दूसरे क्रम पर आती है।
- 3. विश्व थायरॉइड दिवस – 25 मई
विश्व थायरॉइड दिवस हर वर्ष 25 मई को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य थायरॉइड संबंधी रोगों-जैसे हाइपोथायरॉइडिज्म, हाइपरथायरॉइडिज्म, गण्डमाला -के प्रति जागरूकता बढ़ाना, समय रहते जांच करवाने के लिए प्रेरित करना और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना है। यह दिवस अंतर्राष्ट्रीय थायरॉइड समाज द्वारा मनाया जाता है। यह घटनाओं के कालक्रम में तीसरे स्थान पर आता है।
- 4. विश्व तंबाकू निषेध दिवस – 31 मई
विश्व तंबाकू निषेध दिवस प्रतिवर्ष 31 मई को मनाया जाता है। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जनस्वास्थ्य की रक्षा और तंबाकूजनित बीमारियों-कैंसर, हृदय रोग, श्वसन विकार आदि-के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए स्थापित किया। इस दिन तंबाकू उत्पादों के दुष्प्रभाव, उनसे होने वाली मृत्यु दर तथा रोकथाम के उपायों पर जोर दिया जाता है। यह चार घटनाओं में सबसे अंत में आता है।
- सूची–Ⅰ को सूची–ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची–Ⅰ (व्यक्ति) सूची–ⅠⅠ (कारण)
- गोपी थोटाकुरा 1. एशियाई चैम्पियनशिप में स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय
जिमनास्ट
- दीपा करमाकर 2. भारत में जन्मे NASA वैज्ञानिक जिन्होंने आयन-मंडल पर सौर
कातिवृत्त के प्रभाव का अध्ययन करने वाली टीम का नेतृत्व किया
- C. आरोह बड़जात्या पहले भारतीय अंतरिक्ष पर्यटक
- D. देव पटेल ब्रिटिश अभिनेता जिन्होंने थ्रिलर “मंकी मैन” के साथ निर्देशन
की शुरुआत की
कूट:
A B C D
(a) 2 1 3 4
(b) 3 2 1 4
(c) 4 1 2 3
(d) 3 1 2 4
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- A. गोपी थोटाकुरा → 3. पहले भारतीय अंतरिक्ष पर्यटक: गोपी थोटाकुरा एक भारतीय मूल के उद्यमी और पायलट हैं, जो ब्लू ओरिजिन के न्यू शेपर्ड मिशन के माध्यम से अंतरिक्ष में पहुँचने वाले पहले भारतीय अंतरिक्ष पर्यटक बने। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले अंतरिक्ष में जाने वाले सभी भारतीय-राकेश शर्मा (सोवियत मिशन) और भारतीय मूल के वैज्ञानिक/अंतरिक्ष यात्री-पेशेवर मिशन के तहत गए थे; जबकि गोपी थोटाकुरा एक निजी/वाणिज्यिक अंतरिक्ष पर्यटन मिशन के सदस्य थे। यह घटना भारत के नागरिकों के लिए अंतरिक्ष पर्यटन की दिशा में एक अहम मील का पत्थर मानी जाती है।
- B. दीपा करमाकर → 1. एशियाई चैम्पियनशिप में स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय जिमनास्ट: दीपा करमाकर भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध महिला जिम्नास्ट हैं। उन्होंने जिम्नास्टिक के उस कठिन कौशल प्रोडुनोवा के लिए भी ख्याति प्राप्त की, जिसे विश्वभर में बहुत कम खिलाड़ी कर पाते हैं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है एशियाई जिमनास्टिक चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर पहली भारतीय महिला जिमनास्ट बनना। भारतीय जिम्नास्टिक में लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय सफलता का अभाव रहा, लेकिन दीपा करमाकर ने इस छवि को बदलते हुए भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई। वह 2016 रियो ओलंपिक में भी फ़ाइनल तक पहुँचने वाली पहली भारतीय महिला जिम्नास्ट थीं।
- C. आरोह बड़जात्या → 2. भारतीय मूल के नासा वैज्ञानिक जिन्होंने आयनमंडल पर सौर क्रांतिवृत्त के प्रभाव का अध्ययन करने वाली टीम का नेतृत्व किया। आरोह बड़जात्या एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और भारतीय मूल के शोधकर्ता हैं जो नासा से जुड़े परियोजनाओं पर कार्य करते हैं। उन्होंने आयनमंडल पर सौर क्रांतिवृत्त (Solar Equator) और सौर गतिविधियों के प्रभाव का अध्ययन करने वाले मिशन का नेतृत्व किया। आयनमंडल पृथ्वी के वायुमंडल का वह स्तर है जो रेडियो संचार, जीपीएस सिग्नलों और उपग्रह तकनीक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनका शोध अंतरिक्ष मौसम, सौर तूफ़ानों और पृथ्वी के वातावरण पर उनके प्रभाव को समझने में विशेष रूप से सहायक रहा है। यह भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व भी है।
- D. देव पटेल → 4. ब्रिटिश अभिनेता जिन्होंने मंकी मैन नामक थ्रिलर से निर्देशन में पदार्पण किया: देव पटेल एक ब्रिटिश अभिनेता हैं जिनकी जड़ें भारतीय मूल से जुड़ी हैं। वे स्लमडॉग मिलियनेयर, लायन, द ग्रीन नाइट आदि फ़िल्मों में अपनी अभिनय प्रतिभा के लिए अत्यधिक प्रसिद्ध हुए। उन्होंने मंकी मैन नामक एक्शन–थ्रिलर फ़िल्म से निर्देशन में अपना पहला कदम रखा। यह फ़िल्म भारतीय मिथक, प्रतिशोध और सामाजिक व्यवस्था के तत्वों को आधुनिक शैली में प्रस्तुत करती है। देव पटेल न केवल इस फ़िल्म के निर्देशक हैं, बल्कि लेखक और मुख्य अभिनेता भी हैं, जिससे यह उनका बहुमुखी योगदान वाला प्रोजेक्ट बन जाता है।
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अधिकथन (A): 2023 -24 के दौरान सिंगापुर, भारत में FDI का सबसे बड़ा स्रोत बनकर उभरा।
कारण (R): भारत – मॉरीशस कर संधि संशोधन से भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के प्रमुख स्रोतों के रूप में देशों में बड़ा बदलाव आया है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: ( b)
व्याख्या:
- वित्तीय वर्ष 2023–24 में सिंगापुर भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का सबसे बड़ा स्रोत बनकर उभरा। डीपीआईआईटी के आँकड़ों के अनुसार सिंगापुर से भारत में सबसे अधिक निवेश प्रवाहित हुआ। इसका प्रमुख कारण यह है कि सिंगापुर एशिया का एक महत्वपूर्ण वित्तीय केंद्र है और कई बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने वैश्विक निवेश को सिंगापुर के माध्यम से संचालित करती हैं। भारत और सिंगापुर के बीच व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता, फिनटेक और स्टार्टअप क्षेत्र में साझेदारी तथा डिजिटल कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में सहयोग ने भी सिंगापुर को भारत के लिए आकर्षक निवेश केंद्र बना दिया।
- दूसरी ओर, भारत–मॉरीशस कर संधि (डीटीएए) में हुए संशोधन ने एफडीआई स्रोत देशों के रुझान को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पहले मॉरीशस भारत का प्रमुख एफडीआई मार्ग था क्योंकि निवेशकों को पूँजीगत लाभ कर से छूट मिलती थी और कर दरें कम थीं। लेकिन 2016 के संशोधन तथा 2024 में लागू किए गए न्यूनतम 15% कर प्रावधान के कारण मॉरीशस के माध्यम से टैक्स बचत की संभावना कम हो गई। टैक्स हॉलिडे समाप्त होने और निगरानी बढ़ने से मॉरीशस की आकर्षण शक्ति घट गई और निवेशकों ने अधिक स्थिर और अनुकूल कर ढाँचे वाले सिंगापुर की ओर रुझान बढ़ा दिया।
- इसलिए, दोनों कथन सत्य हैं और कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है।
- 7वीं भारत–इंडोनेशिया संयुक्त रक्षा सहयोग समिति की बैठक के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- इस बैठक में इंडोनेशिया ने रक्षा, उद्योग, समुद्री सुरक्षा और बहुपक्षीय सहयोग के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई।
- यह बैठक 5 मई, 2024 को जकार्ता में आयोजित की गई।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (B)
व्याख्या:
- कथन 1 सत्य है। 7वीं भारत–इंडोनेशिया संयुक्त रक्षा सहयोग समिति की बैठक में दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को और गहरा करने पर सहमति व्यक्त की। विशेष रूप से रक्षा उद्योग, समुद्री सुरक्षा और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग को सशक्त बनाने पर जोर दिया गया। इंडोनेशिया और भारत, दोनों ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र की प्रमुख समुद्री शक्तियाँ हैं, इसलिए समुद्री सुरक्षा, संयुक्त गश्त, समुद्री डोमेन जागरूकता और नौसेना सहयोग बैठक के मुख्य विषयों में शामिल रहे। इसके अलावा रक्षा उत्पादन एवं तकनीकी साझेदारी को बढ़ावा देने पर भी सकारात्मक सहमति बनी।
- यह बैठक 03 मई 2024 को नई दिल्ली में आयोजित की गई थी। भारत के रक्षा सचिव गिरिधर अरमाने और इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय के महासचिव एयर मार्शल डॉनी एरमावन तौफांटो ने इसकी सह-अध्यक्षता की थी। अतः कथन 2 असत्य है।
- “FWD 200B” के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- यह भारत का पहला स्वदेशी बमवर्षक “UAV” विमान है।
- इसकी पेलोड क्षमता 100 किलोग्राम है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- FWD-200B भारत में विकसित एक उन्नत सैन्य स्तर का बमवर्षक मानवरहित हवाई वाहन है। यह भारत का पहला स्वदेशी मानवरहित बमवर्षक विमान माना जाता है। इसका निर्माण और रूपांकन फ्लाइंग वेज रक्षा एवं अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी नामक भारतीय संस्था द्वारा किया गया है।
- यह मानवरहित विमान मध्यम ऊँचाई और लम्बी अवधि तक उड़ान भरने वाली श्रेणी (एम.ए.एल.ई.) का है तथा लगभग 100 किलोग्राम तक भार ले जाने में सक्षम है। इसका उपयोग निगरानी, टोही तथा अत्यधिक सटीक हवाई प्रहार हेतु किया जाता है। इसे उच्च गुणवत्ता वाली दृष्टि-सर्वेक्षण प्रणाली और मिसाइल जैसी प्रहारक व्यवस्था से सुसज्जित किया गया है।
- इसकी अधिकतम गति लगभग 370 किलोमीटर प्रति घंटा है और यह 12 से 20 घंटे तक लगातार उड़ान भर सकता है। इसे ज़मीन पर स्थित नियंत्रण केंद्र से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी तक संचालित किया जा सकता है।
- इस विमान की लंबाई लगभग 6 मीटर तथा पंखों का फैलाव 8 मीटर है। इसका अधिकतम उड़ान-प्रारम्भ भार 498 किलोग्राम है और यह समुद्र तल से 9,000 फीट की ऊँचाई तक प्रभावी उड़ान भर सकता है।
- इसलिए, दोनों कथन सही हैं।
- “भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौता (Ind -Aus ECTA)” के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- यह FTA (एफ.टी.ए.) के लिए अपनी तरह की पहली पहल है।
- बैठक में भारत के वाणिज्य सचिव श्री सुनील बर्थवाल ने भाग लिया।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
व्याख्या:
कथन 1 के अनुसार – यह FTA के लिए अपनी तरह की पहली पहल है। यहाँ “पहली पहल” से आशय पूरे ईसीटीए से नहीं, बल्कि एक विशिष्ट व्यवस्था से है, जो इस समझौते के अंतर्गत हाल ही में अपनाई गई। इंड–ऑस ईसीटीए के तहत हुई पहली संयुक्त समिति बैठक में भारत और ऑस्ट्रेलिया ने यह तय किया कि दोनों देश हर महीने रियायती आयात से संबंधित आँकड़ों का नियमित आदान–प्रदान करेंगे। यह मासिक डेटा–शेयरिंग की संस्थागत व्यवस्था किसी भी मुक्त व्यापार समझौते के तहत अपनी तरह की पहली पहल मानी गई है। यानी, इससे पहले किसी एफटीए में इस प्रकार का औपचारिक मासिक डेटा–आदान–प्रदान तंत्र नहीं स्थापित किया गया था। इसलिए यह कथन तथ्यात्मक रूप से सही है।
कथन 2 के अनुसार – बैठक में भारत के वाणिज्य सचिव श्री सुनील बर्थवाल ने भाग लिया। यह भी सही है। मई 2024 में हुई पहली संयुक्त समिति बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भारत के वाणिज्य सचिव श्री सुनील बर्थवाल ने किया, जबकि ऑस्ट्रेलिया की ओर से वहाँ के विदेश एवं व्यापार विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने भाग लिया। यह बैठक इंड–ऑस ईसीटीए के क्रियान्वयन की समीक्षा, बाज़ार पहुँच, उत्पाद मानक, शुल्क–दर कोटा, जैविक उत्पादों की पारस्परिक मान्यता आदि जैसे विषयों पर केंद्रित रही।
इसलिए दोनों कथन सही हैं।
- सूची–Ⅰ को सूची–ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची–I (संयुक्त अभ्यास) सूची–II (तिथियाँ)
- भारत – उज्बेकिस्तान संयुक्त सैन्य अभ्यास, “डस्टलिक” (DUSTLIK) – 1. फरवरी 19-27, 2024
- भारत–फ्रांस संयुक्त सैन्य अभ्यास, “शक्ति” (SHAKTI) – 2. मई 13-26, 2024
- भारत – संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का संयुक्त अभ्यास,
टाइगर ट्रायम्फ (Tiger Triumph), 2024 का हार्बर चरण – 3. अप्रैल 15-28, 2024
- मिलन, (MILAN), 2024 – 4. मार्च 18-25, 2024
A B C D
(a) 2 3 1 4
(b) 4 2 1 3
(c) 3 4 1 2
(d) 3 2 4 1
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- भारत–उज़्बेकिस्तान संयुक्त सैन्य अभ्यास “डस्टलिक” (DUSTLIK):
भारत–उज़्बेकिस्तान का संयुक्त सैन्य अभ्यास डस्टलिक 2024 की 5वीं कड़ी के रूप में उज़्बेकिस्तान के तेरमेज़ में 15–28 अप्रैल 2024 के बीच आयोजित किया गया। यह अभ्यास हर वर्ष बारी-बारी से भारत और उज़्बेकिस्तान में होता है और दोनों देशों की सेनाओं के बीच सामरिक तालमेल, काउंटर–टेररिज्म और पर्वतीय/दुर्गम भूभाग में संचालन क्षमता को बढ़ाने पर केंद्रित रहता है।
- भारत–फ्रांस संयुक्त सैन्य अभ्यास “शक्ति” (SHAKTI):
भारत और फ्रांस के बीच द्विपक्षीय सेना अभ्यास “शक्ति” की 7वीं कड़ी वर्ष 2024 में मेघालय के उमरोई में 13–26 मई 2024 के बीच आयोजित हुई। इसका उद्देश्य दोनों सेनाओं की संयुक्त ऑपरेशन क्षमता, विशेषकर आतंकवाद–रोधी अभियानों, पर्वतीय युद्ध और संयुक्त प्रशिक्षण को सुदृढ़ करना है।
- भारत–अमेरिका संयुक्त त्रि-सेवा अभ्यास “टाइगर ट्रायम्फ” (Tiger Triumph) – 2024 का हार्बर चरण:
“टाइगर ट्रायम्फ” भारत और अमेरिका की नौसेना, वायुसेना और थलसेना का संयुक्त त्रि-सेवा अभ्यास है। 2024 के संस्करण का हार्बर चरण, विशाखापत्तनम् में 18–25 मार्च 2024 के बीच आयोजित किया गया, जिसमें प्री-सेल चर्चा, विषय विशेषज्ञों के आदान–प्रदान, संयुक्त प्रशिक्षण और सांस्कृतिक/खेल गतिविधियाँ शामिल रहीं।
- “मिलन” (MILAN) 2024:
मिलन भारतीय नौसेना का बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास है, जो 2024 में 12वीं बार आयोजित हुआ। यह अभ्यास 19–27 फरवरी 2024 को विशाखापत्तनम् के तट पर/तट के पास हुआ, जिसमें 50 से अधिक देशों की सहभागिता रही। इसका उद्देश्य मित्र देशों की नौसेनाओं के बीच पेशेवर सहयोग, सामूहिक समुद्री क्षमता और समुद्री सुरक्षा में समन्वय बढ़ाना है।
- “शक्सगाम घाटी” के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- यह घाटी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) का हिस्सा है।
- भारत ने इस घाटी में चीन द्वारा किए जा रहे बुनियादी ढाँचे के विकास पर विरोध दर्ज कराया है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- शक्सगाम घाटी, जिसे ट्रांस-कराकोरम ट्रैक्ट भी कहा जाता है, मूलतः जम्मू-कश्मीर का अभिन्न हिस्सा रही है। 1947–48 के युद्ध के बाद यह क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में शामिल हो गया और बाद में 1963 में पाकिस्तान ने लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को एक समझौते—जिसे चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता कहा जाता है—के तहत चीन को सौंप दिया। भारत ने इस समझौते को कभी वैध नहीं माना और आज भी शक्सगाम घाटी को अपने भू-क्षेत्र का हिस्सा मानता है। कराकोरम पर्वत श्रेणी में स्थित यह क्षेत्र भारत-चीन-पाकिस्तान के त्रिकोणीय भूगोल से जुड़ा होने के कारण अत्यंत रणनीतिक महत्व रखता है। लद्दाख के उत्तरी भाग के समीप होने के साथ-साथ चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपेक) के ठीक दक्षिण में स्थित यह क्षेत्र दोनों देशों की सैन्य गतिविधियों का केंद्र भी है। इसी कारण यह घाटी भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक संतुलन और सीमाई स्थिरता के दृष्टिकोण से अत्यधिक संवेदनशील मानी जाती है।
- शक्सगाम घाटी पर चीन का नियंत्रण होने के कारण वह इस क्षेत्र में सड़कें, सैन्य ठिकाने, चौकियाँ और निगरानी से जुड़ा आधारभूत ढाँचा विकसित कर रहा है। भारत ने स्पष्ट रूप से घोषित किया है कि यह क्षेत्र उसके जम्मू-कश्मीर का अभिन्न हिस्सा है, इसलिए चीन द्वारा किए जा रहे किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य, समझौते या परियोजना को भारत अवैध और अस्वीकार्य मानता है। विदेश मंत्रालय ने कई बार कहा है कि शक्सगाम घाटी में चीन की गतिविधियाँ भारत की संप्रभुता का उल्लंघन हैं और भारत उनका कड़ा विरोध करता है। चूँकि चीन–पाकिस्तान सहयोग, विशेषकर सीपेक से संबंधित परियोजनाएँ, इस क्षेत्र के आसपास संचालित होती हैं, इसलिए भारत द्वारा दर्ज की जाने वाली आपत्तियाँ लगातार और स्पष्ट रूप से बनी रहती हैं।
- इसलिए, दोनों कथन सही हैं, और सही उत्तर (a) “1 और 2 दोनों” है।
- निम्नलिखित युग्मों (दक्कन ट्रैप – विशेषता) में से कौन-सा सही सुमेलित नहीं है?
(a) ऊपरी ट्रैप की मोटाई – लगभग 450 मीटर
(b) निम्न ट्रैप की मोटाई – लगभग 150 मीटर
(c) मध्य ट्रैप की मोटाई – लगभग 1200 मीटर
(d) ट्रैपों के मध्यवर्ती तल – सागरीय पादपों और जन्तुओं के अवशेष (जीवाश्म)
उत्तर: d
व्याख्या
दक्कन ट्रैप विश्व का सबसे बड़ा बेसाल्टिक ज्वालामुखीय क्षेत्र है, जो लगभग 6.6 – 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व क्रीटाशियस काल के अंत में विशाल ज्वालामुखीय विस्फोटों से निर्मित हुआ।
इन लावा प्रवाहों ने परत-दर-परत जमकर तीन मुख्य खंड बनाए—
- निम्न ट्रैप — सबसे पुरानी परत
- मध्य ट्रैप — सबसे मोटी और प्रमुख परत
- ऊपरी ट्रैप — सबसे नई परत
इन परतों में मोटाई के निम्नलिखित माप सामान्य रूप से स्वीकार किए जाते हैं—
- निम्न ट्रैप: ~150 मीटर
- मध्य ट्रैप: ~1200 मीटर
- ऊपरी ट्रैप: ~450 मीटर
इसलिए विकल्प (a), (b) और (c) सही सुमेलित हैं।
ट्रैपों के मध्यवर्ती तल, जिन्हें इंटरट्रैपियन बेड्स कहा जाता है, बेसाल्टिक लावा प्रवाहों के बीच बनने वाली तलछटी परतें हैं। ये तब निर्मित होती हैं जब दो ज्वालामुखीय प्रवाहों के बीच कुछ समय के लिए ज्वालामुखी शांत रहता है और उस दौरान मिट्टी, झीलों या नदियों के अवसाद जमा होकर परतें बना देते हैं। इन परतों में मुख्यतः स्थलीय पौधों और जीवों के अवशेष मिलते हैं, जैसे पत्तियों और तनों के जीवाश्म, स्थलीय कीट, मीठे पानी की मछलियाँ तथा मीठे पानी के घोंघे आदि। कभी-कभी स्थलीय कशेरुकों के अवशेष भी मिलते हैं; उदाहरण के रूप में दक्कन ट्रैप के नीचे स्थित लामेटा बेड्स में टाइटानोसर जैसे डायनासोरों के जीवाश्म पाए गए हैं। चूँकि दक्कन ट्रैप समुद्री नहीं बल्कि स्थलीय ज्वालामुखीय गतिविधि से बने हैं और इन परतों का निर्माण स्थलीय तथा मीठे पानी के वातावरण में हुआ था, इसलिए समुद्री पौधों और जन्तुओं के जीवाश्म यहाँ मिलना संभव नहीं है।
इसलिए, विकल्प (d) में इंटरट्रैपियन बेड्स को समुद्री पौधों और जानवरों के जीवाश्मों से सुमेलन सही नहीं है
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान खोजी गई जेट धाराएँ, ऊपरी वायुमंडल में चलने वाली पूर्वी तेज प्रवाही हवाएँ हैं।
कारण (R) : बेट धाराओं की प्रवाह गति 300-500 किमी प्रति
घंटा है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- जेट धाराएँ उच्च वायुमंडल में ट्रोपोपॉज़ (लगभग 8–15 किमी ऊँचाई) के पास बहने वाली अत्यंत तेज़ गति वाली संकीर्ण वायु-धाराएँ होती हैं। ये लगभग 100–500 किमी/घंटा की रफ्तार से बह सकती हैं और कभी-कभी यह गति 600–700 किमी/घंटा तक भी पहुँच जाती है। इनकी खोज द्वितीय विश्व युद्ध के समय हुई, जब अमेरिकी बमवर्षक पायलटों ने प्रशांत महासागर के ऊपर उच्च ऊँचाई पर उड़ान भरते समय अचानक अत्यधिक तेज़ हवा का सामना किया। बाद में इन्हें जेट स्ट्रीम नाम दिया गया।
- अभिकथन (A) गलत है: क्योंकि जेट धाराएँ पश्चिम से पूर्व दिशा में बहती हैं। इनकी दिशा का निर्धारण पृथ्वी के घूर्णन (कोरियालिस बल) और तापीय अंतर के कारण होता है। प्रमुख जेट धाराएँ, उपोष्णकटिबंधीय जेट धारा (लगभग 30° अक्षांशों पर) व ध्रुवीय वाताग्र जेट धारा (लगभग 60° अक्षांशों पर) पश्चिमी हवाएँ हैं, न कि पूर्वी।
- कारण (R) सही है: जेट धाराएँ वास्तव में इतनी तेज़ गति से बहती हैं, और कुछ परिस्थितियों में यह गति 500 किमी/घंटा से अधिक भी हो सकती है। गति की यह विशेषता ही इन्हें जेट नाम देती है, क्योंकि विमान जेट इंजन की गति के बराबर हवाएँ इन ऊँचाइयों पर महसूस होती हैं।
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची–Ⅰ (देश) सूची–ⅠⅠ (पहाड़)
- स्पेन – फ्रांस 1. आल्पस
- स्विटजरलैंड 2. ऐपेनाइन
- बुल्गारिया 3. पिरेनीज़
- इटली 4. बाल्कन
कूट:
A B C D
(a) 4 1 2 3
(b) 2 3 1 4
(c) 3 1 2 4
(d) 3 1 4 2
उत्तर: (d)
व्याख्या
- A. स्पेन – फ्रांस → 3. पिरेनीज़ पर्वत
पिरेनीज़ पर्वत स्पेन और फ्रांस के बीच प्राकृतिक सीमा बनाते हैं और लगभग 430 किलोमीटर तक फैले हुए हैं। यह पर्वत श्रृंखला यूरोप में आल्प्स के बाद सबसे महत्वपूर्ण पर्वत प्रणालियों में से एक है। इसके दक्षिण में स्पेन और उत्तर में फ्रांस स्थित हैं, तथा इसी श्रृंखला के भीतर अंडोरा नामक छोटा देश भी अवस्थित है। पिरेनीज़ अपनी खड़ी ढलानों, गहरी घाटियों, हिमनदों और उच्च पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र के लिए प्रसिद्ध है। - B. स्विटजरलैंड → 1. आल्प्स
आल्प्स यूरोप की सबसे ऊँची और विशाल पर्वत श्रृंखला है, जो स्विट्जरलैंड, फ्रांस, इटली, ऑस्ट्रिया, जर्मनी और स्लोवेनिया तक फैली है। स्विट्जरलैंड का अधिकांश पर्वतीय भाग आल्प्स से ढका हुआ है, और देश की पहचान भी इन ऊँचे शिखरों से ही जुड़ी है। आल्प्स में यूरोप की सबसे ऊँची चोटियों में से कई शामिल हैं, जैसे—मॉन्ट ब्लांक, मैटरहॉर्न, आदि। - C. बुल्गारिया → 4. बाल्कन
बाल्कन पर्वत, जिन्हें स्थानीय भाषा में “सतारा प्लानिना” कहा जाता है, बुल्गारिया के मध्य भाग से पूर्व की ओर काला सागर तक जाते हैं। यह पर्वत श्रृंखला यूरोप के बाल्कन क्षेत्र को अपना नाम देती है। बाल्कन पर्वत बुल्गारिया की जलवायु, कृषि, ऐतिहासिक नगरों और सांस्कृतिक भूगोल को गहराई से प्रभावित करते हैं। - D. इटली → 2. एपेनाइन
एपेनाइन पर्वत इटली की रीढ़ कहे जाते हैं, क्योंकि ये लगभग पूरे देश में उत्तरी इटली से लेकर दक्षिणी सिसिली क्षेत्र तक फैले हुए हैं। ये पर्वत इटली की नदियों, जलवायु और कृषि क्षेत्रों को नियंत्रित करते हैं। यह श्रृंखला भूगर्भीय रूप से सक्रिय है और इटली में आने वाले कई भूकंपों तथा ज्वालामुखीय गतिविधियों (जैसे—वेसुवियस, एटना) से भी जुड़ी है।
इसलिए, सही सुमेलन और उत्तर (c) 3 1 2 4 है।
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-Ⅰ सूची-ⅠⅠ
(शहर का नाम) (योजना बनाए जाने की अवधि)
- काँचीपुरम – 1. स्वतंत्र्योत्तर काल
- जैसलमेर – 2. औपनिवेशिक काल
- कोडाईकनाल – 3. मध्यकाल
- D. भिलाई – 4. प्राचीन काल
कूट:
A B C D
(a) 3 4 1 2
(b) 1 2 3 4
(c) 2 3 4 1
(d) 4 3 2 1
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- कांचीपुरम (प्राचीन काल):कांचीपुरम, तमिलनाडु का एक अत्यंत प्राचीन नगर है, जिसका उल्लेख संगम साहित्य, कालिदास, बाणभट्ट, तथा बौद्ध–जैन ग्रंथों में मिलता है। यह शहर पल्लव वंश, चोल वंश और बाद में विजयनगर साम्राज्य का एक प्रमुख धार्मिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा।
कांचीपुरम को मंदिरों का शहर कहा जाता है और यह भारत की उन गिने-चुने प्राचीन नगरीय संरचनाओं में शामिल है जो सुनियोजित तरीके से विकसित हुईं। यहाँ की नगरीय योजना में जल-संरचना, मंदिर-केंद्रित बस्तियाँ, बाजार क्षेत्र और शिल्प ग्रामों का उल्लेख मिलता है।
अतः यह प्राचीन काल की नियोजित नगरी का प्रतिनिधित्व करता है।
- जैसलमेर (मध्यकाल):जैसलमेर शहर की स्थापना 1156 ईस्वी में रावल जैसल सिंह ने की थी। यह राजस्थान के थार मरुस्थल में स्थित एक विशिष्ट मध्यकालीन किलेबंद नगर है। जैसलमेर की संरचना शुष्क मरुस्थलीय जलवायु के अनुकूल विकसित हुई, जिसमें ऊँचा पहाड़ी किला (जैसलमेर किला), सुनियोजित आवासीय गलियाँ, जलस्रोतों (जैसे-गड़ीसर झील) का संरक्षण, व्यापार मार्गों पर आधारित बाजार व्यवस्था देखने को मिलती है।
यह शहर मध्यकालीन व्यापार मार्गों पर आकर समृद्ध हुआ और इसकी स्थापत्य शैली पीले बलुआ पत्थर के कारण स्वर्ण नगरी कहलाती है।
इसीलिए यह मध्यकालीन योजना का उदाहरण है।
- कोडाईकनाल (औपनिवेशिक काल): कोडाईकनाल, तमिलनाडु का प्रसिद्ध हिल स्टेशन, 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान एक नियोजित पर्वतीय नगर के रूप में विकसित किया गया। ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे मुख्यतः ग्रीष्मकालीन विश्राम स्थल, स्वास्थ्य-उपचार केंद्र तथा शीतल जलवायु वाले सुरक्षित आश्रय के रूप में तैयार किया। यह नगर औपनिवेशिक नगरीय योजना का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें कृत्रिम कोडाई झील, यूरोपीय शैली के चर्च, सुव्यवस्थित सड़कें, सुंदर उद्यान और नागरिक सुविधाएँ उसकी विशिष्ट पहचान बनाते हैं। इसी कारण कोडाईकनाल को ब्रिटिश काल के पर्वतीय नगर-नियोजन की स्पष्ट मिसाल माना जाता है।
- भिलाई (स्वतंत्र्योत्तर काल): भिलाई, छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख औद्योगिक नगर, स्वतंत्र भारत की योजनाबद्ध नगरीय विकास अवधारणा का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी स्थापना 1955 में भारत–सोवियत सहयोग के तहत भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना के साथ हुई, जिसके आसपास पूरे नगर का औद्योगिक ढाँचा विकसित किया गया। स्वतंत्र्योत्तर औद्योगिक नगरों की मुख्य विशेषताएँ- सुसंगठित आवासीय सेक्टर, उद्योग-केंद्रित नगरीय संरचना, आधुनिक परिवहन और सार्वजनिक सुविधाओं की व्यवस्था, तथा हरित पट्टियों का समावेश, भिलाई में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती हैं। यह नगर स्वतंत्रता के बाद चंडीगढ़, राउरकेला और बाराबंकी जैसे अन्य योजनाबद्ध नगरों की श्रृंखला में विकसित हुआ और इसलिए स्वतंत्र्योत्तर भारत की नगरीय योजना का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
23 . सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-Ⅰ (प्रसिद्ध स्थानीय तूफान) सूची-ⅠⅠ (स्थान/क्षेत्र)
- आम्र वर्षा – 1. पंजाब से बिहार तक
- फूलों वाली बौछार – 2. केरल
- काल-बैसाखी – 3. तटीय कर्नाटक क्षेत्र
- लू – 4. पश्चिम बंगाल
कूट:
A B C D
(a) 1 3 2 4
(b) 3 2 4 1
(c) 3 2 1 4
(d) 4 1 3 2
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- आम्र वर्षा — तटीय कर्नाटक क्षेत्र (3)
आम्र वर्षा दक्षिण भारत में होने वाली प्रमुख पूर्व-मानसून वर्षा है, जो मुख्यतः कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों तथा उसके आसपास होती है। यह वर्षा मार्च–अप्रैल के दौरान तब उत्पन्न होती है जब समुद्र से आने वाली नमी और भूमि की गर्मी से उत्पन्न संवहन बादलों को संघनित करता है। यह वर्षा आम के फलों की वृद्धि में विशेष रूप से सहायक होती है, इसी कारण इसे आम्र वर्षा या मैंगो शावर कहा जाता है। पूर्व-मानसून ऋतु का यह प्राकृतिक संकेत भी है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून शीघ्र आने वाला है।
- फूलों वाली बौछार — केरल (2)
फूलों वाली बौछार, जिसे ब्लॉसम शावर भी कहा जाता है, केरल में होने वाली हल्की पूर्व-मानसून वर्षा है। यह विशेष रूप से कॉफी के पौधों में फूल आने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करती है और कॉफी उत्पादक क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। पश्चिमी घाट की पहाड़ियों पर उठती नमी युक्त हवाएँ संघनित होकर इन बौछारों का निर्माण करती हैं। यह स्थानीय कृषि चक्र के लिए आवश्यक प्राकृतिक वर्षा मानी जाती है।
- काल-बैसाखी — पश्चिम बंगाल (4)
काल-बैसाखी या नॉरवेस्टर एक तीव्र, उग्र और अल्पकालिक आंधी-तूफान है, जो मुख्यतः पश्चिम बंगाल, असम, झारखंड, ओडिशा और बिहार में अप्रैल–मई के दौरान आता है। यह देर शाम तापमान में तीव्र अंतर, उच्च संवहन और नमी के मेल से उत्पन्न होता है। तेज़ हवाएँ, बिजली कड़कना, गरज-चमक और तीव्र वर्षा इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। यह तूफान जहाँ आम और जूट जैसी फसलों को कभी-कभी नुकसान पहुँचाता है, वहीं गर्मी से राहत भी देता है।
- लू — पंजाब से बिहार तक (1)
लू गर्मियों में चलने वाली अत्यधिक गर्म, शुष्क और तेज़ हवाएँ होती हैं, जो मुख्यतः पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में अप्रैल से जून के बीच बहती हैं। इसका मुख्य कारण थार मरुस्थल की अत्यधिक गर्म सतह और उत्तर भारत में बनने वाला निम्न दाब क्षेत्र होता है। लू से तापमान में अत्यधिक वृद्धि, निर्जलीकरण और हीट-स्ट्रोक जैसी समस्याएँ बढ़ जाती हैं। यह भारत के उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भागों की सामान्य ग्रीष्मकालीन मौसमीय घटना है।
- निम्नलिखित में से कौन सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
राजधानी देश
(a) ओटावा – कनाडा
(b) डबलिन – आयरलैंड
(c) नाएप्यीडॉ – म्याँमार
(d) खार्तूम – इथोपिया
उत्तर: (d)
| विकल्प | राजधानी – देश | सही / गलत | व्याख्या |
| (a) | ओटावा – कनाडा | सही | ओटावा कनाडा की आधिकारिक राजनीतिक राजधानी है। यह ओटावा नदी के तट पर स्थित है और कनाडा की संसद एवं सभी प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं का केंद्र है। |
| (b) | डबलिन – आयरलैंड | सही | डबलिन स्वतंत्र देश रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड की राजधानी है। यह देश का सबसे बड़ा शहर, मुख्य बंदरगाह और सांस्कृतिक–आर्थिक केंद्र है। ध्यान रहे: उत्तरी आयरलैंड (जो यूके का हिस्सा है) की राजधानी बेलफ़ास्ट है, जबकि डबलिन स्वतंत्र आयरलैंड गणराज्य की राजधानी है। |
| (c) | नाएप्यीडॉ – म्याँमार | सही | म्याँमार की राजधानी पहले यांगून (रंगून) थी, लेकिन 2005 में राजधानी को स्थानांतरित कर नाएप्यीडॉ बनाया गया। यहीं पर प्रशासनिक केंद्र, संसद भवन और सरकारी कार्यालय स्थित हैं। इसलिए यह वर्तमान और आधिकारिक राजधानी है। |
| (d) | खार्तूम – इथियोपिया | गलत | यह युग्म गलत है क्योंकि खार्तूम, वास्तव में सूडान की राजधानी है। खार्तूम नील नदी के ब्लू-नील और ह्वाइट-नील के संगम पर स्थित एक प्रमुख शहर है। इथियोपिया की वास्तविक राजधानी अदीस अबाबा है, जो अफ्रीकी संघ का मुख्यालय होने के कारण महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय केंद्र भी है। |
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-Ⅰ (नहरें) सूची-ⅠⅠ (नदियाँ)
- ऊपरी बारी दोआब नहर – 1. सतलुज
- सरहिंद नहर – 2. यमुना
- गुड़गाँव नहर – 3. सतलुज, रावी, ब्यास
- इंदिरा गाँधी नहर – 4. रावी
कूट:
A B C D
(a) 3 1 2 4
(b) 4 1 2 3
(c) 4 1 3 2
(d) 3 2 1 4
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- ऊपरी बारी दोआब नहर — रावी (4)
- ऊपरी बारी दोआब नहर रावी नदी से निकाली गई एक महत्त्वपूर्ण सिंचाई नहर है।
- बारी दोआब का अर्थ है: ब्यास और रावी नदियों के बीच का दोआब (दो नदियों के बीच का क्षेत्र)।
- यह नहर मूलतः ब्रिटिश काल में पंजाब क्षेत्र की सिंचाई के लिए विकसित की गई थी।
- यह रावी नदी पर बने हेडवर्क्स से शुरू होकर पंजाब के उपजाऊ दोआबी क्षेत्रों को सिंचित करती है।
- सरहिंद नहर — सतलुज (1)
- सरहिंद नहर का उद्गम सतलुज नदी से होता है।
- यह नहर पंजाब के रू़पनगर (पुराना नाम आनंदपुर/रोपड़) के पास सतलुज नदी से निकलती है।
- सरहिंद और इसके आसपास के विशाल क्षेत्र में सिंचाई का प्रमुख स्रोत यही नहर प्रणाली है।
- यह सतलुज की जल–शक्ति और जल–प्रवाह का उपयोग कर हरित क्रांति काल से ही पंजाब–हरियाणा की कृषि में बड़ी भूमिका निभाती रही है।
- गुड़गाँव नहर — यमुना (2)
- गुड़गाँव नहर हरियाणा क्षेत्र की एक महत्त्वपूर्ण सिंचाई नहर है, जो यमुना नदी से जल प्राप्त करती है।
- इसका स्रोत यमुना नदी से निकले किसी बैराज/हेडवर्क्स (जैसे ताजेवाला बैराज क्षेत्र) से जुड़ा माना जाता है।
- यह नहर हरियाणा के गुड़गाँव व आसपास के शुष्क/अर्ध–शुष्क क्षेत्रों की सिंचाई के लिए महत्त्वपूर्ण है।
- दिल्ली–हरियाणा क्षेत्र में यमुना आधारित नहर–प्रणालियाँ पेयजल व सिंचाई दोनों के लिए जीवनरेखा समान हैं।
- इंदिरा गाँधी नहर — सतलुज, रावी, ब्यास (3)
- इंदिरा गाँधी नहर भारत की सबसे लम्बी नहरों में से एक है और इसे पहले राजस्थान नहर भी कहा जाता था।
- यह नहर मूलतः सतलुज, रावी और ब्यास नदियों के जल को उपयोग में लाने के लिए बनाई गई है।
- हरिके बैराज (पंजाब) पर सतलुज और ब्यास के संगम क्षेत्र से जल लेकर यह नहर राजस्थान के शुष्क–मरुस्थलीय क्षेत्रों (जैसलमेर, बीकानेर, गंगानगर आदि) तक पहुँचती है।
- यह नहर थार मरुस्थल के बड़े भाग को कृषि योग्य बनाने, पेयजल उपलब्ध कराने और बसावट बढ़ाने के लिए ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है।
- निम्नलिखित युग्मों (फसल – विशेषता) में से कौन-सा सही सुमेलित नहीं है?
(a) चावल उत्पादन की पश्चिमी सीमा निर्धारित करने वाली समवर्षा रेखा – 100 सेमी
(b) चावल उत्पादन के अधीन सर्वाधिक क्षेत्रफल वाला राज्य – उत्तर प्रदेश
(c) एक वर्ष में चावल की तीन फसलें पैदा करने वाला राज्य – पश्चिम बंगाल
(d) चावल उत्पादन में बिहार का योगदान – 15.7%
उत्तर: d
व्याख्या:
(a) चावल उत्पादन की पश्चिमी सीमा निर्धारित करने वाली समवर्षा रेखा – 100 सेमी (सही)
- चावल अत्यधिक जल-आवश्यक फसल है।
- सामान्यतः उत्तम चावल उत्पादन के लिए 100 से 200 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा की आवश्यकता मानी जाती है।
- भारत में चावल की पश्चिमी सीमा उस समवर्षा रेखा (आईसोहाइट) के आसपास मानी जाती है जहाँ औसत वर्षा लगभग 100 सेमी तक रहती है।
- इस रेखा के पश्चिम में वर्षा कम होने के कारण चावल की खेती प्राकृतिक वर्षा पर निर्भर रूप से संभव नहीं रहती, वहाँ या तो सीमित चावल होता है या सिंचाई पर आधारित खेती करनी पड़ती है।
(b) चावल उत्पादन के अधीन सर्वाधिक क्षेत्रफल वाला राज्य – उत्तर प्रदेश (सही)
-
- उत्तर प्रदेश का भौगोलिक क्षेत्र बहुत बड़ा है और पूर्वांचल व तराई क्षेत्र (गोरखपुर, देवरिया, बहराइच, श्रावस्ती, बलिया, कुशीनगर आदि) में विशाल धान–क्षेत्र हैं।
- इसलिए धान के अधीन कुल क्षेत्रफल की दृष्टि से उत्तर प्रदेश शीर्ष राज्यों में, अनेक आँकड़ों में प्रथम पर आता है।
- जबकि कुल उत्पादन की दृष्टि से अक्सर पश्चिम बंगाल, पंजाब, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि प्रमुख रहते हैं, पर क्षेत्रफल की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का स्थान अत्यंत ऊँचा है।
- एक वर्ष में चावल की तीन फसलें पैदा करने वाला राज्य – पश्चिम बंगाल (सही)
- पश्चिम बंगाल में चावल वर्ष भर विभिन्न मौसमों में उगाया जाता है। यहाँ पर धान की मुख्यतः तीन फ़सलें ली जाती हैं –
- औस –
-
-
-
- खरीफ से पहले बोई जाने वाली जल्दी पकने वाली किस्में
- प्रायः अप्रैल–मई में बोआई, जुलाई–अगस्त में कटाई
-
-
- अमन –
-
-
-
- मुख्य खरीफ/मानसूनी फसल
- जून–जुलाई में बोआई, नवम्बर–दिसम्बर में कटाई
-
-
- बोरो –
-
-
- रबी/शीतकालीन धान
- सिंचाई पर आधारित;
- जनवरी–फरवरी में रोपाई, अप्रैल–मई में कटाई
-
- इन तीनों मौसमों में धान की फसल ली जाती है, इसीलिए कहा जाता है कि पश्चिम बंगाल में एक वर्ष में चावल की तीन फसलें पैदा की जाती हैं।
(d) चावल उत्पादन में बिहार का योगदान – 15.7% (गलत)
- भारत के कुल चावल उत्पादन में बिहार का योगदान 6 से 7 % है न कि 15.7%
- वर्ष 2023–24 में बिहार का चावल उत्पादन 2022–23 की तुलना में 21% अधिक दर्ज किया गया।
- 2023–24 का कुल चावल उत्पादन 9522.9 हजार टन रहा, जो राज्य की कृषि प्रगति और बढ़ती उत्पादकता को दर्शाता है।
- रोहतास, भोजपुर, पूर्णिया, पश्चिम चंपारण, औरंगाबाद, गया, भागलपुर, पटना और गोपालगंज बिहार के प्रमुख चावल उत्पादक जिले हैं।
- कपास फसलों के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- कपास मुख्यतः खरीफ फसल है।
- कपास के उत्पादन के लिए वार्षिक 50 से 75 सेमी की मध्यम वर्षा की आवश्यकता होती है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 2
(b) केवल 1
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c )
व्याख्या:
कपास भारत में मुख्यतः खरीफ फसल के रूप में उगाई जाती है, जिसकी बुआई मानसून की शुरुआत (जून–जुलाई) में और कटाई शरद–शीत ऋतु (अक्टूबर–जनवरी) में होती है। यह फसल उत्तर, मध्य और दक्षिण भारत के प्रमुख कपास पट्टों में व्यापक रूप से उगाई जाती है। कपास के लिए उष्ण एवं अर्ध–शुष्क जलवायु सबसे उपयुक्त होती है तथा अच्छी वृद्धि के लिए 50–75 सेमी की मध्यम और समान रूप से वितरित वर्षा आवश्यक होती है। अत्यधिक वर्षा या जल-जमाव से जड़ सड़न, कीट–रोग और फाइबर की गुणवत्ता में गिरावट आती है, जबकि बहुत कम वर्षा या लंबे सूखे से अंकुरण, वृद्धि और बॉल बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। कपास के बीज अंकुरण के लिए 20–25°C तथा बॉल बनने और पकने के समय गर्म–शुष्क मौसम आदर्श माना जाता है। अतः दोनों कथन सत्य हैं।
| क्रम | फसल ऋतु | अवधि | मुख्य विशेषताएँ | प्रमुख फसलें |
| 1 | खरीफ | बुवाई: जून–जुलाई (दक्षिण-पश्चिम मानसून के साथ) कटाई: सितंबर–अक्टूबर | वर्षा पर आधारित फसलें; अधिक तापमान और आर्द्रता आवश्यक। | अनाज: धान (चावल), मक्का़, ज्वार, बाजरा
दलहन: अरहर, उड़द, मूंग तिलहन: सोयाबीन, मूंगफली, तिल नकदी फसलें: कपास, गन्ना, जूट अन्य: रेशेदार फसलें, चारा फसलें |
| 2 | रबी | बुवाई: अक्टूबर–नवंबर कटाई: मार्च–अप्रैल | ठंडी और शुष्क जलवायु; सिंचाई प्रमुख भूमिका निभाती है। | अनाज: गेहूँ, जौ
दलहन: चना, मसूर, मटर तिलहन: सरसों, राई, सूरजमुखी फाइबर: सन अन्य: आलू, प्याज़, लहसुन |
| 3 | ज़ायद | फरवरी–जून (रबी और खरीफ के बीच की छोटी फसल अवधि) | अल्प अवधि की फसलें; गर्म और शुष्क मौसम में सिंचाई के सहारे। | फसलें: तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी, लौकी, तुरई
अनाज: कोदो, संकर मक्का तिलहन: सूरजमुखी, मूंगफली (अल्प अवधि), तिल नकदी फसलें: गन्ने की बुवाई, सब्जियाँ |
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): लाल मृदा, भारत के दूसरे सबसे बड़े मृदा समूह को दर्शाती है।
कारण (R) : लाल मृदा, काली मृदा को दक्षिण, पूर्व और उत्तर दिशाओं से घेरे हुए है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: (b)
व्याख्या:
अभिकथन (A) सही है। भारत में मृदाओं के क्षेत्रफल के आधार पर प्रमुख समूहों का क्रम सामान्यतः काली मृदा, लाल मृदा, जलोढ़ मृदा, लेटेराइट मृदा तथा मरुस्थलीय/शुष्क मृदा माना जाता है। लाल मृदा देश के लगभग 18 प्रतिशत भूभाग पर पाई जाती है और इसका विस्तार मुख्यतः तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड तथा दक्षिण–पूर्व राजस्थान में है। इस व्यापक भौगोलिक प्रसार के कारण ही लाल मृदा को भारत का दूसरा सबसे बड़ा मृदा समूह माना जाता है।
कारण (R) सही है। काली मृदा का विस्तार मुख्यतः दक्कन पठार के मध्य भाग में पाया जाता है, जिसका केंद्र महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में स्थित है। इसके चारों ओर बाहरी हिस्सों में लाल मृदा पाई जाती है, जो काली मृदा क्षेत्र को तीन दिशाओं से घेरने जैसी भौगोलिक संरचना बनाती है। दक्षिण में तमिलनाडु और कर्नाटक, पूर्व में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा, तथा उत्तर में पूर्वी महाराष्ट्र और दक्षिणी मध्य प्रदेश के क्षेत्रों में लाल मृदा का व्यापक विस्तार मिलता है।
लाल मृदा भारत में दूसरे सबसे बड़े मृदा समूह के रूप में इसलिए स्थापित है क्योंकि जलवायु, मूल शैल, अपक्षय और स्थलाकृति जैसे कारकों के संयुक्त प्रभाव से इसका विस्तार देश के बड़े भूभाग पर हुआ है। लाल मृदा का काली मृदा को तीन दिशाओं से घेरना केवल स्थानिक वितरण का पैटर्न है, इसका लाल मृदा के विशाल विस्तार से कोई संबंध नहीं है।
अतः (A) और (R) दोनों सत्य हैं, लेकिन (R) (A) का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- “नेपाल भारत अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन 2024” के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- यह नई दिल्ली में आयोजित किया गया था
- यह तीन दिवसीय सम्मेलन नीति अनुसंधान प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित किया गया था।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: ( c )
व्याख्या:
- कथन 1: यह कथन असत्य है क्योंकि नेपाल–भारत अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन–2024, मार्च 2024 में काठमांडू में आयोजित एक महत्त्वपूर्ण त्रिदिवसीय आयोजन था, जिसका उद्देश्य भारत और नेपाल के बीच संस्कृत अध्ययन, अनुसंधान तथा सांस्कृतिक सहयोग को सुदृढ़ बनाना था।
- कथन 2: यह कथन सत्य है। यह सम्मेलन नीति अनुसंधान प्रतिष्ठान (नेपाल), केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (दिल्ली) और इंडिया फाउंडेशन (दिल्ली) के संयुक्त प्रयासों से 26 मार्च 2024 (संस्कृत तिथि: 14 चैत्र 2080) को सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में भारत और नेपाल के 120 से अधिक विद्वानों, आचार्यों, शोधकर्ताओं और अधिकारियों ने भाग लिया तथा साझा सांस्कृतिक और भाषाई विरासत को आगे बढ़ाने पर विस्तृत विचार-विमर्श किया। इस अवसर पर एक पाँच-सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें नेपाल–भारत संस्कृत सम्मेलन के वार्षिक आयोजन, एक संयुक्त अध्ययन केंद्र की स्थापना, गुरुकुल परंपरा को समर्थन और संस्कृत अनुसंधान के संस्थागत विस्तार जैसे महत्त्वपूर्ण बिंदु शामिल थे। इस प्रस्ताव के अंतर्गत नीति अनुसंधान प्रतिष्ठान को “भारत–नेपाल अध्ययन केंद्र” का प्रधान कार्यालय नियुक्त किया गया, जिससे दोनों देशों के विद्वानों के बीच भविष्य में निरंतर संवाद और सहयोग सुनिश्चित हो सके।
- “लूनर पोलर एक्सप्लोरेशन मिशन” (लूपेक्स) के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- यह भारत – जापान के बीच संयुक्त चन्द्र मिशन के लिए साझेदारी है, जो भविष्य में लाँच किया जाएगा।
- JAXA मिशन के लिए लैंडर विकसित करने के लिए जिम्मेदार है, जबकि ISRO रोवर और लॉन्च वाहन को संभाल रहा है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b) केवल 1
व्याख्या:
-
- कथन 1 सही है: लूपेक्स भारत की अंतरिक्ष संस्था इसरो और जापान की अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा का संयुक्त मिशन है, जिसका मुख्य उद्देश्य चन्द्रमा के दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र में पानी, विशेषकर बर्फ के रूप में मौजूद जल तथा अन्य वाष्पशील तत्वों का अध्ययन करना है। यह मिशन अभी योजना चरण में है और इसके प्रक्षेपण का लक्ष्य वर्ष 2028–29 के आसपास रखा गया है, हालांकि वास्तविक तिथि भविष्य की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। अतः कथन कि यह भारत–जापान की संयुक्त पहल है और भविष्य में प्रक्षेपित किया जाएगा, पूर्णतः सही है।
- कथन 2 गलत है: क्योंकि इसमें दोनों अंतरिक्ष एजेंसियों की भूमिकाएँ उलट दी गई हैं। वास्तविक व्यवस्था यह है कि लैंडर का विकास इसरो कर रहा है, जो चन्द्र सतह पर उतरने का कार्य करेगा, जबकि रोवर तथा प्रक्षेपण के लिए प्रयुक्त होने वाला H3 प्रक्षेपण यान जापान की अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा की जिम्मेदारी है। इस प्रकार लूपेक्स मिशन में लैंडर भारतीय है और रोवर तथा रॉकेट जापानी हैं।
- “शारीरिक दंड उन्मूलन के लिए दिशानिर्देश” (GECP) के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- 26 अप्रैल, 2024 को तमिलनाडु स्कूल शिक्षा विभाग ने ये दिशा-निर्देश जारी किए।
- ये दिशा-निर्देश छात्रों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा पर केंद्रित हैं।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
व्याख्या:
-
- तमिलनाडु स्कूल शिक्षा विभाग ने 26 अप्रैल, 2024 को शारीरिक दंड उन्मूलन के लिए दिशानिर्देश (जीईसीपी) जारी किए। जिनका उद्देश्य राज्य के सभी विद्यालयों में शारीरिक दंड और अन्य प्रकार के उत्पीड़न को रोकने के लिए एक औपचारिक रूपरेखा तैयार करना है। ये दिशानिर्देश राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा तैयार राष्ट्रीय स्तर की गाइडलाइनों पर आधारित हैं, जिन्हें राज्यों को लागू करने के निर्देश दिए गए थे।
- जी.ई.सी.पी. शारीरिक दंड के निषेध पर जोर देता है, जो बच्चों के निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार (आर.टी.ई.) अधिनियम, 2009 की धारा 17 के अनुरूप है, जो शैक्षणिक संस्थानों में बच्चों के शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न पर स्पष्ट रूप से प्रतिबंध लगाता है। साथ ही, ये दिशानिर्देश राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सिफारिशों पर आधारित हैं, जो सभी स्कूलों में एक निगरानी तंत्र, शिकायत निवारण प्रणाली और बच्चों के पक्ष में स्पष्ट प्रोटोकॉल स्थापित करने की बात करती हैं। इस प्रकार जी.ई.सी.पी. राष्ट्रीय स्तर के प्रावधानों को राज्य स्तर पर लागू करने का कार्य करता है।
- जी.ई.सी.पी. के प्रमुख प्रावधान
जी.ई.सी.पी. के अंतर्गत विद्यालयों में शारीरिक दंड का पूर्ण निषेध किया गया है, जिसमें मारपीट, थप्पड़, जबरन खड़ा करना, शारीरिक कष्ट देना जैसी सभी क्रियाएँ प्रतिबंधित हैं। मानसिक उत्पीड़न जैसे अपमानजनक भाषा, सार्वजनिक रूप से डाँटना, भेदभावपूर्ण व्यवहार, जाति या लिंग के आधार पर नीचा दिखाना आदि पर भी रोक लगाई गई है। विद्यालय स्तर पर निगरानी समितियाँ बनाने, शिकायत निवारण प्रक्रिया स्थापित करने और छात्रों, शिक्षकों तथा अभिभावकों के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने का प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त, सकारात्मक अनुशासन के तौर पर दंड के स्थान पर जीवन-कौशल शिक्षा, परामर्श और सहानुभूतिपूर्ण संवाद अपनाने पर जोर दिया गया है।
- “एफएलवाई 91” (FLY91) के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- यह भारत में शुरू की गई नई एयरलाइन है।
- इसकी पहली उड़ान 18 मार्च, 2024 को मनोहर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से शुरू हुई।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
व्याख्या:
-
- फ्लाई–91 (कंपनी: जस्ट उडो एविएशन प्रा. लि.) एक नई भारतीय क्षेत्रीय कम–किराया विमान सेवा है। इसका मुख्यालय गोवा के रिबंदर में स्थित है और इसका उद्देश्य भारत के भीतर विशेष रूप से द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों को हवाई नेटवर्क से जोड़ना है। यह सेवा भारत के विमानन क्षेत्र में हाल में प्रवेश करने वाली नई कंपनियों में से एक है, जिसका पंजीकरण वर्ष 2023 में हुआ और वाणिज्यिक उड़ानें वर्ष 2024 में प्रारम्भ हुईं।
- फ्लाई–91का प्रमुख परिचालन आधार गोवा के मोपा स्थित मनोहर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर है। एयरलाइन की वाणिज्यिक सेवाएँ आधिकारिक रूप से 18 मार्च 2024 से प्रारम्भ हुईं। इसी दिन इसकी पहली नियमित उड़ानें गोवा से बेंगलुरु और हैदराबाद के लिए संचालित की गईं। अतः दोनों कथन सत्य हैं।
- फ्लाई–91 से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
-
- फ्लाई–91 का संचालन जस्ट उडो एविएशन प्रा. लि. द्वारा किया जाता है।
- यह एक क्षेत्रीय कम–किराया विमान सेवा है, जिसका मुख्यालय उत्तर गोवा के रिबंदर में है तथा इसका परिचालन केंद्र मोपा स्थित मनोहर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है।
- इसके बेड़े में ए.टी.आर. प्रकार के टर्बोप्रॉप विमान शामिल हैं, जिनकी संख्या में आगे वृद्धि की योजना है।
- प्रारम्भिक उड़ान मार्गों में गोवा से बेंगलुरु, हैदराबाद और सिंधुदुर्ग शामिल थे, जिसके बाद अप्रैल 2024 से अगट्टी (लक्षद्वीप), जलगाँव जैसे नए गंतव्य भी जोड़े गए।
- इस एयरलाइन का मुख्य उद्देश्य भारत के छोटे और कम सेवा–प्राप्त हवाई अड्डों को जोड़ना तथा उड़ान योजना (यू.डी.ए.एन.) के लक्ष्य को आगे बढ़ाना है।
- R21/मैट्रिक्स–MTM क्या है?
(a) भारत बायोटेक इंटरनेशनल द्वारा विकसित एड्स के खिलाफ टीका
(b) सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा विकसित एड्स के खिलाफ टीका
(c) सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा विकसित मलेरिया के खिलाफ टीका
(d) भारत बायोटेक इंटरनेशनल द्वारा विकसित मलेरिया के खिलाफ टीका
उत्तर: (c)
व्याख्या:
- R21/मैट्रिक्स-M एक अत्यंत प्रभावी मलेरिया-रोधी टीका है, जिसे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के जेनर संस्थान ने विकसित किया और भारत की सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने बड़े पैमाने पर निर्मित किया है। यह विश्व का दूसरा अनुमोदित मलेरिया टीका है और प्रभावकारिता के आधार पर अब तक का सबसे सफल टीका माना जाता है। यह प्लाज़्मोडियम फाल्सिपैरम परजीवी के शुरुआती संक्रमण को रोकने वाला प्री-एरिथ्रोसाइट टीका है। इसमें प्रयुक्त मैट्रिक्स-M सहायक पदार्थ प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को कई गुना बढ़ाता है, जिससे इसकी प्रभावकारिता लगभग 75 प्रतिशत तक पहुँचती है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे अक्टूबर 2023 में स्वीकृति प्रदान की, और अफ्रीकी देशों में परीक्षणों में यह सुरक्षित व उपयोगी पाया गया। सीरम इंस्टीट्यूट प्रति वर्ष लगभग 10 करोड़ खुराकें बनाने में सक्षम है, जिससे यह टीका सुलभ, किफायती और व्यापक रूप से उपलब्ध हो सकेगा। मलेरिया प्रभावित देशों, विशेषकर अफ्रीका में, यह बच्चों की मृत्यु दर कम करने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा। यह टीका भारत की वैश्विक वैक्सीन क्षमता और स्वास्थ्य-कूटनीति को भी उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ करता है।
- निम्नलिखित में से किसने कान्स फिल्म फेस्टिवल, 2024 के अन सर्टेन रिगार्ड वर्ग में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता?
(a) शोभिता धूलिपाला
(b)उर्वशी रौतेला
(c) कियारा आडवाणी
(d) अनसूया सेनगुप्ता
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- अनसूया सेनगुप्ता ने 2024 कान्स फिल्म फेस्टिवल में ‘द शेमलेस‘ फिल्म में अपनी भूमिका के लिए ‘अन सर्टेन रिगार्ड‘ श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता।
- यह पुरस्कार जीतने वाली वह पहली भारतीय अभिनेत्री बनीं।
- अनसूया सेनगुप्ता एक भारतीय–बंगाली अभिनेत्री हैं, जिन्होंने अभिनय के साथ–साथ प्रोडक्शन डिजाइन में भी काम किया है।
| श्रेणी / विषय | विजेता / विवरण | अतिरिक्त जानकारी |
| आयोजन तिथि | 14–25 मई 2024 | कांस, फ्रांस |
| पाल्म डी’ओर (सर्वश्रेष्ठ फिल्म) | ‘अनोरा’ | निर्देशक – सीन बेकर |
| ग्रैंड प्रिक्स | ‘ऑल वी इमेजिन ऐज़ लाइट’ | निर्देशक – पायल कपाड़िया; इस पुरस्कार की पहली भारतीय विजेता |
| सर्वश्रेष्ठ निर्देशक | मिगुएल गोम्स | फिल्म – ‘ग्रैंड टूर’ |
| जूरी पुरस्कार | ‘इमिलिया पेरेज़’ | निर्देशक – जैक्स आडियर्ड |
| विशेष पुरस्कार | मोहम्मद रासोल्फ | फिल्म – ‘द सीड ऑफ द सेक्रेड फिग’ |
| सर्वश्रेष्ठ अभिनेता | जेसी प्लीमोन्स | फिल्म – ‘काइंड्स ऑफ काइंडनेस’ |
| सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (साझा) | एडरियाना पाज़, ज़ोए सलदाना, कारला सोफिया गैस्कोन, सेलेना गोमेज | फिल्म – ‘इमिलिया पेरेज़’ |
| सर्वश्रेष्ठ पटकथा | कोराली फारगेट | फिल्म – ‘द सब्सटेंस’ |
| अनसर्टेन रिगार्ड – सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री | अनसूया सेनगुप्ता | फिल्म – ‘द शेमलेस’; यह सम्मान पाने वाली पहली भारतीय |
| कांस ला सिनेफ – सर्वश्रेष्ठ लघु फिल्म | ‘सनफ्लावर: द फर्स्ट वन्स टू नो’ | निर्देशक – चिदानंद नाइक (FTII छात्र) |
| पियरे एंजनीक्स ट्रिब्यूट पुरस्कार | संतोष सिवन | पहला एशियाई सम्मानित |
| क्लासिक सेक्शन में प्रदर्शित फिल्म | ‘मंथन’ | निर्देशक – श्याम बेनेगल; 48 वर्ष बाद कांस में प्रदर्शन |
- रुद्रएम–ⅠⅠ मिसाइल के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
- यह हवा–से–हवा में मार करने वाली मिसाइल है।
- इसका परीक्षण मई 2024 में राजस्थान में किया गया था।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)
व्याख्या:
रुद्रम-1 भारत की पहली स्वदेशी एंटी-रेडिएशन मिसाइल है, जिसे हवा-से-सतह मार करने के लिए विकसित किया गया है, न कि हवा-से-हवा मिसाइल के रूप में। यह दुश्मन के रडार, संचार और रेडियो-फ्रीक्वेंसी उत्सर्जक स्रोतों को निशाना बनाती है जो सतह पर स्थित होते हैं (जैसे एयर डिफेंस रडार), और उन्हें निष्क्रिय करती है। इसलिए कथन 1 गलत है।
रुद्रम-1 का पहला सफल परीक्षण 9 अक्टूबर 2020 को आईटीआर, बालासोर (ओडिशा) के निकट किया गया था। इसलिए कथन 2 भी गलत है।
रुद्रम-1 को डीआरडीओ ने भारतीय वायुसेना के लिए विकसित किया है। इसका उद्देश्य दुश्मन के रडार, संचार साधनों और अन्य रेडियो-फ्रीक्वेंसी उत्सर्जक प्रणालियों को नष्ट कर उनकी वायु–रक्षा क्षमता को कमजोर करना है। यह मिसाइल सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान के साथ एकीकृत की गई है और भविष्य में अन्य लड़ाकू विमानों में भी जोड़ी जा सकती है। इसमें आईएनएस–जीपीएस आधारित नेविगेशन तथा अंतिम चरण में लक्ष्य के विकिरण को पहचानने वाला पैसिव होमिंग हेड लगा है, जो इसे सटीक लक्ष्य भेदन में सक्षम बनाता है। इसकी मारक दूरी प्रक्षेपण ऊँचाई के अनुसार लगभग 100 से 250 किलोमीटर तक है और इसकी गति मैक-2 के आसपास है। रुद्रम-1 भारतीय वायुसेना को दुश्मन के वायु–रक्षा तंत्र को दबाने और हवाई वर्चस्व स्थापित करने में महत्वपूर्ण सामरिक क्षमता प्रदान करती है, जिससे भारत की आक्रामक और प्रतिरोधक शक्ति दोनों मजबूत होती हैं।
36.सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची–Ⅰ (नव निर्वाचित राज्यप्रमुख) सूची–ⅠⅠ (देश)
- गीतानास नौसेदा – 1. आइसलैंड
- लुआँग कुआँग – 2. वियतनाम
- हल्ला टॉमसडॉटिर – 3. लिथुआनिया
- जोस राउल मुलिनो – 4. पनामा
कूट :
A B C D
(a) 2 1 3 4
(b) 3 2 1 4
(c) 4 1 2 3
(d) 3 1 2 4
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- गीतानास नौसेदा — लिथुआनिया
- गीतानास नौसेदा लिथुआनिया के राष्ट्रपति हैं।
- इन्हें 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में दूसरी बार राष्ट्रपति चुना गया।
- पेशे से अर्थशास्त्री, नौसेदा यूरोपियन यूनियन की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हैं और रूस-यूक्रेन संघर्ष के संदर्भ में नाटो के मजबूत समर्थक माने जाते हैं।
- लिथुआनिया बाल्टिक क्षेत्र का एक प्रमुख देश है, जहाँ राष्ट्रपति प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुना जाता है।
- लुआँग कुआँग — वियतनाम
- लुआँग कुआँग को 2024 में वियतनाम का नव निर्वाचित राष्ट्रपति बनाया गया।
- वियतनाम में राष्ट्रपति का चुनाव राष्ट्रीय सभा द्वारा किया जाता है; यह प्रत्यक्ष चुनाव नहीं होता।
- राष्ट्रपति मुख्यतः औपचारिक भूमिका निभाते हैं, लेकिन रक्षा एवं विदेश नीति में महत्वपूर्ण स्थान होता है।
- वियतनाम की राजनीति कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ वियतनाम द्वारा नियंत्रित होती है और राष्ट्रपति पार्टी की सर्वोच्च राजनीतिक संरचना का हिस्सा होते हैं।
- हल्ला टॉमसडॉटिर — आइसलैंड
- हल्ला टॉमसडॉटिर को 2024 में आइसलैंड की राष्ट्रपति के रूप में चुना गया।
- वह आइसलैंड की दूसरी महिला राष्ट्रपति हैं; पहली थीं विगदिस फिनबोगादोतिर, जो विश्व की पहली प्रत्यक्ष रूप से चुनी गई महिला राष्ट्रपति थीं।
- हल्ला एक प्रसिद्ध उद्यमी, व्यवसायिक नेता और टेड वक्ता हैं।
- आइसलैंड में राष्ट्रपति मुख्यतः एक संवैधानिक पद है, परंतु राजनीतिक संकट के समय राष्ट्रपति की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
- उनका नेतृत्व आइसलैंड की सामाजिक प्रगतिशील नीति, लैंगिक समानता और वैश्विक मानवाधिकार विमर्श से जुड़ा हुआ है।
- जोस राउल मुलिनो — पनामा
- जोस राउल मुलिनो पनामा के 2024 में निर्वाचित राष्ट्रपति हैं और देश के 39वें राष्ट्रपति बने।
- ये पूर्व में पनामा के सुरक्षा मंत्री रह चुके हैं।
- चुनावों में उनकी विजय का केंद्रबिंदु आर्थिक सुधार, सुरक्षा और पनामा नहर से जुड़े व्यावसायिक रणनीतियों को मजबूत करना था।
- पनामा मध्य अमेरिका का एक महत्वपूर्ण देश है, जहाँ पनामा नहर वैश्विक व्यापार के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। मुलिनो इस नहर प्रबंधन व आर्थिक सुधार पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।
37.नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): प्रारंभिक राष्ट्रवादियों में से अधिकांश को ब्रिटिश राज ईश्वरीय देन लगता था जिसका उद्देश्य आधुनिकीकरण लाना था।
कारण (R) : उनकी शिकायत केवल भारत में “अन-ब्रिटिश राज” के खिलाफ थी।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: (b)
व्याख्या:
प्रारम्भिक राष्ट्रवादी नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश शासन भारत में आधुनिक संस्थाओं, कानून के शासन, आधुनिक शिक्षा, रेल–डाक–तार जैसी संरचनाओं और संवैधानिक परंपराओं की नींव रखकर देश को आधुनिकीकरण की दिशा में ले जा रहा है। इसी कारण वे ब्रिटिश राज को एक प्रकार की ईश्वरीय देन की तरह देखते थे, जो भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर प्रदान कर रहा था। इसलिए अभिकथन (A) सही है।
प्रारम्भिक राष्ट्रवादियों का विरोध ब्रिटिश शासन की मूल अवधारणा से नहीं, बल्कि भारत में प्रचलित अन-ब्रिटिश राज से था। उनका तर्क था कि भारत में जो शासन चल रहा है, वह ब्रिटेन के उदार लोकतांत्रिक सिद्धांतों—न्याय, समानता, प्रतिनिधित्व और नागरिक अधिकार—के अनुरूप नहीं है। दादाभाई नैरोजी की प्रसिद्ध अभिव्यक्ति अन-ब्रिटिश रूल उसी दृष्टिकोण को दर्शाती है। अतः कारण (R) भी सही है।
अभिकथन और कारण का संबंध तार्किक है। प्रारम्भिक राष्ट्रवादी ब्रिटिश शासन के आदर्श स्वरूप को सकारात्मक मानते थे और यही विश्वास उन्हें इसे ईश्वरीय देन की तरह देखने को प्रेरित करता था। परंतु जब भारत में वास्तविक शासन ब्रिटिश आदर्शों से मेल नहीं खाता दिखाई दिया, तब उनकी आलोचना अन-ब्रिटिश राज पर केंद्रित हो गई। अर्थात वे ब्रिटिश आदर्शों को स्वीकारते थे, पर भारत में उनके विपरीत व्यवहार का विरोध करते थे। इस प्रकार कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।
- विलियम ए.जे. आर्कबोल्ड के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही नहीं है?
(a) वे म्योर सेंट्रल कॉलेज, इलाहाबाद के प्राचार्य थे।
(b) वे एम. ए. ओ. कॉलेज, अलीगढ़ के प्राचार्य थे।
(c) वे राजकीय कॉलेज, ढाका के प्राचार्य थे।
(d) वे लाहौर कॉलेज, लाहौर के प्राचार्य थे।
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- म्योर सेंट्रल कॉलेज, इलाहाबाद: विलियम ए. जे. आर्कबोल्ड बाद के समय में म्योर सेंट्रल कॉलेज, इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के प्राचार्य रहे। कॉलेज के आधिकारिक अभिलेखों में 1918–1920 के बीच उन्हें प्रिंसिपल के रूप में दर्ज किया गया है। इसलिए यह कथन कि वे म्योर सेंट्रल कॉलेज, इलाहाबाद के प्राचार्य थे, सही है।
- एम.ए.ओ. कॉलेज, अलीगढ़: मुहम्मडन एंग्लो–ओरिएंटल (एम.ए.ओ.) कॉलेज, अलीगढ़ में भी विलियम ए. जे. आर्कबोल्ड ने प्राचार्य के रूप में कार्य किया। उनकी नियुक्ति 16 अक्तूबर 1905 से 31 अक्तूबर 1909 तक रही, और वे अलीगढ़ आंदोलन के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण यूरोपीय प्राचार्य के रूप में स्मरण किए जाते हैं। अतः यह कथन भी तथ्यात्मक रूप से सही है।
- राजकीय कॉलेज, ढाका: एम.ए.ओ. कॉलेज, अलीगढ़ से त्यागपत्र देने के बाद आर्कबोल्ड ने राजकीय कॉलेज, ढाका के प्राचार्य के रूप में कार्य किया। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोत उनके करियर क्रम को—एम.ए.ओ. कॉलेज अलीगढ़ → गवर्नमेंट कॉलेज ढाका → म्योर सेंट्रल कॉलेज इलाहाबाद—के रूप में उल्लेखित करते हैं। इसलिए यह कथन भी सही है।
- लाहौर कॉलेज, लाहौर: लाहौर कॉलेज, लाहौर के संदर्भ में ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिलता कि विलियम ए. जे. आर्कबोल्ड ने वहाँ प्राचार्य के रूप में कार्य किया हो। उपलब्ध स्रोत केवल अलीगढ़, ढाका और इलाहाबाद से उनके प्राचार्य पद के संबंध की पुष्टि करते हैं, लाहौर से नहीं। इसलिए यह कथन गलत है।
- निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें प्रारंभ से कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए:
- वेल्लोर विद्रोह
- नाना फडणवीस की मृत्यु
- वेलेजली को वापस बुलाना
- एंग्लो-नेपाली युद्ध
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 3, 1, 2, 4
(b) 2, 3, 4, 1
(c) 2, 3, 1,4
(d) 4, 1, 3, 2
उत्तर: (c )
व्याख्या:
कालानुक्रमिक क्रम में घटनाएं:
- नाना फडणवीस की मृत्यु – 13 मार्च 1800: नाना फडणवीस मराठा महासंघ के सबसे प्रभावशाली राजनेताओं में से थे और 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मराठा राजनीति के प्रमुख किंगमेकर माने जाते थे। उनका निधन 13 मार्च 1800 को हुआ। यह चारों घटनाओं में सबसे पहले घटित होने वाली घटना है।
- वेलेजली को वापस बुलाना – जुलाई 1805: लॉर्ड वेलेजली 1798 से 1805 तक भारत के गवर्नर-जनरल रहे। उनकी आक्रामक नीतियों—विशेषकर सहायक संधि, मैसूर और मराठा युद्धों—के कारण ईस्ट इंडिया कंपनी पर भारी वित्तीय दबाव बढ़ा। परिणामस्वरूप जुलाई 1805 में उन्हें पद से वापस बुला लिया गया। यह क्रम में दूसरी घटना है।
- वेल्लोर विद्रोह – 10 जुलाई 1806: वेल्लोर विद्रोह 10 जुलाई 1806 को हुआ और इसे कई इतिहासकार 1857 से पहले का पहला बड़ा सिपाही विद्रोह मानते हैं। यह विद्रोह मुख्य रूप से मद्रास सेना के भारतीय सिपाहियों द्वारा धार्मिक–सांस्कृतिक हस्तक्षेप और सैन्य नियमों के विरोध में किया गया था। यह कालक्रम में तीसरी घटना है।
- एंग्लो–नेपाली युद्ध – 1814–1816 : एंग्लो–नेपाली या गोरखा युद्ध 1814 से 1816 तक चला। यह युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के गोरखा शासन के बीच लड़ा गया और इसका अंत 1816 की सुगौली संधि से हुआ, जिसके परिणामस्वरूप नेपाल को अपने कई क्षेत्र ब्रिटिश शासन को सौंपने पड़े। यह चारों घटनाओं में सबसे बाद की घटना है।
- सूची–Ⅰ को सूची–ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची–Ⅰ सूची–ⅠⅠ
(विद्रोह) (नेतृत्वकर्ता)
- पाइका विद्रोह – 1. एडाचना कुंगन
- बरेली विद्रोह – 2. राधाराम
- मालाबार विद्रोह – 3. मुफ़्ती मुहम्मद ऐवाज़
- सिलहट विद्रोह – 4. जगबंधु विद्याधर महापात्र
कूट :
A B C D
(a) 2 1 3 4
(b) 3 2 1 4
(c) 4 3 1 2
(d) 3 4 1 2
उत्तर: (c )
व्याख्या:
| क्रम | विद्रोह / आंदोलन | वर्ष व क्षेत्र | नेतृत्व | पृष्ठभूमि / कारण |
| A | पाइका विद्रोह | 1817, खुर्दा (वर्तमान ओडिशा) | जगबंधु विद्याधर महापात्र (बक्शी जगबंधु) | अंग्रेजों द्वारा जमींदारी अधिकार छीनना, भूमि राजस्व में वृद्धि, पाइका वर्ग के आर्थिक हितों पर आघात, पारंपरिक शासन में हस्तक्षेप |
| B | बरेली विद्रोह | 1816, बरेली (उत्तर प्रदेश) | मुफ़्ती मुहम्मद ऐवाज़ | पुलिस कर लागू होना, कर वसूली में अत्याचार, धार्मिक और सामाजिक आक्रोश, आम जनता का असंतोष |
| C | मालाबार (मोपला) विद्रोह | 1921–22, मालाबार (केरल) | एडाचना कुंगन (स्थानीय नेता; व्यापक नेतृत्व: अली मुसलियार, वरियमकुन्नाथ कुंजाहम्मद हाजी) | खिलाफ़त आंदोलन, औपनिवेशिक अत्याचार, जमींदारी शोषण, कृषक–जमींदारी संघर्ष |
| D | सिलहट विद्रोह | 1782–83, सिलहट–चारगोला क्षेत्र (तत्कालीन बंगाल) | राधाराम दत्त | कंपनी की नई राजस्व नीतियाँ, स्थानीय सामाजिक–आर्थिक संरचना में हस्तक्षेप, अंग्रेजी नियंत्रण के विरुद्ध स्थानीय प्रतिरोध |
- भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- संविधान में, प्रत्येक राज्य हेतु भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी के पद का प्रावधान किया गया है।
- 9वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा इसके लिए एक नया अनुच्छेद 350 बी जोड़ा गया।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- कथन 1 गलत है, क्योंकि संविधान में प्रत्येक राज्य के लिए अलग–अलग विशेष अधिकारी नियुक्त करने का प्रावधान नहीं है। अनुच्छेद 350बी के तहत राष्ट्रपति एक ही भाषायी अल्पसंख्यकों के विशेष अधिकारी की नियुक्ति करते हैं, जिसका कार्यक्षेत्र पूरे भारत पर लागू होता है। यह राष्ट्रीय स्तर का पद भाषायी अल्पसंख्यकों के अधिकारों और शिकायतों की निगरानी करता है, इसलिए प्रत्येक राज्य हेतु कहना संवैधानिक प्रावधान से मेल नहीं खाता।
- कथन 2 भी गलत है। अनुच्छेद 350बी को संविधान में 9वें संशोधन द्वारा नहीं, बल्कि संविधान (7वां संशोधन) अधिनियम, 1956 द्वारा जोड़ा गया था। इसी संशोधन से अनुच्छेद 350ए और 350बी दोनों उत्पन्न हुए। 9वां संशोधन केवल भारत–पाकिस्तान सीमा समायोजन से संबंधित था और भाषायी अल्पसंख्यकों के अधिकारी से उसका कोई संबंध नहीं है।
- भाषायी अल्पसंख्यकों के विशेष अधिकारी समय–समय पर अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है। राष्ट्रपति इन रिपोर्टों को संसद के समक्ष रखवाते हैं, जिससे नीति–निर्माण स्तर पर भाषायी अल्पसंख्यकों की समस्याएँ और ज़रूरतें सामने आ सकें। इस प्रकार यह व्यवस्था केंद्र और राज्यों दोनों को जवाबदेह बनाती है।
- अनुच्छेद 350बी भारतीय संविधान की भाषा–सुरक्षा संबंधी व्यापक संरचना का एक प्रमुख अंग है। यह अनुच्छेद 29–30, 350ए तथा आधिकारिक भाषा के अन्य प्रावधानों के साथ मिलकर भाषायी विविधता के संरक्षण, सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता में बहुलता के सम्मान को सुनिश्चित करता है।
- भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में शामिल है/हैं:
- व्यापार एवं वाणिज्य
- सामानों में मिलावट
- उत्तराधिकार
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 2 और 3
(b) केवल 1
(c) 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (A)
व्याख्या :
- भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में विषयों को संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में विभाजित किया गया है। संघ सूची के विषयों पर केवल संसद, राज्य सूची पर राज्यों की विधानसभाएँ और समवर्ती सूची पर केंद्र व राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। टकराव की स्थिति में सामान्यतः केंद्रीय कानून को प्रधानता दी जाती है।
- व्यापार एवं वाणिज्य एक एकल विषय के रूप में समवर्ती सूची में नहीं आता। संविधान में यह विभाजित रूप में नियोजित है—अंतरराष्ट्रीय व्यापार और अंतरराज्यीय व्यापार संघ सूची में आते हैं, जबकि राज्य के भीतर का व्यापार राज्य सूची में। इस प्रकार यह विषय समवर्ती सूची का हिस्सा नहीं है, इसलिए कथन 1 असत्य है।
- समवर्ती सूची के प्रविष्टि 18 में खाद्य पदार्थों और अन्य वस्तुओं में मिलावट स्पष्ट रूप से दर्ज है। इसलिए केंद्र और राज्य दोनों मिलावट रोकने संबंधी कानून बना सकते हैं। इसी आधार पर खाद्य सुरक्षा और मानक कानून जैसे केंद्रीय विधानों के साथ राज्यों के अपने नियम भी लागू होते हैं। यह कथन पूर्णतः सही है।
- समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 में विवाह, तलाक, गोद लेना, वसीयत, उत्तराधिकार और संयुक्त परिवार से जुड़े विषय सम्मिलित हैं। उत्तराधिकार का स्पष्ट उल्लेख इसे समवर्ती सूची का विषय बनाता है। इसी कारण हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम जैसे केंद्रीय कानून बनाए गए। अतः कथन 3 भी सही है।
- फातिमा बीवी का हाल ही में निधन हुआ। उनके बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- वह भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश थी।
- उन्होंने 1997-2001 तक केरल राज्य के राज्यपाल के रूप में सेवाएँ भी दीं।
- वह उच्चतर न्यायपालिका तक पहुँचने वाली पहली मुस्लिम महिला थी।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 1, 2 और 3
(b) केवल 1
(c) 1 और 2
(d) 1 और 3
उत्तर: (d)
व्याख्या :
- न्यायमूर्ति एम. फातिमा बीवी 1989 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश नियुक्त हुईं। यह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, क्योंकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में कोई भी महिला न्यायाधीश नहीं थी। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत केरल न्यायिक सेवा से की और उच्च न्यायालय में कार्य करने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुँचीं। इस नियुक्ति ने भारत में उच्च न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी के लिए एक नई दिशा स्थापित की। अतः कथन 1 सही है।
- न्यायमूर्ति फातिमा बीवी ने 1997 से 2001 तक तमिलनाडु (न कि केरल) राज्य की राज्यपाल के रूप में सेवा दी। वह भारत की पहली मुस्लिम महिला राज्यपाल भी थीं। अपने कार्यकाल में प्रशासन, विश्वविद्यालयों और कानून-व्यवस्था से जुड़े कार्यों में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। इस प्रकार कथन 2 असत्य है।
- न्यायमूर्ति फातिमा बीवी भारत की पहली मुस्लिम महिला थीं जिन्होंने उच्चतर न्यायपालिका (उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय) तक पहुँच बनाई। उनकी यह उपलब्धि न्यायपालिका में लैंगिक और सामाजिक विविधता बढ़ाने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इससे न्यायिक सेवा में आने की इच्छुक महिलाओं, विशेषकर मुस्लिम महिलाओं को प्रेरणा मिली। अतः कथन 3 सही है।
- इस प्रकार, कथन 1 और 3 सही हैं, जबकि कथन 2 गलत है।
- कौन सा संशोधन अधिनियम भारत में स्थानीय शासन संस्थाओं से संबंधित हैं?
(a) 73वाँ और 74वाँ संशोधन अधिनियम
(b) 42वाँ और 43वाँ संशोधन अधिनियम
(c) 63वाँ और 64वाँ संशोधन अधिनियम
(d) 86वाँ और 87वाँ संशोधन अधिनियम
उत्तर: (A)
व्याख्या:
- 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 – पंचायती राज: 73वाँ संशोधन ग्रामीण स्थानीय स्वशासन को सुदृढ़ करने और पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने के उद्देश्य से किया गया। इसके तहत संविधान में भाग IX जोड़ा गया तथा 11वीं अनुसूची के माध्यम से पंचायतों को 29 विषय सौंपे गए। इस संशोधन की प्रमुख विशेषताएँ हैं—तीन-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था, पंचायती संस्थाओं का पाँच वर्ष का निश्चित कार्यकाल, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण (महिलाओं के लिए न्यूनतम एक-तिहाई), पंचायत चुनावों की देखरेख हेतु राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना, तथा वित्तीय अधिकारों के लिए राज्य वित्त आयोग की व्यवस्था। ग्राम सभा को स्थानीय लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में संवैधानिक मान्यता भी इसी संशोधन से मिली।
- 74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 – नगर निकाय: यह संशोधन शहरी स्थानीय शासन को संवैधानिक ढाँचा प्रदान करने के लिए किया गया। इसके तहत संविधान में भाग IX-A जोड़ा गया तथा 12वीं अनुसूची में नगर निकायों से संबंधित 18 विषय निर्धारित किए गए। नगर निगम, नगरपालिका और नगर पंचायत—शहरों की आकार और प्रकृति के अनुसार—मुख्य संस्थाएँ हैं। पंचायती राज की भांति यहाँ भी पाँच वर्ष का कार्यकाल, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण, तथा चुनावों व वित्तीय प्रबंधन के लिए क्रमशः राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य वित्त आयोग की व्यवस्था की गई। इस संशोधन का उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में विकेंद्रीकरण और नागरिक सहभागिता को मजबूत करना था।
- 42वाँ और 43वाँ संशोधन
- 42वाँ संशोधन (1976) – मिनी संविधान कहा जाता है; इसमें प्रस्तावना, मौलिक कर्तव्य, नीति निदेशक तत्व आदि में बड़े बदलाव किए गए।
- 43वाँ संशोधन (1977) – 42वें संशोधन के कुछ प्रावधानों को आंशिक रूप से वापस लिया।
- 63वाँ और 64वाँ संशोधन: ये संशोधन मुख्यतः राजनीतिक और अन्य संवैधानिक व्यवस्थाओं से जुड़े हैं, स्थानीय शासन संस्थाओं से सीधे नहीं।
- 86वाँ संशोधन (2002): अनुच्छेद 21A द्वारा 6–14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया।
- 87वाँ संशोधन (2003): लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित।
45.“राष्ट्रीय बौद्धिक सम्पदा अधिकार नीति” के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह दोहा विकास एजेन्डा और ट्रिप्स समझौते के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराता है।
- औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग, भारत में बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के विनियमन करने के लिए केंद्रक अभिकरण है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- भारत की राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) नीति, 2016 में लागू की गई थी, जिसका उद्देश्य देश में नवाचार और रचनात्मकता को बढ़ावा देना है:
- दोहा विकास एजेंडा और ट्रिप्स समझौते के प्रति भारत की प्रतिबद्धता: यह नीति भारत की ट्रिप्स (बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलू) समझौते और दोहा विकास एजेंडा के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराती है।
- दोहा विकास एजेंडा विशेष रूप से विकासशील देशों के हितों की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करता है, जैसे कि सस्ती दवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना।
- भारत अपनी आईपीआर नीति के तहत यह सुनिश्चित करता है कि बौद्धिक संपदा अधिकारों का संरक्षण करते समय सार्वजनिक स्वास्थ्य और विकासशील देशों के हितों की भी रक्षा हो।
नोडल एजेंसी – औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी):
- पहले इसे डीआईपीपी (औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग) कहा जाता था, जिसे अब उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) कहते हैं।
- डीपीआईआईटीभारत में सभी प्रकार के बौद्धिक संपदा अधिकारों जैसे पेटेंट, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट, डिज़ाइन, भौगोलिक संकेतक (जीआई) आदि के लिए नोडल एजेंसी है।
- यह विभाग आईपीआर से जुड़े नीतिगत मामलों, जागरूकता अभियानों और IPR से जुड़े अनुपालन का कार्य देखता है।
निष्कर्ष:
- दोनों ही कथन सही हैं। नीति भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का सम्मान करती है और डीपीआईआईटी नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करती है।
- इसलिए सही उत्तर विकल्प (a) 1 और 2 दोनों है
- निम्नलिखित में से कौन-सा जैविक अनुक्रम की प्रावस्थाओं का सही क्रम है?
(a) प्रवास – आस्थापन – प्रतिक्रिया – स्थिरीकरण
(b) प्रवास – प्रतिक्रिया – स्थिरीकरण – आस्थापन
(c) आस्थापन – प्रवास – प्रतिक्रिया – स्थिरीकरण
(d) आस्थापन –प्रवास – स्थिरीकरण – प्रतिक्रिया
उत्तर: (a)
व्याख्या:
जैविक अनुक्रम उस प्राकृतिक प्रक्रिया को कहते हैं जिसमें कोई पारिस्थितिक तंत्र समय के साथ क्रमशः विकसित होता है और अंततः एक स्थायी एवं संतुलित समुदाय तक पहुँच जाता है। यह विकास क्रम चार प्रमुख प्रावस्थाओं में संपन्न होता है, जिसका सही क्रम इस प्रकार है:
- प्रवास: यह अनुक्रम का प्रारम्भिक चरण है। किसी नए अथवा विघटित क्षेत्र — जैसे ज्वालामुखीय लावा, नई बनी मिट्टी, उपेक्षित कृषि भूमि, जमीनी कटाव आदि — पर प्रजातियों के प्रजनन इकाइयों (बीज, बीजाणु, पराग, लार्वा आदि) का पहुँच जाना होता है।
- पहुँचने के साधन: वायु, जल, पशु, मानव-परिवहन।
- उदाहरण: ज्वालामुखीय द्वीपों पर लाईकेन/काई के स्पोर का आना।
यह अवस्था आगे की सभी प्रक्रियाओं का आधार बनती है।
- आस्थापन: प्रवासी इकाइयों में से जो अनुकूल परिस्थितियों को सहन कर पाती हैं, वे वहां अंकुरित होकर स्थापित होती हैं।
- इस चरण में पौधों या अन्य जीवों का विकसित होना, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढलना और पोषण उपलब्ध कराने वाली बुनियादी संरचना तैयार होना शामिल है।
- इस अवस्था में सामान्यतः प्रथम अग्रगामी (Pioneer Species) जैसे लाइकेन, काई, घास आदि सबसे पहले स्थापित होते हैं।
यह चरण क्षेत्र में जीव–समुदाय की नींव रखता है।
- प्रतिक्रिया: यह अवस्था उस समय आती है जब स्थल पर स्थापित जीव पर्यावरण के साथ परस्पर क्रिया कर उसे धीरे-धीरे परिवर्तित करते हैं।
- जीवों की क्रियाएँ—जैसे पत्तियों का गिरना, अपघटन, कार्बनिक पदार्थ का बढ़ना, मिट्टी की संरचना और पोषक चक्र का बदलना—स्थल की प्रकृति को गहराई से प्रभावित करती हैं।
- इन परिवर्तनों से आगे आने वाली प्रजातियों के लिए वातावरण अधिक अनुकूल बनता है और समुदाय क्रमशः जटिल होता जाता है।
इस अवस्था में पारिस्थितिकी तंत्र निरंतर परिवर्तनशील रहता है।
- स्थिरीकरण:यह जैविक अनुक्रम की अंतिम अवस्था है, जहाँ एक संतुलित और अपेक्षाकृत स्थायी समुदाय विकसित हो जाता है।
- इस समुदाय को प्रायः चरमोत्कर्ष समुदाय (Climax Community) कहा जाता है।
- इस अवस्था में प्रजातियों की संरचना स्थिर रहती है, जैवभार (Biomass) अधिक होता है, और पारिस्थितिक संबंध दीर्घकाल तक बने रहते हैं।
- यद्यपि यह अवस्था स्थिर होती है, फिर भी छोटे व्यवधानों के बावजूद समुदाय अपनी संरचना और कार्य को बनाए रखने में सक्षम रहता है।
इस प्रकार, सही क्रम प्रवास → उत्थान → प्रतिक्रिया → स्थिरीकरण है।
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): सापेक्षिक आर्द्रता वायु के तापमान में वृद्धि के साथ घटती है।
कारण (R) : वाष्पीकरण में वृद्धि के साथ निरपेक्ष आर्द्रता में वृद्धि होती है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर:c
व्याख्या:
- अभिकथन (A):सापेक्षिक आर्द्रता हवा के तापमान में वृद्धि के साथ कम हो जाती है। यह कथन सत्य है।
- सापेक्षिक आर्द्रता का अर्थ है हवा में उपस्थित वास्तविक जल वाष्प की मात्रा और हवा की अधिकतम जल वाष्प धारण क्षमता का अनुपात (प्रतिशत में)।
- जब हवा का तापमान बढ़ता है, तो हवा की जल वाष्प धारण क्षमता बढ़ जाती है, लेकिन यदि जल वाष्प की मात्रा स्थिर रहती है, तो सापेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है।
- कारण (R): वाष्पीकरण में वृद्धि के साथ निरपेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है। यह कथन भी सत्य है।
- निरपेक्ष आर्द्रता का अर्थ है हवा में मौजूद जल वाष्प की वास्तविक मात्रा (ग्राम/घन मीटर में)।
- जब वाष्पीकरण बढ़ता है, तो वातावरण में अधिक जल वाष्प पहुंचता है, जिससे निरपेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है।
- कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है। क्योंकि सापेक्षिक आर्द्रता में कमी का कारण मुख्य रूप से तापमान में वृद्धि है, न कि केवल वाष्पीकरण में वृद्धि।
- वाष्पीकरण निरपेक्ष आर्द्रता को प्रभावित करता है, लेकिन इसका सापेक्षिक आर्द्रता पर प्रभाव तभी होता है जब जल वाष्प की मात्रा अपरिवर्तित रहती है और तापमान बढ़ता है।
- इसलिए दोनों कथन सही हैं, लेकिन कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
- निम्नलिखित में से कौन-सा सही सुमेलित है?
(a) हैलोक्लाइन – सागरीय जल तापमान
(b) थर्मोक्लाइन – वायु का तापमान
(c) इकोक्लाइन – जैव–विविधता
(d) पाइक्नोक्लाइन –सागरीय जल घनत्व
उत्तर:(d)
व्याख्या:
- हैलोक्लाइन (Halocline): हैलोक्लाइन समुद्री जल में वह परत है जहाँ गहराई के साथ लवणता में अत्यधिक तीव्र परिवर्तन होता है। यह प्रायः 300 से 1000 मीटर की गहराई के बीच बनती है। लवणता में यह अचानक अंतर समुद्री जल के घनत्व, परतों के गठन और महासागरीय परिसंचरण को प्रभावित करता है। अतः इसे तापमान से जोड़ना गलत है।
- थर्मोक्लाइन (Thermocline): थर्मोक्लाइन महासागर की वह परत है जहाँ गहराई बढ़ने पर तापमान तेजी से गिरता है। यह परिवर्तन 200 से 1000 मीटर तक की गहराई में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह समुद्री जीवों, पोषक तत्वों की उपलब्धता और ध्वनि के प्रसार को सीधे प्रभावित करता है। थर्मोक्लाइन वायु तापमान से नहीं, बल्कि समुद्री जल के तापमान ढाल से संबंधित है।
- इकोक्लाइन : इकोक्लाइन किसी एक ही पारिस्थितिक क्षेत्र में पर्यावरणीय कारकों—जैसे तापमान, नमी, pH, लवणता—के क्रमिक परिवर्तन के साथ जीव समुदायों में होने वाले परिवर्तन को दर्शाता है। यह केवल जैव-विविधता तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिक संरचना और प्रजातीय संरचना में होने वाले बदलाव को प्रतिबिंबित करता है। अतः इसे केवल “जैव-विविधता” से जोड़ना अपूर्ण है।
- पाइक्नोक्लाइन (Pycnocline): पाइक्नोक्लाइन समुद्री जल में घनत्व के तीव्र परिवर्तन की परत है। घनत्व मुख्य रूप से तापमान और लवणता पर निर्भर करता है, और इसी कारण पाइक्नोक्लाइन महासागर की परतबद्धता, पोषक तत्वों की गतिशीलता तथा जल मिश्रण पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। यह सुमेल सही है।
अन्य संबंधित शब्दावली:
| क्रम | शब्द | अर्थ / परिभाषा | किस गुण में परिवर्तन? | प्रमुख प्रभाव / महत्त्व |
| 1 | हैलोक्लाइन | वह परत जहाँ गहराई के साथ लवणता तेजी से बदलती है | लवणता | महासागर की परतबद्धता, घनत्व संरचना, परिसंचरण पर प्रभाव |
| 2 | थर्मोक्लाइन | वह परत जिसमें गहराई बढ़ने पर तापमान तीव्रता से घटता है | तापमान | पोषक तत्वों का वितरण, समुद्री जीवों का जीवन, ध्वनि प्रसार |
| 3 | पाइक्नोक्लाइन | वह परत जहाँ घनत्व तेजी से बदलता है | घनत्व — तापमान + लवणता का संयुक्त प्रभाव | जल का मिश्रण रुकता है, महासागरीय स्तरीकरण मजबूत होता है |
| 4 | इकोक्लाइन | पर्यावरणीय कारकों में क्रमिक परिवर्तन के साथ जीव–समुदायों का बदलना | पारिस्थितिक गुण | वनस्पति, जीव-जंतु और पारिस्थितिकी तंत्र का संक्रमण |
| 5 | केमोक्लाइन | रासायनिक पदार्थों की सांद्रता में तीव्र बदलाव वाली परत | रासायनिक संरचना | ऑक्सीजन बनाम हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी रासायनिक परतें बनती हैं |
| 6 | ऑक्सी-क्लाइन | गहराई के साथ घुलित ऑक्सीजन का तेज़ बदलाव | ऑक्सीजन | समुद्री जीवों का वितरण, मृत क्षेत्र की पहचान |
| 7 | न्यूट्रिक्लाइन | वह परत जहाँ गहराई पर पोषक तत्व तेजी से बढ़ते हैं | पोषक तत्व | फाइटोप्लैंकटन उत्पादन, समुद्री खाद्य-श्रृंखला का आधार |
| 8 | ल्यूमिनोक्लाइन | गहराई के साथ प्रकाश में तीव्र कमी | प्रकाश | महासागर के फोटिक व अफोटिक क्षेत्रों की सीमा तय करता है |
| 9 | पसिक्लाइन / दाब ढाल | गहराई के साथ दाब के तीव्र परिवर्तन का क्षेत्र | दाब | गहन-समुद्री जीवों की अनुकूलन क्षमता व संरचना प्रभावित |
| 10 | जिओक्लाइन | भू-आकृतिक या पर्यावरणीय विशेषताओं में क्रमिक परिवर्तन | भू-पर्यावरण | मिट्टी, वनस्पति, जलवायु आदि में धीरे–धीरे बदलाव का अध्ययन |
| 11 | ज़ीथोक्लाइन | समुद्री जीवों के वितरण में गहराई आधारित परिवर्तन | जीव–वितरण | गहराई के अनुसार जैव विविधता के स्तर निर्धारित करता है |
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची–Ⅰ सूची–ⅠⅠ
- पौधारोपण शाला – 1. हंगरी
- क्रायोफाइट स्टेपी – 2. एडोल्फ एंगलर
- विश्व के पुष्पीय क्षेत्र – 3. सी. ओ. सावर
- d. पुस्ज़ता घास का मैदान – 4. आर्कटिक टुंड्रा
कूट:
A B C D
(a) 1 2 3 4
(b) 3 4 1 2
(c) 4 3 2 1
(d) 3 4 2 1
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- A. पौधारोपण शाला — सी. ओ. सावर
सी. ओ. सावर मानव-निर्मित परिदृश्य और कृषि-उद्भव के अध्ययन के प्रमुख विद्वान माने जाते हैं। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पौधों का घरेलूकरण, चयन, प्रसार और खेती केवल प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानव संस्कृति द्वारा संचालित क्रिया है। उनकी यह विचारधारा उन अध्येताओं की परंपरा से मेल खाती है जिन्हें पौधारोपण शाला कहा जाता है। इसी कारण यह सुमेलन उपयुक्त है।
- B. क्रायोफाइट स्टेपी — आर्कटिक टुंड्रा
क्रायोफाइट स्टेपी उन वनस्पतियों का समूह है जो अत्यंत ठंड, छोटे वृद्धि-काल और परमानंद वाली परिस्थितियों में विकसित होती हैं। आर्कटिक टुंड्रा इसी जलवायु और पर्यावरणीय विशेषताओं वाला क्षेत्र है, जहाँ ठंड-सहिष्णु घासें और झाड़ियाँ पाई जाती हैं। इसलिए क्रायोफाइटिक वनस्पति का सर्वाधिक सटीक उदाहरण आर्कटिक टुंड्रा ही है।
- C. विश्व के पुष्पीय क्षेत्र — एडोल्फ एंगलर
एडोल्फ एंगलर वैश्विक वनस्पति-वितरण और पुष्पीय क्षेत्रीकरण के प्रारंभिक एवं प्रभावशाली सिद्धांतकार थे। उन्होंने विश्व के पौधों को उनके वितरण और विकासात्मक संबंधों के आधार पर क्षेत्रीय समूहों में वर्गीकृत किया। उनके कार्य ने आधुनिक फ्लोरिस्टिक क्षेत्र विभाजन की नींव रखी, इसलिए यह सुमेलन पूरी तरह उपयुक्त है।
- D. पुस्ज़ता— घास का मैदान — हंगरी
पुस्ज़ता हंगरी के महान मैदान में स्थित विस्तृत घासभूमि क्षेत्र का नाम है। यह अर्ध-शुष्क, समतल, चरावनीय घास के मैदानों वाला विशिष्ट यूरोपीय स्टेपी क्षेत्र है। इसकी भौगोलिक और वनस्पतिक विशेषताएँ इसे हंगरी के प्रमुख घासभूमि परिदृश्यों में स्थापित करती हैं। इसलिए पुस्ज़ता — घास का मैदान — हंगरी का सुमेलन सटीक है।
- निम्नलिखित समूहों में से किसमें केवल आगत उपकरण (इनपुट डिवाइस) हैं ?
(a) माउस, कीबोर्ड, स्कैनर
(b) माउस, कीबोर्ड, मॉनिटर
(c) माउस, कीबोर्ड, प्रिंटर
(d) माउस, कीबोर्ड, प्रोजेक्टर
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- इनपुट डिवाइस : वे हार्डवेयर घटक जिनके द्वारा उपयोगकर्ता या बाहरी स्रोत से कम्प्यूटर को डेटा और निर्देश भेजे जाते हैं। उदाहरण: कीबोर्ड, माउस, माइक्रोफोन, स्कैनर, वेबकैम, टच-स्क्रीन (इनपुट मोड में), फिंगरप्रिंट रीडर, जॉयस्टिक, बारकोड रीडर आदि।
- आउटपुट डिवाइस : वे घटक जिनके द्वारा कम्प्यूटर प्रसंस्कृत जानकारी / परिणाम उपयोगकर्ता को प्रदान करता है। उदाहरण: मॉनिटर, प्रिंटर, स्पीकर, प्रोजेक्टर।
- इन्पुट-आउटपुट या हाइब्रिड डिवाइस: कुछ डिवाइस दोनों भूमिका निभाते हैं — इनपुट भी और आउटपुट भी; जैसे टच-स्क्रीन (यह टच-इनपुट भी लेती है तथा स्क्रीन के रूप में आउटपुट भी देती है), नेटवर्क कार्ड, स्टोरेज डिवाइस (हार्ड-डिस्क, यू-एसबी ड्राइव) इत्यादि।
- माउस: पॉइंटर नियंत्रण और क्लिक/चयन के लिए इनपुट उपकरण।
- कीबोर्ड: वर्ण, संख्याएँ और नियंत्रक कुंजियों द्वारा निर्देश/डेटा इनपुट करता है।
- स्कैनर: कागज़ के दस्तावेज़/छवियों को डिजिटल डेटा में बदलकर कम्प्यूटर में इनपुट करता है।
- मॉनिटर एक आउटपुट डिवाइस है (डाटा/ग्राफिक्स प्रदर्शित करता है)।
- प्रिंटर आउटपुट डिवाइस है (कम्प्यूटर के डेटा को हार्ड-कॉपी में बदलता है)।
- प्रोजेक्टर भी आउटपुट डिवाइस है (मॉनिटर की तरह स्क्रीन पर प्रदर्शन करता है)।
- कम्प्यूटर मेमोरी का वह कौन-सा भाग है जो विद्युत आपूर्ति बाधित होने पर भी अपरिवर्तनशील रहता है?
(a) ROM
(b) REM
(c) RAM
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- अस्थायी स्मृति (volatile memory) वह होती है जिसमें संरक्षित डेटा बिजली बंद होते ही नष्ट हो जाता है। इसके विपरीत स्थायी या अपरिवर्तनीय स्मृति (non-volatile memory) बिजली कटने पर भी अपनी जानकारी सुरक्षित रखती है। RAM अस्थायी स्मृति का उदाहरण है, जबकि ROM और इसके आधुनिक रूप non-volatile स्मृति के अंतर्गत आते हैं।
- ROM वह स्मृति है जिसमें स्थायी निर्देश या फ़र्मवेयर पहले से लिखे रहते हैं और ये बिजली हटने पर भी नष्ट नहीं होते। ROM के प्रकार—जैसे Mask ROM, PROM, EPROM, EEPROM तथा फ्लैश स्मृति—अपनी भौतिक संरचना या इलेक्ट्रॉनिक चार्ज के कारण डेटा को स्थायी रूप से सुरक्षित रखते हैं। यही कारण है कि ROM को non-volatile कहा जाता है।
- RAM कार्यरत प्रोसेसिंग के लिए CPU की तात्कालिक कार्य-स्मृति है और यह बिजली हटते ही डेटा खो देती है। इसके विपरीत ROM स्थायी निर्देशों का भंडार है, जिसमें संग्रहीत सामग्री बिजली-रहित स्थिति में भी बनी रहती है। एक ओर RAM मुख्यतः अस्थायी उपयोग के लिए है, वहीं ROM सिस्टम के बूट और फ़र्मवेयर संचालन का आधार है।
- आधुनिक कंप्यूटर और मोबाइल उपकरणों में ROM के स्थान पर EEPROM या फ्लैश स्मृति प्रयोग की जाती है, जहाँ BIOS/UEFI व फ़र्मवेयर सुरक्षित रहता है। हार्ड-डिस्क और SSD भी non–volatile होते हैं, परंतु वे मेमोरी नहीं बल्कि स्थायी भंडारण (storage) की श्रेणी में आते हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में बैटरी-समर्थित RAM या NVRAM का उपयोग होता है, पर इन्हें ROM नहीं माना जाता।
- निम्नलिखित में से कौन-सा फारेनहाइट (ºF ) तथा सेल्सियस डिग्री के बीच सही संबंध दर्शाता है? (ºC )
(a) °F= °C – 273 ∙ 15
(b) °F = 9/5 C + 32
(c) °C = 9/5 °F + 32
(d) °C= °F – 273 ∙ 15
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- फारेनहाइट (°F) और सेल्सियस (°C) के बीच संबंध इस प्रकार होता है:
- °𝐹=(9/5×°𝐶)+32
- इस सूत्र के माध्यम से सेल्सियस (°C) से फारेनहाइट (°F) में तापमान परिवर्तन किया जा सकता है।
अन्य विकल्प गलत हैं:
- (a) और (d) में अनुचित रूप से तापमान को जोड़ने और घटाने की कोशिश की गई है।
- (c) का सूत्र गलत है क्योंकि सेल्सियस और फारेनहाइट के बीच सही रूपांतरण नहीं दिखाता।
- निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
(a) डी.एन.ए. की कार्यात्मक इकाई को जीन कहते हैं।
(b) क्रोमोसोम संततियों के लिए सूचनाएँ रक्षित रखते हैं।
(c) क्रोमोसोम डी.एन.ए. तथा प्रोटीन से बने होते हैं।
(d) किसी कोशिका का केन्द्रक कोशिकीय विभाजन/प्रजनन में हिस्सा नहीं लेता है।
उत्तर: (d)
व्याख्या:
(a) डी.एन.ए. की कार्यात्मक इकाई को जीन कहते हैं। — सही
- जीन, पारंपरिक परिभाषा अनुसार, डी.एन.ए. का वह अनुक्रम है जो किसी निश्चित प्रोटीन या किसी कार्यात्मक आरएनए (जैसे आरआरएनए , टीआरएनए) के निर्माण के लिए जानकारी प्रदान करता है।
- जीन में प्रमोटर, कोडिंग क्षेत्र (एक्सोन/इंट्रॉन), और नियामक अनुक्रम होते हैं जो उस जीन के अभिव्यक्ति को नियंत्रित करते हैं।
- अतः जीन को आनुवंशिक सूचना की मौलिक कार्यात्मक ईकाई माना जाता है।
(b) क्रोमोसोम संततियों के लिए सूचनाएँ रक्षित रखते हैं। — सही
- क्रोमोसोम वास्तव में आनुवंशिक जानकारी के वाहक होते हैं; प्रत्येक क्रोमोसोम में अनेक जीन स्थित होते हैं।
- माता-पिता से संततियों तक वंशानुगत सूचनाएँ क्रोमोसोम के माध्यम से ही स्थानांतरित होती हैं — डी.एन.ए. की प्रतिकृति (S-चरण) के बाद विभाजन के दौरान ये सूचनाएँ संतानों में पहुँचती हैं।
- इसलिए यह कथन वैध और सही है।
(c) क्रोमोसोम डी.एन.ए. तथा प्रोटीन से बने होते हैं। — सही
- ईयूकेरियोटिक कोशिकाओं में क्रोमोसोम एक जटिल संरचना है, जिसका मुख्य घटक डी.एन.ए. और प्रोटीन (विशेषकर हिस्टोन प्रोटीन एवं अन्य गैर-हिस्टोन प्रोटीन) होता है।
- डी.एन.ए. स्वतंत्र रूप से लंबे तार की तरह नहीं रहता; यह न्यूक्लियोसोम बनाकर हिस्टोन के चार जोड़ों के चारों ओर लपेटा जाता है — यही प्राथमिक पैकिंग इकाई है। उच्च स्तरों पर यह और घनिष्ठ रूप से सिकुड़कर क्रोमोसोम बनाते हैं।
- प्रोटीन-डी.एन.ए. अन्तरक्रिया क्रोमोसोम की संरचना, डी.एन.ए. की पहुँच और जीन अभिव्यक्ति को नियंत्रित करती है। अतः यह कथन भी सही है।
(d) किसी कोशिका का केन्द्रक कोशिकीय विभाजन/प्रजनन में हिस्सा नहीं लेता है। — गलत
- केंद्रक ईयूकेरियोटिक कोशिका का आनुवंशिक नियंत्रणकेंद्र होता है—इसमें क्रोमोसोम तथा डी.एन.ए स्थित रहते हैं। कोशिकीय प्रजनन (माइटोसिस/मियोसिस) के प्रमुख घटनाक्रम केन्द्रक-आधारित ही होते हैं:
- S-चरण में डी.एन.ए. की प्रतिकृति केंद्रक के अंदर ही बनती है।
- माइटोसिस में क्रोमोसोम संकुचित होकर दिखाई देते हैं, नाभिकीय झिल्ली टूटती/पुनर्रचित होती है, स्पिंडल तंतु क्रोमोसोमों को विभाजित करते हैं और प्रत्येक पुत्र-कोशिका को एक-एक समुच्चय क्रोमोसोम मिलते हैं।
- मियोसिस में जोड़ों का संघटन, क्रॉसिंग-ओवर और फिर क्रमिक विभाजन भी केंद्रक में होने वाली घटनाओं से आरम्भ/नियंत्रित होते हैं।
- यदि किसी ईयूकेरियोटिक कोशिका से केंद्रक हटा दिया जाए, तो वह कोशिका अधिकांशतः विभाजन करने में असमर्थ रहती है—उदाहरण के लिए परिपक्व मानव लाल रक्त-कोशिकाएँ केन्द्रकहीन होती हैं और विभाजित नहीं हो पातीं।
अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य:
- प्रोकैरियोट्स (बैक्टिरिया, आर्किया) में कोशिका का स्पष्ट झिल्लीयुक्त केन्द्रक नहीं होता; वहाँ आनुवंशिक पदार्थ न्युकेलॉइड में रहता है और विभाजन बिना नाभिकीय माइटोसिस के साधारणतः अलग तरह से होता है। प्रश्न का आशय सामान्यतः ईयूकैरियोटिक कोशिकाओं से है, जहाँ केन्द्रक अनिवार्य है।
- क्रोमोसोम की रचना: डी.एन.ए. + हिस्टोन (H2A, H2B, H3, H4) → न्यूक्लियोसोम → कॉइल्स → क्रोमोसोम।
- जेनेटिक सूचना का प्रवाह: डी.एन.ए (जीन) → आरएनए → प्रोटीन (केंद्रीय डॉग्मा का सामान्य सार)।
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) और दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): CO₂, SO₂ और NO₂ गैसे वर्षा जल में घुल जाती हैं और अम्लीय वर्षा उत्पन्न करती
कारण (R) : कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन के ऑक्साइड जैसी गैसों की उच्च सांद्रता के कारण वायुमंडलीय वायु प्रदूषित होती है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: ( c)
व्याख्या:
- अभिकथन (A):
- CO₂, SO₂ और NO₂ गैसें वर्षा के पानी में घुल जाती हैं और अम्लीय वर्षा उत्पन्न करती हैं। यह कथन सत्य है।
- जब ये गैसें (कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड) वायुमंडल में जल वाष्प के साथ क्रिया करती हैं, तो ये अम्ल बनाती हैं:
- CO₂ + H₂O → H₂CO₃ (कार्बोनिक अम्ल)
- SO₂ + H₂O → H₂SO₃ (सल्फ्यूरस अम्ल)
- NO₂ + H₂O → HNO₃ (नाइट्रिक अम्ल)
- ये अम्लीय यौगिक वर्षा के जल के साथ मिलकर अम्लीय वर्षा का कारण बनते हैं।
- कारण (R):
- कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन के ऑक्साइड जैसी गैसों की उच्च सांद्रता के कारण वायुमंडलीय वायु प्रदूषित होती है। यह कथन भी सत्य है।
- ये गैसें मुख्य रूप से उद्योगों, वाहनों और कोयला जलाने जैसी मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न होती हैं।
- ये वायुमंडल में प्रदूषण फैलाने के साथ–साथ अम्लीय वर्षा का भी कारण बनती हैं।
- क्या (R), (A) की सही व्याख्या है?
- कारण (R) स्पष्ट करता है कि वायुमंडल में इन प्रदूषक गैसों की उच्च सांद्रता ही अम्लीय वर्षा (जैसा कि अभिकथन (A) में बताया गया है) का मुख्य कारण है।
- जब ये गैसें जल वाष्प के साथ मिलती हैं, तो अम्लीय वर्षा उत्पन्न होती है, जो पर्यावरण को प्रभावित करती है।
इसलिए दोनों कथन सही हैं और कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या भी करता है।
- भारत सरकार द्वारा प्रारम्भ की गई निम्नलिखित योजनाओं को कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए और नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
- समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम
- स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना
- राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम
- प्रधानमंत्री जन-धन योजना
कूट :
(a) 4, 3, 1, 2
(b) 2, 3, 4, 1
(c) 1, 2, 3, 4
(d) 3, 4, 1, 2
उत्तर: c
व्याख्या:
1) समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम — 1978–79
- परिचय व वर्ष: IRDP को 1978–79 में गरीबी उन्मूलन और ग्रामीण लोगों को स्वरोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।
- लक्ष्य: गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे परिवारों को आर्थिक सहायता, क्रेडिट, प्रशिक्षण तथा संसाधन उपलब्ध कराकर उनकी आय के स्थायी स्रोत बनाना।
- मुख्य विशेषताएँ: लक्ष्य समूह को सब्सिडी, बैंक ऋण और तकनीकी सहायता; परिवार-आधारित स्वरोजगार मॉडल; पशुपालन, सिंचाई, हस्तशिल्प आदि के जरिए अर्थोन्नति।
- प्रशासन: इसे ग्रामीण विकास मंत्रालय/सम्बंधित विभाग द्वारा लागू किया गया।
- महत्व: स्वतंत्रता-उपरांत प्रथम पीढी की प्रमुख समेकित समृद्धि-केंद्रित ग्रामीण योजना मानी जाती है; बाद में नीतिगत सुधारों में इसका रूपांतरण व पुनर्गठन किया गया।
2) स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोज़गार योजना — 1999 (अप्रैल)
- परिचय व वर्ष: 1999 में भारत सरकार ने IRDP व अन्य संगत योजनाओं के पुनर्गठन के रूप में SGSY लॉन्च की। इसे बाद में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वरोजगार कार्यक्रम (NRLM) में समेकित किया गया।
- लक्ष्य: स्व-रोजगार (self-employment) के माध्यम से ग्रामीण गरीबों को प्रेरित करना; स्व-सहायता समूह (SHG) और समूह आधारित क्रेडिट-लिंक्ड स्वरोजगार पर बल।
- मुख्य विशेषताएँ: सामूहिक स्वरोजगार समूहों के निर्माण, बैंक लिंकिंग, प्रशिक्षण, मार्केटिंग सहायता और पूँजी सब्सिडी; योजना का फोकस आर्थिक स्वरोजगार और खाद्य सुरक्षा पर।
- प्रशासन: ग्राम/ब्लॉक स्तर पर कार्यान्वित; आरम्ब में ग्रामीण विकास/क्षेत्रीय योजनाओं के माध्यम से।
- महत्त्व: ग्रामीण स्वरोजगार की दिशा में समूह/संस्थागत दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया गया; बाद में ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) ने इसे थोप कर आगे बढ़ाया।
3) राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम — 2005 (कानून पारित)
- परिचय व वर्ष: संसद में National Rural Employment Guarantee Act, 2005 पास हुआ; इसे व्यवहारिक रूप से 2 फ़रवरी 2006 से प्रायोगिक रूप में लागू किया गया (बाद में नामकरण में बदलाव: MNREGA)।
- लक्ष्य: ग्रामीण क्षेत्रों में कम से कम एक परिवार के सदस्यों के लिए वार्षिक 100 दिन का गारंटीकृत श्रमिक दिवस (जन-कार्ड धारक) उपलब्ध कराना; ग्रामीण अतिन्यूनता और अस्थायी बेरोज़गारी को कम करना।
- मुख्य विशेषताएँ: अधिकार पर आधारित रोजगार; काम का आदेश देने का अधिकार; वेतन समय पर भुगतान; कार्यों में सार्वजनिक सम्पत्ति निर्माण (जल संरक्षण, वटिकाओं, ग्रामीण अवसंरचना) केंद्रित।
- प्रशासन: मंत्रालय-संबंधित (शुरू में ग्रामीण विकास मंत्रालय) व ब्लॉक/जिला स्तर पर कार्यान्वयन; पारदर्शिता हेतु सूची, पब्लिक रिपोर्टिंग और श्रमिकों का श्रमिक कार्ड/जॉब कार्ड।
- महत्त्व: सामाजिक सुरक्षा के रूप में नई दिशा; रोजगार-गैरंटी का अधिकारात्मक ढांचा जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक कार्यों को जोड़ दिया।
4) प्रधानमंत्री जन-धन योजना (Pradhan Mantri Jan-Dhan Yojana — PMJDY) — 28 अगस्त 2014
- परिचय व वर्ष: 28 अगस्त 2014 को वित्तीय समावेशन (financial inclusion) तथा बैंकिंग पहुँच सुनिश्चित करने हेतु प्रधानमंत्री जन-धन योजना प्रारम्भ की गई।
- लक्ष्य: हर परिवार/वयस्क के पास बैंक खाता हो; डिजिटलीकृत भुगतान, सहकारी बचत और बीमा/पेंशन सहित वित्तीय सेवाओं का सार्वभौम विस्तार।
- मुख्य विशेषताएँ: शून्य बैलेंस में खाता खुलना, ओवरड्राफ्ट सुविधा, आधार-लिंकिंग, RuPay डेबिट कार्ड, दुर्घटना बीमा और जीवन बीमा कवर, वित्तीय साक्षरता अभियान।
- प्रशासन: वित्त मंत्रालय/भारतीय रिज़र्व बैंक व वाणिज्यिक बैंक शाखाओं के सहयोग से।
- महत्त्व: अनबैंक्ड जनसंख्या को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ा; लाभ-वितरण (DBT) के लिए आधार-परक भुगतान चैनल सशक्त बनाए।
- आर्थिक संवृद्धि के सन्दर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- भारतीय अर्थव्यवस्था एक अल्पविकसित अर्थव्यवस्था है।
- भारतीय अर्थव्यवस्थी एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है।
- जे.एम. कीन्स अर्थशास्त्र के जनक हैं।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 2 और 3 सही हैं।
(b) केवल 1 सही है।
(c) केवल 1 और 2 सही हैं।
(d) केवल 3 सही है।
उत्तर: a
व्याख्या:
- भारतीय अर्थव्यवस्था एक अल्पविकसित अर्थव्यवस्था है। — गलत
- आधुनिक विकास-आर्थिक सन्दर्भ में देशों को सामान्यतः विकसित , विकासशील / उभरती) तथा कम-आय/विपन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।
- भारत को आज अधिकांश अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ विकासशील/उभरती अर्थव्यवस्था मानती हैं (उदाहरण: विश्व बैंक ने भारत को लोअर-मिडल-इनकम देश के रूप में वर्गीकृत किया था)। अतः अल्पविकसित शब्द प्राचीन एवं सांकेतिक है और समकालीन विवेचना में उपयुक्त नहीं माना जाता।
- भारत में औद्योगीकरण, सेवा-क्षेत्र का तीव्र विकास, औसत आय-स्तर में निरंतर वृद्धि (लंबी अवधि पर), वैश्वीकरण में भागीदारी व बहुलक आर्थिक ढांचा होने की वजह से यह विकासशील कहा जाता है — यद्यपि बहुत-से सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ (गरीबी, बेरोज़गारी, असमानता, बुनियादी सेवाएँ) अभी भी बने हुए हैं।
- भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है। — सही
- मिश्रित अर्थव्यवस्था का आशय यही है कि उत्पादन के साधन तथा आर्थिक गतिविधियों में सरकारी तथा निजी दोनों सेक्टर की उपस्थिति होती है; बाजार-निर्धारित तंत्र और राज्यगत हस्तक्षेप दोनों साथ रहते हैं।
- स्वतंत्रता के बाद भारत ने योजनात्मक अर्थव्यवस्था तथा सार्वजनिक क्षेत्र के व्यापक नेटवर्क को अपनाया (कृषि, सार्वजनिक उद्योग, बुनियादी ढाँचे सहित)।
- 1991 के बाद उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण नीति के बाद निजी क्षेत्र और बाजार-आधारित नीतियाँ अधिक सक्रिय हुईं।
- मुक्त-बाज़ार संकेतक एवं प्रतिस्पर्धा + लक्षित सरकारी हस्तक्षेप (सार्वजनिक उद्यम, सब्सिडी, सामाजिक सुरक्षा, विनियमन, औद्योगिक नीति)।
- जे.एम. कीन्स अर्थशास्त्र के जनक हैं।— सही (संदर्भ-विशेष)
- जॉन मेनार्ड कीन्स (J. M. Keynes) को आधुनिक समष्टि-अर्थशास्त्र और विशेषकर आधुनिक कीन्सीय अर्थशास्त्र का प्रमुख संस्थापक माना जाता है।
- प्रमुख योगदान: उनकी प्रमुख कृति “The General Theory of Employment, Interest and Money” (1936) ने मांग-संचालित अस्थिरता, बेरोज़गारी के कारण, सरकार के सक्रिय वित्तीय(राजकोषीय) हस्तक्षेप व सरकारी व्यय के माध्यम से सकल माँग को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।
- कीन्सीय विचारों ने द्वितीय-विश्वयुद्ध के बाद अधिकांश विकसित अर्थव्यवस्थाओं की फिस्कल-पॉलिसी और सामाजिक वेल्फेयर-मापदंडों को प्रभावित किया; आर्थिक मंदी पर सरकारी व्यय व चालू घाटे के माध्यम से पुनरुद्धार की नीति-रचना का आधार बने।
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अधिकथन (A): राष्ट्रीय मुद्रा का वह मूल्य जो विदेशी मुद्रा की माँग और आपूर्ति द्वारा तय होता है, उसे नम्य विनिमय दर कहते हैं।
कारण (R): विदेशी मुद्रा की माँग और आपूर्ति केन्द्रीय बैंक द्वारा निर्धारित होती है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- अभिकथन कहता है कि राष्ट्रीय मुद्रा का मूल्य यदि विदेशी मुद्रा की मांग–आपूर्ति से निर्धारित हो, तो उसे नम्य या लचीली विनिमय दर कहा जाता है। यह कथन सही है, क्योंकि फ्लोटिंग विनिमय दर प्रणाली में मुद्रा का मूल्य बाज़ार की शक्तियों द्वारा तय होता है। माँग और आपूर्ति में परिवर्तन सीधे विनिमय दर को प्रभावित करते हैं, इसलिए अभिकथन आर्थिक सिद्धांत के अनुरूप है।
- कारण कहता है कि विदेशी मुद्रा की मांग और आपूर्ति केंद्रीय बैंक द्वारा निर्धारित होती है। यह कथन सामान्यतः गलत है। विदेशी मुद्रा की मांग–आपूर्ति व्यापार, निवेश, पूँजी प्रवाह, रेमिटेंस, ब्याज दरों और अपेक्षाओं जैसे अनेक बाज़ार-आधारित कारकों से तय होती है। केंद्रीय बैंक केवल हस्तक्षेप कर बाजार को प्रभावित कर सकता है, पर मूल निर्धारण बाजार-बलों द्वारा ही होता है। इसलिए R का कथन तथ्यगत रूप से असत्य है।
- पूर्णतः फ्लोटिंग व्यवस्था में विनिमय दर पूरी तरह बाजार पर निर्भर रहती है, इसलिए यहाँ R गलत है। मैनेज्ड फ्लोट में केंद्रीय बैंक समय–समय पर हस्तक्षेप करता है, फिर भी मांग–आपूर्ति का आधार बाज़ार ही है। स्थिर विनिमय दर या पेग्ड व्यवस्था में केंद्रीय बैंक दर को बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप करता है, पर इससे भी वह मांग–आपूर्ति का स्थायी निर्धारक नहीं बन जाता। अतः सामान्य संदर्भ में R गलत ही माना जाएगा।
- मुद्रा की मांग बढ़ाने वाले प्रमुख कारक हैं—आयात में वृद्धि, विदेशी निवेश का बाहर जाना, कम घरेलू ब्याज दरें, अवमूल्यन की अपेक्षा और सट्टा क्रियाएँ। इसके विपरीत मुद्रा की आपूर्ति निर्यात, विदेशी निवेश (FDI, FPI), रेमिटेंस और विदेशी ऋण–सहायता से बढ़ती है। केंद्रीय बैंक इन प्रवाहों को नीति के माध्यम से प्रभावित कर सकता है, पर इन्हें संचालित नहीं करता।
- इसलिए सही उत्तर विकल्प (a) (A) सत्य है, लेकिन (R) असत्य है।
- भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए:
- बैंकों का राष्ट्रीयकरण
- क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का गठन
- बैंक शाखाओं द्वारा गाँवों को गोद लेना
उपर्युक्त घटनाओं में से किसे/किन्हें “भारत में वित्तीय समावेशन” प्राप्त करने के लिए उठाया गया कदम माना जा सकता है?
(a) केवल 3
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- बैंकों का राष्ट्रीयकरण (1969 एवं 1980) :
बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मुख्य उद्देश्य बैंकिंग को व्यापक सामाजिक–आर्थिक लक्ष्यों से जोड़ना था। 1969 में 14 प्रमुख बैंकों और 1980 में कुछ अन्य बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद शाखाओं का तेजी से विस्तार हुआ, विशेषकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में। प्राथमिकता क्षेत्र को ऋण उपलब्ध कराने की नीति मजबूत हुई, जिससे किसानों, लघु उद्योगों और कमजोर वर्गों को अधिक औपचारिक वित्त मिला। इस प्रक्रिया ने बैंकिंग तंत्र को केवल लाभ-उन्मुख न रखकर विकास-उन्मुख बनाया और वित्तीय समावेशन के ढांचे को व्यापक रूप से आगे बढ़ाया। - क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (1975) :
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना ग्रामीण वित्तीय आवश्यकताओं को लक्षित करते हुए की गई। इन बैंकों का उद्देश्य था छोटे किसानों, मजदूरों और ग्रामीण उद्यमियों को सस्ती और सुलभ बैंकिंग सेवाएँ उपलब्ध कराना। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ऋण और बैंकिंग उत्पादों को ढालने की क्षमता के कारण RRBs ने गाँव–स्तरीय वित्तीय पहुँच को मजबूत किया। इनके माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ऋण–उपलब्धता बढ़ी और वित्तीय समावेशन की नींव और गहरी हुई। - गाँव गोद लेने की पहल (Lead Bank Scheme के अंतर्गत) :
लीड बैंक योजना और उसके अंतर्गत शाखाओं द्वारा गाँवों को गोद लेने जैसी पहलों ने ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय सेवाओं की पहुँच को व्यक्तिगत स्तर तक विस्तारित किया। इन पहलों ने घर–घर खाता खोलने, बचत को बढ़ावा देने और ऋण तथा बीमा सेवाओं को उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे वित्तीय साक्षरता, बैंकिंग उपयोग और औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जुड़ाव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिसने आगे चलकर SHG–लिंकिंग और माइक्रोफाइनेंस मॉडल के लिए आधार तैयार किया।
वित्तीय समावेशन की दिशा में संयुक्त योगदान
इन तीनों कदमों ने वित्तीय समावेशन की प्रक्रिया को बहुआयामी ढंग से आगे बढ़ाया। राष्ट्रीयकरण और RRBs ने संस्थागत ढांचे को मजबूत किया तथा बैंकिंग की उपलब्धता और पहुंच दोनों का विस्तार किया। गाँव-गोद लेने जैसी कार्यक्रमगत पहलों ने सामाजिक स्तर पर बैंकिंग व्यवहार और जागरूकता को बढ़ाया। इन सुधारों ने भविष्य की वित्तीय समावेशन पहलों—जैसे SHG–बैंक लिंकिंग, बिजनेस कोरेस्पॉन्डेंट मॉडल, तथा जन–धन जैसी योजनाओं—के लिए आवश्यक अधोसंरचना और अनुभव प्रदान किया।
- “राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम” के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
- यह 75% ग्रामीण और 50% शहरी जनसंख्या तक विस्तारित होगा।
- इसमें महिलाओं और बच्चों के पोषण समर्थन पर विशेष ध्यान दिया गया है।
- यह 5 जुलाई, 2010 को लागू किया गया था।
कूट :
(a) 1 और 2 सही हैं।
(b) 1, 2 और 3 सही हैं।
(c) 2 और 3 सही हैं।
(d) 1 और 3 सही हैं।
उत्तर: (a)
व्याख्या:
कवरेज प्रावधान (75% ग्रामीण, 50% शहरी)
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के अंतर्गत लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली का राष्ट्रीय कवरेज इस प्रकार निर्धारित किया गया कि ग्रामीण आबादी के अधिकतम 75% और शहरी आबादी के अधिकतम 50% तक सब्सिडीयुक्त अनाज पहुँचाया जाए। केंद्र सरकार प्रत्येक राज्य के लिए यह कवरेज सीमा जनसांख्यिकीय आँकड़ों और गरीबी के आकलन के आधार पर तय करती है। प्राथमिक परिवारों को प्रति व्यक्ति 5 किलोग्राम प्रतिमाह तथा अंत्योदय परिवारों को 35 किलोग्राम प्रतिमाह अनाज उपलब्ध कराने का वैधानिक अधिकार प्रदान किया जाता है। यह कवरेज संरचना देशव्यापी खाद्य सुरक्षा की व्यापकता सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है।
महिलाओं और बच्चों के लिए पोषण–समर्थन
एनएफएसए ने महिलाओं और बच्चों के पोषण से संबंधित कई कार्यक्रमों को कानूनी संरक्षण प्रदान किया। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से प्रसव–पूर्व और प्रसवोत्तर भोजन तथा न्यूनतम ₹6,000 की मातृत्व सहायता उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया। छह माह से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए आईसीडीएस और मध्यान्ह भोजन योजनाओं के अंतर्गत पूरक पोषण की कानूनी गारंटी दी गई, जबकि कुपोषित बच्चों हेतु उच्च पोषण–मानक अनिवार्य किए गए। इस प्रकार अधिनियम खाद्य–सुरक्षा के साथ-साथ मातृ–शिशु पोषण को भी एक वैधानिक अधिकार के रूप में स्थापित करता है।
अधिनियम के लागू होने की तिथि
कथन में उल्लिखित 5 जुलाई 2010 की तिथि गलत है। एनएफएसए वस्तुतः वर्ष 2013 का अधिनियम है, जिसे संसद ने 2013 में पारित किया और वही इसका विधिक प्रवर्तन वर्ष है। अधिनियम में यह व्यवस्था भी दी गई है कि जहाँ विशेष रूप से अन्यथा न कहा गया हो, इसे 5 जुलाई 2013 से प्रभावी माना जाएगा। इस प्रकार एनएफएसए का वास्तविक स्थापना-वर्ष 2013 है, न कि 2010।
अन्य प्रमुख प्रावधान
अधिनियम प्राथमिक और अंत्योदय परिवारों के खाद्यान्न अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है और केंद्र द्वारा वहन की जाने वाली सब्सिडी व मूल्य–निर्धारण से संबंधित प्रावधान जोड़ता है। पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए राज्यों में खाद्य आयोगों, शिकायत–निवारण तंत्र और सामाजिक अंकेक्षण को अनिवार्य बनाया गया है। इन प्रावधानों का उद्देश्य खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम की जवाबदेही और प्रभावशीलता को सुदृढ़ करना है।
- 2011 की जनगणना के अनुसार उनकी जनसंख्या के आधार पर निम्नलिखित राज्यों को अवरोही क्रम में लिखिए:
- बिहार
- आंध्र प्रदेश
- उत्तर प्रदेश
- पश्चिम बंगाल
निम्नलिखित कूट की सहायता से अपना सही उत्तर चुनिए :
(a) 3, 1, 4, 2
(b) 1, 3, 4, 2
(c) 3, 4, 1, 2
(d) 1,3, 2,4
उत्तर: (a)
व्याख्या:
जनगणना 2011 के अनुसार, राज्यों की जनसंख्या के आधार पर अवरोही क्रम इस प्रकार है:
- उत्तर प्रदेश – सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य (199 मिलियन)
- बिहार – दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य (104 मिलियन)
- पश्चिम बंगाल – तीसरा (91 मिलियन)
- आंध्र प्रदेश – चौथा (84 मिलियन)
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर सही उत्तर चुनिए :
सूची–Ⅰ सूची–ⅠⅠ
- मानव विकास रिपोर्ट – 1. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
- विश्व आर्थिक दृष्टिकोण -2. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम
- विश्व निवेश रिपोर्ट – 3. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम
- उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट – 4. व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन
कूट:
A B C D
(a) 2 3 4 1
(b) 1 2 3 4
(c) 3 1 4 2
(d) 3 4 1 2
उत्तर: (c )
व्याख्या:
- मानव विकास रिपोर्ट — यूएनडीपी
मानव विकास रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित की जाती है। यह रिपोर्ट मानव विकास सूचकांक (एचडीआई), जीवन प्रत्याशा, शिक्षा, आय–स्तर, गरीबी, असमानता और लैंगिक विकास से जुड़े व्यापक संकेतकों का विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसका उद्देश्य देशों के सामाजिक–आर्थिक विकास का तुलनात्मक मूल्यांकन करना और नीति–निर्माताओं को मानव–केंद्रित विकास रणनीतियों के लिए दिशा देना है।
- विश्व आर्थिक दृष्टिकोण — आईएमएफ
विश्व आर्थिक दृष्टिकोण अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा वर्ष में सामान्यतः दो बार प्रकाशित किया जाता है। इसमें वैश्विक और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के विकास पूर्वानुमान, मुद्रास्फीति, व्यापार, वित्तीय स्थिरता और जोखिम–मूल्यांकन का विश्लेषण प्रस्तुत किया जाता है। यह दस्तावेज सरकारों, केंद्रीय बैंकों और आर्थिक विश्लेषकों के लिए वैश्विक आर्थिक प्रवृत्तियों को समझने का प्रमुख आधार माना जाता है।
- विश्व निवेश रिपोर्ट — अंकटॉड
विश्व निवेश रिपोर्ट व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (अंकटॉड) द्वारा प्रतिवर्ष जारी की जाती है। इसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह, वैश्विक निवेश रुझान, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गतिविधियाँ, और निवेश–नीतियों के विकास परिणामों पर प्रभाव का विश्लेषण शामिल होता है। यह रिपोर्ट नीतिगत सुधारों और वैश्विक निवेश परिदृश्य को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट — यूएनईपी
उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित की जाती है। यह वर्तमान वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और पेरिस समझौते के तापमान–लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक उत्सर्जन स्तरों के बीच के अंतर का आकलन करती है। साथ ही यह देशों के जलवायु प्रतिज्ञाओं का तुलनात्मक विश्लेषण और आवश्यक नीतिगत कदमों की सिफारिशें प्रस्तुत करती है, जिससे जलवायु–नीति निर्माण को वैज्ञानिक आधार मिल सके।
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): सतत विकास की धारणा को ब्रंटलैंड रिपोर्ट द्वारा लोकप्रिय बनाया गया।
कारण (R) : ब्रंटलैंड रिपोर्ट को “विकास की सीमाओं” के रूप में भी जाना जाता है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- ब्रंटलैंड रिपोर्ट, जिसका आधिकारिक नाम Our Common Future है, 1987 में विश्व आयोग ऑन एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट द्वारा प्रकाशित की गई थी। इसी रिपोर्ट ने सतत विकास की उस व्यापक रूप से स्वीकृत परिभाषा को प्रस्तुत किया, जिसमें वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों से समझौता किए बिना करने पर ज़ोर दिया गया। रिपोर्ट ने पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और विकास—तीनों के अंतर्संबंधों को स्पष्ट करते हुए सतत विकास को वैश्विक नीति-चर्चा का केंद्रीय विषय बना दिया। इसके प्रकाशन के बाद सतत विकास अंतरराष्ट्रीय समझौतों, सम्मेलनों और राष्ट्रीय नीतियों का आधार बना। इसलिए अभिकथन (A) पूर्णतः सही है।
- कारण में कहा गया है कि ब्रंटलैंड रिपोर्ट को विकास की सीमाएँ के नाम से भी जाना जाता है, जो तथ्यात्मक रूप से गलत है। विकास की सीमाएँ (Limits to Growth) एक बिल्कुल अलग रिपोर्ट है, जिसे 1972 में क्लब ऑफ रोम द्वारा प्रकाशित किया गया था। यह वैश्विक संसाधन-संकट, जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक विस्तार पर आधारित मॉडलिंग अध्ययन था। जबकि ब्रंटलैंड रिपोर्ट का उद्देश्य सतत विकास का दार्शनिक और नीतिगत ढांचा प्रस्तुत करना था। दोनों रिपोर्टें पर्यावरण–विकास संबंधों को अलग-अलग दृष्टिकोण और संदर्भ में समझाती हैं, इसलिए ब्रंटलैंड रिपोर्ट को विकास की सीमाएँ कहना गलत है।
- इसलिए, अभिकथन (A) सही है, लेकिन कारण (R) गलत है
- निम्नलिखित सूचियाँ Ⅰ और ⅠⅠ अर्थशास्त्रियों/लेखकों के नाम तथा उनकी पुस्तकों को क्रमशः दर्शाती हैं। सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची–Ⅰ (अर्थशास्त्री/लेखक) सूची–ⅠⅠ (पुस्तक)
- मिर्डल – 1. इकोनॉमिक थ्योरी एंड अंडरडेवलप्ड रीजन्स
- हिर्शमैन – 2. द स्ट्रैटेजी ऑफ इकोनॉमिक डेवलपमेंट
- काल्डर – 3. स्ट्रैटेजिक फैक्टर्स इन इकोनॉमिक डेवलपमेंट
- एडम स्मिथ – 4. द वेल्थ ऑफ नेशन्स
कूट :
A B C D
(a) 2 1 3 4
(b) 3 2 1 4
(c) 1 2 3 4
(d) 2 3 1 4
उत्तर: ( c)
व्याख्या:
- गुन्नार मिर्डल की कृति Economic Theory and Under-Developed Regions (1957) विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के संदर्भ में पारंपरिक आर्थिक सिद्धांतों की सीमाओं को उजागर करती है। मिर्डल ने बताया कि अविकसित क्षेत्रों में आर्थिक प्रक्रियाएँ संचयी कारणन (cumulative causation) के प्रभाव से चलती हैं, जहाँ प्रारंभिक असमानताएँ समय के साथ और गहरी हो जाती हैं। उन्होंने विकास में सांस्कृतिक, सामाजिक और संस्थागत कारकों की निर्णायक भूमिका पर बल देकर नीतिनिर्माताओं को नए विश्लेषणात्मक ढाँचे प्रदान किए।
- एल्बर्ट हिर्शमैन की प्रसिद्ध कृति The Strategy of Economic Development (1958) संतुलित विकास के सिद्धांत की मौलिक आलोचना प्रस्तुत करती है। उन्होंने असंतुलित विकास (unbalanced growth) का विचार रखा, जिसके अनुसार योजनाबद्ध असंतुलन पैदा कर अर्थव्यवस्था में अग्रगामी व प्रत्यावर्ती लिंक-प्रभावों को सक्रिय किया जा सकता है। यह पुस्तक विकास-रणनीतियों को समझने के लिए आधुनिक विकास अर्थशास्त्र की मूलभूत संदर्भ-कृति मानी जाती है।
- निकोलस काल्डर की Strategic Factors in Economic Development (1967) उनके विकास-संबंधी व्याख्यानों और सिद्धांतों का संग्रहीत रूप है। इस कृति में उन्होंने औद्योगिक क्षेत्र, विशेषकर विनिर्माण, को आर्थिक वृद्धि का केंद्रीय इंजन बताया। काल्डर के प्रसिद्ध ग्रोथ लॉज़ (Kaldor’s growth laws) उद्योग-वृद्धि और समग्र आर्थिक विकास के बीच स्थायी संबंध की व्याख्या करते हैं। इस पुस्तक ने औद्योगिकीकरण-आधारित विकास मॉडल को गंभीर वैचारिक आधार प्रदान किया।
- एडम स्मिथ की An Inquiry into the Nature and Causes of the Wealth of Nations (1776) आधुनिक अर्थशास्त्र की आधारशिला मानी जाती है। इसमें उन्होंने श्रम-विभाजन, मुक्त बाज़ार, प्रतिस्पर्धा, मूल्य-निर्धारण और राष्ट्रीय समृद्धि के स्रोतों पर व्यवस्थित सिद्धांत प्रस्तुत किए। स्मिथ की यह रचना न केवल क्लासिकल अर्थशास्त्र की नींव है, बल्कि आज भी आर्थिक नीति, व्यापार और उत्पादन-संबंधी विचारधाराओं को दिशा देती है।
- संशोधनों का उनके कार्यान्वयन के वर्ष से मिलान कीजिए:
- 42वां संशोधन – 1. 1985
- 52वां संशोधन – 2.2011
- 86वां संशोधन – 3.1976
- 96वां संशोधन – 4.2002
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
A B C D
(a) 3 1 4 2
(b) 1 2 3 4
(c) 2 1 3 4
(d) 4 3 2 1
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- 42वाँ संशोधन (1976)
42वाँ संविधान संशोधन (1976) भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे व्यापक और सर्वग्राही संशोधन माना जाता है। यह आपातकाल के काल में पारित हुआ था।
मुख्य प्रावधान: इसमें संवैधानिय़ भरण-सम्बन्धी और कार्यप्रणालीगत कई बड़े परिवर्तन किए गए — जैसे कि संवैधानिक प्रस्तावना में “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्दों का सम्मिलन तथा “एकता और अखंडता” का शब्दान्वय; न्यायपालिका के कुछ अधिकारों पर सीमाएँ लगाने के प्रावधान; मूल अधिकारों और संवैधानिक प्रक्रियाओं में परिवर्तन; साथ ही अनुच्छेद 51A के माध्यम से नैतिक कर्तव्यों को संविधान में जोड़ा गया।
यह संशोधन संवैधानिक संतुलन पर दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाला रहा — बाद के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने कई प्रावधानों की समीक्षा/संसोधन के माध्यम से अधिकार-संतुलन बहाल किया।
- 52वाँ संशोधन (1985)
52वें संशोधन का प्रमुख उद्देश्य भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के भीतर विधायक–दल–बदल की प्रवृत्ति को रोकना था।
मुख्य प्रावधान: इस संशोधन ने संविधान में दसवाँ अनुसूची सम्मिलित कर दी — जिसे आमतौर पर दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है। इस अनुसूची में यह व्यवस्था की गई कि किस स्थिति में किसी विधायक/सांसद को दल–छोड़ने के कारण सज़ा/तालमेल दिया जा सकता है (उदाहरण: पार्टी के निर्देश का उल्लंघन, ट्यूम–बंडल आदि), तथा सदन–अनुशासन बनाये रखने के लिए स्पीकर की प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया।
दल–बदल के कारण सरकारों के अस्थिर होने की समस्या को नियंत्रित करने के लिये यह एक निर्णायक संवैधानिक उपकरण बना।
- 86वाँ संशोधन (2002)
86वें संशोधन (2002) का केन्द्रिक उदेश्य शिक्षा-संबंधी अधिकारों को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करना था।
मुख्य प्रावधान: इस संशोधन ने अनुच्छेद 21A को संविधान में सम्मिलित किया — जिसके अंतर्गत 6 से 14 वर्ष के बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा का संवैधानिक अधिकार दिया गया। साथ ही इससे संबंधित निर्देशात्मक प्रावधानों तथा नागरिकों के कर्तव्यों/राज्य के दायित्वों में भी परिवर्तन किए गए।
इस संशोधन ने शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा देकर स्कूल-पहुंच, सरकारों की जवाबदेही और शिक्षा नीति की प्राथमिकता को संवैधानिक बल प्रदान किया। (इसके अनुपालन हेतु बाद में RTE Act, 2009 भी पारित हुआ।)
- 96वाँ संशोधन (2011)
96वाँ संविधान संशोधन 2011 में लागू हुआ।
प्रमुख प्रभाव: इस संशोधन के तहत संविधान में प्रयुक्त कुछ भाषायी नामों/उपयोक्ताओं में संशोधन किए गये — उदाहरणत: पारंपरिक अंग्रेज़ी नाम “Oriya” को आधिकारिक तौर पर “Odia” के रूप में संविधान में मान्य किया गया। (अतः यह संशोधन भाषायी नामकरण/संगठनात्मक मामलो में समायोजन/संशोधन का उदाहरण है।)
ऐसे तकनीकी–भाषायी परिष्करण संवैधानिक दस्तावेजों की शुद्धता और संस्कृतिक–भाषायी सम्मान का पालन सुनिश्चित करते हैं; 96वें संशोधन ने इसी श्रेणी के छोटे परंतु प्रतीकात्मक परिवर्तन किए।
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-Ⅰ सूची-ⅠⅠ
- सहकारी संघवाद – 1. के.सी. व्हेयर
B . सौदेबाजी संघवाद – 2. आइवर जेनिंग्स
- C. अर्ध संघवाद – 3. मोरिस–जोन्स
- D. केंद्रीकरण प्रवृत्ति वाला संघवाद – 4. ग्रैनविल ऑस्टिन
कूट:
A B C D
(a) 3 2 4 1
(b) 4 3 1 2
(c) 2 4 3 1
(d) 2 1 4 1
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- सहकारी संघवाद — ग्रैनविल ऑस्टिन
ग्रैनविल ऑस्टिन ने भारतीय संविधान की व्याख्या में यह स्पष्ट किया कि भारत का संघवाद केवल शक्ति-विभाजन पर आधारित नहीं है, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग, समन्वय और साझा जिम्मेदारी पर टिका है। उन्होंने योजनागत सहयोग, वित्तीय साझेदारी, संवैधानिक संस्थाओं और अंतर-सरकारी तंत्रों को भारतीय संघवाद की आत्मा बताया। इसी कारण सहकारी संघवाद की व्याख्या ऑस्टिन के विश्लेषण से जुड़ी मानी जाती है।
- सौदेबाजी संघवाद — मॉरिस-जोन्स
मॉरिस-जोन्स ने भारतीय संघीय व्यवस्था के वास्तविक राजनीतिक संचालन को सौदेबाजी संघवाद कहा। उनके अनुसार केंद्र और राज्य कई निर्णयों—विशेषकर वित्तीय, नीतिगत और प्रशासनिक मामलों—में लगातार बातचीत, समझौते और राजनीतिक सौदेबाजी के माध्यम से संतुलन बनाते हैं। भाषा-विन्यास, राज्य-पुनर्गठन और वित्तीय समझौतों जैसे उदाहरण इस दृष्टिकोण को पुष्ट करते हैं। इस प्रकार सौदेबाजी संघवाद की अवधारणा मॉरिस-जोन्स से संबद्ध है।
- अर्ध-संघवाद — के.सी. व्हेयर
के.सी. व्हेयर ने भारत को अर्ध-संघीय राज्य कहा, क्योंकि यद्यपि इसमें संघीय तत्व हैं, लेकिन संविधान में केंद्र की शक्ति अपेक्षाकृत अधिक है। उन्होंने विशेष रूप से गवर्नर की भूमिका, आपातकालीन प्रावधान, अवशिष्ट शक्तियाँ, तथा केंद्र-प्रधान प्रशासनिक और विधायी संरचनाओं को इस अर्ध संघीय स्वरूप का कारण बताया। इसलिए भारत के अर्ध-संघीय चरित्र का विश्लेषण व्हेयर से प्रमुख रूप से जुड़ता है।
- केंद्रीकरण-प्रवृत्ति वाला संघवाद — आइवर जेनिंग्स
आइवर जेनिंग्स ने भारतीय संघवाद की ऐसे स्वरूप के रूप में व्याख्या की जिसमें केंद्र की ओर स्पष्ट झुकाव और केंद्रीकरण की प्रवृत्ति दिखती है। उन्होंने आपातकालीन शक्तियों, संघ-केंद्रित आर्थिक एवं प्रशासनिक संरचना, तथा संघीय ढांचे में राज्यों की सीमित स्वायत्तता को इसका आधार माना। इसी विश्लेषण के कारण केंद्रीकरण-प्रवृत्ति वाले संघवाद की अवधारणा जेनिंग्स से संबद्ध मानी जाती है।
- बलवंत राय मेहता समिति द्वारा अनुशंसित त्रि-स्तरीय पंचायती राज में निम्नलिखित में से कौन–सा एक स्तर नहीं है?
(a) न्याय पंचायत
(b) जिला पंचायत
(c) पंचायत समिति
(d) ग्राम पंचायत
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- भारत में सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952) और राष्ट्रीय विस्तार सेवा (1953) के कमजोर परिणामों की समीक्षा हेतु 1957 में बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया। समिति का मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि योजनाओं और विकास प्रशासन को अधिक प्रभावी तरीके से कैसे ग्राम-स्तर तक पहुँचाया जाए।
- समिति ने पाया कि मौजूदा विकास कार्यक्रम अत्यधिक केंद्रीकृत थे और स्थानीय जनसहभागिता नगण्य थी। इसलिए प्रशासनिक विकेंद्रीकरण को संरचनात्मक रूप से पुनर्गठित करने की आवश्यकता महसूस की गई।
बलवंत राय मेहता समिति ने भारत में आधुनिक पंचायती राज व्यवस्था की नींव रखते हुए तीन-स्तरीय व्यवस्थात्मक ढाँचा प्रस्तावित किया। 1959 में राजस्थान प्रथम राज्य था जिसने समिति की सिफारिशों के आधार पर पंचायती राज लागू किया। इसके बाद आंध्र प्रदेश ने इसे लागू किया। बाद में 73वाँ संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से पंचायती राज को संविधानिक दर्जा मिला।
(i) ग्राम पंचायत (Village Panchayat) – ग्राम स्तर
- स्थानीय निर्वाचित निकाय
- विकास योजनाओं का क्रियान्वयन और ग्राम समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना
- समिति की दृष्टि में यह “मूल इकाई” (basic unit) है, जो लोकतंत्र को नीचे तक विस्तारित करती है।
(ii) पंचायत समिति (Panchayat Samiti) – खंड / ब्लॉक स्तर
- विकास योजनाओं का समन्वय
- ग्राम पंचायतों की निगरानी
- समिति ने इसे “कार्यकारी प्राधिकरण (Executive authority)” माना।
(iii) जिला पंचायत / जिला परिषद (Zila Parishad) – जिला स्तर
- जिला स्तर पर नीति-निर्धारण
- विभिन्न पंचायत समितियों का समन्वय
- इसे सलाहकार और निरीक्षणीय निकाय माना गया।
न्याय पंचायतें ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे नागरिक और फौजदारी विवादों को सुलझाने हेतु अलग उद्देश्य वाले न्यायिक निकाय हैं। यह विकास प्रशासन या स्थानीय स्वशासन के ढाँचे का हिस्सा नहीं थीं।
बलवंत राय मेहता समिति का मूल कार्य पंचायतों के विकासात्मक एवं प्रशासनिक ढाँचे को सुझाना था, न्यायिक संरचना को नहीं। अतः समिति ने न्याय पंचायत को अपनी त्रि-स्तरीय अनुशंसा में शामिल नहीं किया। इसीलिए न्याय पंचायत त्रि-स्तरीय पंचायती राज संरचना का हिस्सा नहीं है।
- लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के अनुसार, लोकपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिशें प्राप्त करने के बाद की जाएगी, जिसके अध्यक्ष प्रधान मंत्री होंगे तथा जिसमें अन्य लोगों के अलावा, निम्नलिखित शामिल होंगे :
- भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामनिर्दिष्ट उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश
- राज्य सभा के सभापति
- लोक सभा अध्यक्ष
- लोक सभा में विपक्ष का नेता
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 1, 3 और 4
(b) 1, 2, 3 और 4
(c) 1, 2 और 3
(d) 2, 3 और 4
उत्तर: (a)
व्याख्या:
लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के अनुसार लोकपाल की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। यह नियुक्ति सीधे राष्ट्रपति के विवेक से नहीं, बल्कि एक उच्चस्तरीय चयन समिति की अनुशंसा पर आधारित होती है। यह प्रावधान भ्रष्टाचार-निरोधक संस्थागत व्यवस्था को विधिक, प्रशासनिक और राजनीतिक वैधता प्रदान करता है।
चयन समिति की संरचना (Section 4(1))
- लोकपाल चयन समिति चार सदस्यों से मिलकर बनी है—प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता, तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित एक सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश। यह संरचना कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के संतुलित प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करती है, जिससे चयन प्रक्रिया में निष्पक्षता और बहुदलीय चरित्र बना रहता है।
- लोकपाल चयन समिति में राज्यसभा सभापति (उपराष्ट्रपति) को शामिल नहीं किया गया है। इसका कारण यह है कि लोकपाल का दायरा मुख्यतः कार्यपालिका की जवाबदेही और लोकसभा-आधारित लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व से जुड़ा माना गया है। समिति की संरचना विशेष रूप से उन संस्थाओं को केंद्र में रखती है जो प्रत्यक्ष रूप से सरकारी कार्यकलापों की निगरानी और नियंत्रण में भूमिका निभाती हैं, इसलिए राज्यसभा अध्यक्ष इसमें सदस्य नहीं होते।
चयन समिति की भूमिका और महत्व
- यह समिति लोकपाल की नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष, बहुदलीय और न्यायिक-निगरानी युक्त बनाती है। इससे लोकपाल संस्था को नैतिक और वैधानिक वैधता प्राप्त होती है। भ्रष्टाचार-निरोधक तंत्र को मजबूत बनाने, उच्च पदाधिकारियों की जवाबदेही बढ़ाने, और शासन में जनविश्वास सुदृढ़ करने में यह चयन समिति केंद्रीय भूमिका निभाती है।
68.ग्रीनहाउस गैस (जी.एच.जी.) उत्सर्जन में कटौती के संबंध में जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आई.पी.सी.सी.) किस पर जोर देता है?
- क्रमिक और सीमित कटौती पर्याप्त हैं।
- गहरी, तीव्र और निरन्तर कटौती आवश्यक हैं।
नीचे दिए गए कट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 2
(b) केवल 1
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- कथन 1 गलत है: आईपीसीसी की 1.5°C विशेष रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि उत्सर्जन में केवल क्रमिक, धीमी या सीमित कटौतियाँ तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे धीमे सुधार हमें उन उत्सर्जन–मार्गों पर बनाए रखते हैं जो वैश्विक तापमान को 2°C या उससे अधिक बढ़ा देंगे। इससे हिम–पिघलन, समुद्र–स्तर वृद्धि, चरम मौसम घटनाओं और पारिस्थितिक प्रणालियों के विघटन का जोखिम गंभीर रूप से बढ़ जाता है। आईपीसीसी के मॉडल दर्शाते हैं कि लक्ष्य प्राप्ति हेतु 2030 तक वैश्विक उत्सर्जन में लगभग 43% की कमी आवश्यक है, जबकि क्रमिक कटौतियाँ हमें 2.7°C या अधिक तापमान वृद्धि की दिशा में ले जाती हैं।
- कथन 2 सही है: आईपीसीसी यह स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए गहन, तीव्र और सतत् उत्सर्जन कटौतियाँ अत्यावश्यक हैं। गहरी कटौतियों का अर्थ है कि 2030 तक CO₂ उत्सर्जन को लगभग आधा करना और 2050 तक वैश्विक स्तर पर नेट–ज़ीरो पर पहुँचना। तीव्र कटौती विशेष रूप से मीथेन और अन्य अल्प–आयु वाले ग्रीनहाउस गैसों पर आवश्यक है, क्योंकि इन गैसों की कमी तापमान वृद्धि पर तत्काल प्रभाव डालती है। इसके अतिरिक्त, इन कटौतियों को आने वाले कई दशकों तक निरंतर बनाए रखना आवश्यक है; रुक–रुक कर की गई कार्रवाइयाँ तापमान स्थिरीकरण लक्ष्य को अप्राप्त बना देंगी।
- यदि उत्सर्जन में गहन और निरंतर कटौती नहीं की गई, तो वैश्विक तापमान 1.5°C से ऊपर बढ़ जाएगा, जिससे पृथ्वी के महत्वपूर्ण हिम–तंत्र जैसे ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका अस्थिर हो सकते हैं। समुद्र–स्तर वृद्धि तेज होगी और तटीय आबादी के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न होंगे। गर्मी की तीव्रतर लहरें, सूखा, बाढ़, चक्रवात और अन्य चरम मौसम घटनाओं की आवृत्ति और प्रखरता बढ़ेगी। साथ ही, पारिस्थितिक तंत्रों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा और जैव विविधता के बड़े हिस्से के विलुप्त होने का खतरा बढ़ जाएगा। यही कारण है कि आईपीसीसी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में गहन, तीव्र और सतत कटौती को अनिवार्य मानता है।
- “अनाज उपज” शब्द का तात्पर्य क्या है?
- काटी गई भूमि के प्रति इकाई क्षेत्र में उत्पादित अनाज फसलों की मात्रा
- किसी दिए गए देश में अनाज फसलों का कुल उत्पादन
नीचे दिए गए कट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 2
(b) केवल 1
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b)
व्याख्या:
-
- अनाज उपज का आशय किसी विशिष्ट भू–क्षेत्र, सामान्यतः प्रति हेक्टेयर, से प्राप्त अनाज की मात्रा से होता है। यह कृषि उत्पादकता का प्रत्यक्ष माप है और बताता है कि भूमि की एक इकाई से कितनी फसल उत्पन्न हुई। उदाहरण के रूप में, यदि एक हेक्टेयर भूमि से 35 क्विंटल गेहूँ प्राप्त होता है, तो उपज 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर कही जाएगी।
- कथन 1 सही है
कथन 1 में उपज को काटी गई भूमि के प्रति इकाई क्षेत्र में प्राप्त अनाज की मात्रा कहा गया है, जो मूलभूत परिभाषा से पूरी तरह मेल खाता है। कृषि विज्ञान में उपज हमेशा क्षेत्र–विशिष्ट होती है—जैसे गेहूँ, धान या मक्का की उपज को क्विंटल या किलोग्राम प्रति हेक्टेयर में व्यक्त किया जाता है। यही माप दर्शाता है कि खेती कितनी दक्षता से हुई और भूमि का उपयोग कितना प्रभावी रहा।
- कथन 2 गलत है
कथन 2 में उपज को देश के कुल अनाज उत्पादन के रूप में बताया गया है, जबकि यह उत्पादन (Production) की परिभाषा है, उपज (Yield) की नहीं। कुल उत्पादन किसी देश या राज्य में प्राप्त समस्त अनाज की मात्रा को दर्शाता है, जबकि उपज उत्पादन को क्षेत्रफल से विभाजित करने पर प्राप्त होती है। उदाहरण: भारत का कुल गेहूँ उत्पादन 110 मिलियन टन है (उत्पादन), जबकि औसत उपज 3.5 टन प्रति हेक्टेयर हो सकती है (उपज)।
- उपज कृषि नीति, तकनीक और संसाधन उपयोग की दक्षता को आंकने का मूल आधार है। उच्च उपज किस्मों की प्रभावशीलता, उर्वरक–सिंचाई–मशीनरी का योगदान और हरित क्रांति जैसे सुधारों के परिणाम इसी सूचक से मापे जाते हैं। राज्यों अथवा देशों के बीच कृषि–दक्षता की तुलना भी उपज के आधार पर ही की जाती है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कुल उत्पादन अधिक होने का अर्थ यह नहीं कि उपज भी अधिक हो; उत्पादन क्षेत्रफल बढ़ने से भी बढ़ सकता है, जबकि उपज भूमि–उत्पादकता को दर्शाती है।
70.जुलाई-सितम्बर, 2019 और जुलाई-सितम्बर, 2022 के बीच भारत में बेरोजगारी दर की प्रवृत्ति के संबंध में निम्नलिखित में से
कौन-सा कथन सही है?
- यह स्थिर रही।
- यह घट गई।
नीचे दिए गए कट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 1 और 2 दोनों सही हैं।
(b) 1 सही है और 2 गलत है।
(c) 2 सही है और 1 गलत है।
(d) 1 और 2 दोनों गलत हैं।
उत्तर: (c)
व्याख्या:
देश में बेरोज़गारी से संबंधित आधिकारिक आँकड़े राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा संचालित आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) से प्राप्त होते हैं। यह सर्वेक्षण तिमाही और वार्षिक दोनों स्तरों पर रोजगार–बेरोज़गारी की स्थिति प्रस्तुत करता है और नीति–निर्माण के लिए मानक डेटा प्रदान करता है।
2019 बनाम 2022: बेरोज़गारी दर का तथ्यात्मक तुलना
| वर्ष | बेरोज़गारी दर |
| जुलाई–सितंबर 2019 | 8.3% |
| जुलाई–सितंबर 2022 | 7.2% |
पीएलएफएस की जुलाई–सितंबर तिमाही के अनुसार, 2019 में बेरोज़गारी दर 8.3 प्रतिशत थी, जबकि 2022 में यह घटकर 7.2 प्रतिशत हो गई। यह स्पष्ट रूप से बताता है कि तीन वर्षों की अवधि में बेरोज़गारी दर में कमी दर्ज हुई है। इसलिए 2019 से 2022 के बीच बेरोज़गारी स्थिर नहीं रही बल्कि वास्तव में कम हुई है।
कथन 1 गलत है: कथन 1 के अनुसार बेरोज़गारी दर स्थिर रही, जबकि पीएलएफएस के वास्तविक आँकड़े इस दावे का समर्थन नहीं करते। 8.3 प्रतिशत से 7.2 प्रतिशत तक का परिवर्तन दर्शाता है कि बेरोज़गारी दर में उल्लेखनीय गिरावट हुई, इसलिए स्थिरता का दावा तथ्यात्मक रूप से असंगत है।
कथन 2 सही है : कथन 2 कहता है कि बेरोज़गारी घट गई, और पीएलएफएस के आँकड़ों के अनुसार यह दावा बिल्कुल सही है। महामारी के बाद आर्थिक गतिविधियों में पुनरुद्धार, ग्रामीण रोजगार योजनाओं से सहारा, तथा विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्र की सुधारात्मक प्रवृत्तियों ने बेरोज़गारी दर को कम करने में योगदान दिया। महिला श्रम–बल सहभागिता में आंशिक सुधार भी इस परिवर्तन में सहायक रहा।
- वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एम.पी.आई.) रिपोर्ट कौन तैयार/प्रकाशित करता है?
- विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.)
- ऑक्सफोर्ड गरीबी और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.)
- ऑक्सफोर्ड गरीबी और मानव विकास पहल (ओ.पी.एच.आई.)
- संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू.एन.डी.पी.)
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 3 और 4
(b) 1 और 4
(c) 2 और 4
(d) केवल 4
उत्तर: (a)
व्याख्या:
वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) दो संस्थाओं के संयुक्त सहयोग से तैयार और जारी किया जाता है। वैज्ञानिक पद्धति, संकेतक-चयन और डेटा विश्लेषण का कार्य ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआई) करती है, जबकि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) इसे आधिकारिक रूप से वैश्विक मानव विकास रिपोर्टों के अंतर्गत प्रकाशित करता है।
एमपीआई गरीबी को केवल आय के आधार पर नहीं, बल्कि वंचनाओं के वास्तविक अनुभव के आधार पर मापता है। यह तीन प्रमुख आयामों—स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर—पर आधारित 10 संकेतकों को सम्मिलित करता है। इनमें पोषण, बाल मृत्यु, स्कूल में उपस्थिति, औसत पठन वर्ष, स्वच्छ जल, स्वच्छता, आवास, बिजली और मूलभूत संपत्ति शामिल हैं। किसी व्यक्ति/परिवार की बहुआयामी गरीबी इन संकेतकों में उपस्थित वंचना की मात्रा पर निर्भर करती है।
परंपरागत गरीबी रेखा केवल आय को आधार मानती है, जबकि वास्तविक वंचना इससे कहीं अधिक व्यापक होती है। किसी परिवार के पास कुछ आय हो सकती है, पर यदि उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छ जल, आवास या बिजली तक पहुँच नहीं है, तो वह वास्तविक अर्थों में गरीब ही रहता है। एमपीआई इन्हीं विविध वंचनाओं को एक साथ मापकर गरीबी की समग्र स्थिति को अधिक सटीकता से प्रकट करता है।
ओपीएचआई (ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय) एमपीआई की वैचारिक और सांख्यिकीय संरचना तैयार करता है। अल्काएर–फॉस्टर पद्धति इसी संस्थान द्वारा विकसित की गई, जो बहुआयामी गरीबी मापन का वैश्विक मानक है। ओपीएचआई संकेतकों का चयन, वजनीकरण, कट-ऑफ और बहुआयामी वंचनाओं के संयोजन की पूरी प्रक्रिया का विकास करता है।
यूएनडीपी एमपीआई को विश्व स्तर पर मानव विकास रिपोर्टों के माध्यम से प्रकाशित करता है और देशों के तुलनात्मक विश्लेषण में इसका उपयोग करता है। यह संस्था विभिन्न सरकारों को गरीबी उन्मूलन हेतु नीति दिशानिर्देश और कार्यक्रमात्मक सहायता भी प्रदान करती है। इस कारण एमपीआई वैश्विक नीति-निर्माण और विकास रणनीतियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
विश्व बैंक और आईएमएफ मुख्यतः आय-आधारित गरीबी और वित्तीय संकेतकों पर कार्य करते हैं, एमपीआई पर नहीं। डब्ल्यूएचओ केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य करता है, एमपीआई का विकास या प्रकाशन नहीं करता। केवल यूएनडीपी को उत्तर मानना भी अधूरा है, क्योंकि एमपीआई का वैज्ञानिक विकास ओपीएचआई द्वारा किया जाता है।
72.सतत विकास लक्ष्य, 2030 में लक्ष्य 4 को प्राप्त करने के लिए कौन-सा/से उपाय आवश्यक है/हैं?
- शिक्षा को निःशुल्क और अनिवार्य बनाना
- स्कूल के बुनियादी ढाँचे में सुधार और डिजिटल परिवर्तन को अपनाना
- कृषि कार्यक्रमों का विस्तार
- प्रौद्योगिकी निवेश में वृद्धि
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 1, 2 और 3
(b) केवल 1
(c) 1 और 2
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (C )
व्याख्या:
सतत विकास लक्ष्य 4 का उद्देश्य है: समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना तथा सभी के लिए आजीवन सीखने के अवसरों को बढ़ावा देना। इस लक्ष्य का दायरा केवल विद्यालयी शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, कौशल विकास, शिक्षक-प्रशिक्षण, डिजिटल शिक्षण और सुरक्षित, समावेशी शिक्षण वातावरण भी शामिल हैं।
शिक्षा को निःशुल्क और अनिवार्य बनाना: सतत विकास लक्ष्य-4 का प्रमुख उपलक्ष्य 4.1 स्पष्ट रूप से सभी बच्चों के लिए मुफ्त, समान और गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा को अनिवार्य मानता है। यह लक्ष्य वैश्विक स्तर पर शिक्षा की सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित करने की बुनियादी आवश्यकता है। भारत में इसका आंशिक क्रियान्वयन RTE अधिनियम (2009) के माध्यम से हुआ, किन्तु सतत विकास लक्ष्य-4 के संदर्भ में इसे एक अनिवार्य वैश्विक मानक माना गया है। इसलिए कथन 1 का तर्क पूर्णतः सही है।
विद्यालयी अवसंरचना सुधार और डिजिटल परिवर्तन को अपनाना: सतत विकास लक्ष्य-4 के विभिन्न उपलक्ष्य-विशेषतः 4.a, 4.3, 4.4 और 4.5-विद्यालयों में सुरक्षित, समावेशी और गुणवत्ता-संपन्न भौतिक सुविधाएँ विकसित करने पर बल देते हैं। इनमें बिजली, स्वच्छ पेयजल, कार्यशील शौचालय, दिव्यांग-अनुकूल ढाँचा, तथा डिजिटल शिक्षा तक पहुँच शामिल है। कोविड-19 के बाद डिजिटल शिक्षण एवं तकनीकी दक्षता सतत विकास लक्ष्य-4 की केंद्रीय आवश्यकता बन चुकी है। इसलिए कथन 2 को सही और आवश्यक माना जाता है।
कृषि कार्यक्रमों का विस्तार: कृषि कार्यक्रमों का विस्तार प्राथमिक रूप से सतत विकास लक्ष्य-2 (शून्य भूख) और अन्य विकास लक्ष्यों से जुड़ा है। इसका सतत विकास लक्ष्य-4- जो शिक्षा की सार्वभौमिकता, गुणवत्ता और समावेशन पर केंद्रित है-से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। शिक्षा सुधार का मार्ग कृषि योजनाओं से नहीं गुजरता। अतः कथन 3 सतत विकास लक्ष्य-4 की दृष्टि से अप्रासंगिक है।
प्रौद्योगिकी निवेश में वृद्धि: यद्यपि प्रौद्योगिकी में निवेश शिक्षा की गुणवत्ता, पहुँच और लचीलापन बढ़ाता है, सतत विकास लक्ष्य-4 में इसे एक अनिवार्य और स्वतंत्र शर्त के रूप में निर्दिष्ट नहीं किया गया है। यह मूलत: विद्यालयी अवसंरचना और डिजिटल समावेशन (जैसा कथन 2 में वर्णित है) का एक घटक मात्र है। इसलिए इसे सतत विकास लक्ष्य-4 प्राप्ति का अलग और अनिवार्य उपाय नहीं माना जा सकता।
- प्राचीन व्यापार के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- प्राचीन भारत में बहुत से नदी-बन्दरगाह के सन्दर्भ मिलते हैं।
- वहाँ सामान और यातायात के बड़े गोदाम थे।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 2
(b) केवल 1
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c )
व्याख्या:
- प्राचीन भारत की व्यापारिक संरचना में नदी-आधारित परिवहन अत्यंत महत्वपूर्ण था। सिन्धु सभ्यता से लेकर उत्तर, पूर्व और दक्षिण भारत तक नदी-बंदरगाहों का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। लोथल का डॉकयार्ड, गंगा–यमुना प्रणाली के वाणिज्यिक नगर जैसे वाराणसी, प्रयाग और कौशांबी, पूर्व में ताम्रलिप्ति तथा दक्षिण में पोम्पुहार और पत्तनम जैसे बंदरगाह जल-आधारित व्यापार के प्रमुख केंद्र थे। इन उदाहरणों से सिद्ध होता है कि नदी-बंदरगाह प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था का अविभाज्य अंग थे। अतः कथन 1 सही है।
- व्यापार संचालन के लिए भंडारण-सुविधाएँ आवश्यक थीं, और प्राचीन भारत में इसके विकसित रूप मिलते हैं। हड़प्पा व मोहनजोदड़ो के विशाल अनाज-कोठार संगठित भंडारण क्षमता का शुरुआती प्रमाण देते हैं। ताम्रलिप्ति, पत्तनम और अन्य बंदरगाहों पर गोदाम, माल-शेड और चढ़ाने-उतारने की व्यवस्थाएँ पाई जाती थीं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र और अशोक के प्रशासनिक संदर्भ भी बड़े भंडारगृहों की उपस्थिति की पुष्टि करते हैं। अतः कथन 2 भी सही है।
- बंगाल के निम्नलिखित सेन शासकों को आरोही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए:
- बल्लाल सेन
- लक्ष्मण सेन
- हेमंत सेन
- विजय सेन
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 3, 4, 1, 2
(b) 1, 2, 3, 4
(c) 4, 3, 2, 1
(d) 2, 1, 4, 3
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- हेमंत सेन (1095 ईस्वी)– सेन वंश के संस्थापक
- हेमंत सेन को सेन वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
- वे 11वीं शताब्दी के अंतिम चरण में उदित हुए और पाल साम्राज्य की कमजोरी का लाभ उठाकर बंगाल में अपनी शक्ति स्थापित की।
- यद्यपि उन्होंने स्वयं राजा की उपाधि पूरी तरह धारण न भी की हो, लेकिन उनके शासन में सेन वंश की नींव मजबूत हुई।
- इसलिए कालक्रम में सबसे पहले हेमंत सेन आते हैं।
- विजय सेन (1095−1158 ईस्वी)
- हेमंत सेन के बाद उनके पुत्र विजय सेन ने सत्ता संभाली और सेन वंश को बंगाल का प्रमुख साम्राज्य बनाया।
- उन्होंने लगभग 40 वर्षों तक शासन किया, पालों के अंतिम अवशेषों को समाप्त किया और बंगाल, मिथिला, उड़ीसा तक साम्राज्य का विस्तार किया।
- विजय सेन को सेन वंश के महान साम्राज्य निर्माता के रूप में जाना जाता है।
- बल्लाल सेन (1158−1179 ईस्वी)
- विजय सेन के उत्तराधिकारी बल्लाल सेन महत्वपूर्ण सामाजिक सुधारों और प्रशासनिक पुनर्गठन के लिए प्रसिद्ध हैं।
- उन्होंने कुलीन प्रथा जैसी व्यवस्थाओं का गठन किया, हिंदू समाज के उच्च वर्गों में वर्गीकरण को व्यवस्थित किया।
- बल्लाल सेन ने दानसागर और अद्भुतसागर जैसी रचनाओं की भी शुरुआत की (अद्भुतसागर को उनके पुत्र ने पूरा किया)।
- उन्होंने साम्राज्य को स्थिर और संगठित किया।
- लक्ष्मण सेन (1178−1207 ईस्वी)– अंतिम शक्तिशाली सेन शासक
- बल्लाल सेन के बाद लक्ष्मण सेन सेन वंश के अंतिम महान शासक माने जाते हैं।
- उनके शासनकाल में बंगाल सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हुआ।
- चौदहवीं शताब्दी के कई प्रमुख कवि— जयदेव (गीतगोविंद)—इसी काल से जुड़े हैं।
- किन्तु राजनीतिक दृष्टि से उनके शासनकाल का अंत महत्वपूर्ण है क्योंकि 1204 ई. में बख्तियार खिलजी ने नदिया पर आक्रमण किया और सेन साम्राज्य का पतन आरंभ हुआ।
75.बैरम खाँ के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- अकबर ने बैरम खाँ को खान-ए-खाना की उपाधि दी।
- यह उपाधि साम्राज्य के वज़ीर के रूप में बैरम खाँ की नियुक्ति के समय नहीं दी गई।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 2
(b) केवल 1
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- अकबर के शासन के प्रारंभिक वर्षों में बैरम ख़ाँ उनकी सत्ता के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक थे। 1556 में पानीपत के द्वितीय युद्ध में हेमू को पराजित करने के बाद अकबर की सत्ता को सुरक्षित करने में उनकी निर्णायक भूमिका रही। अकबर की नाबालिग अवस्था में बैरम ख़ाँ ने वकील-ए-सल्तनत के रूप में शासन संचालन किया। उनकी निष्ठा, सैन्य कौशल और प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए अकबर ने उन्हें ख़ान-ए-ख़ाना की प्रतिष्ठित उपाधि प्रदान की। यह उपाधि मुगल साम्राज्य में उच्चतम सम्मान का प्रतीक थी और अत्यंत प्रभावशाली कुलीनों तथा सेनापतियों को दी जाती थी। अतः कथन 1 पूर्णतः सही है।
- ऐतिहासिक स्रोतों से स्पष्ट होता है कि बैरम ख़ाँ को जब अकबर का वज़ीर (या वकील-ए-सल्तनत) बनाया गया, उसी अवधि में उन्हें साम्राज्य के सर्वोच्च सम्मान भी प्रदान किए गए। इनमें प्रमुख उपाधि थी ख़ान-ए-ख़ाना। यह उपाधि न केवल उनकी उच्च स्थिति का संकेत थी, बल्कि साम्राज्य में उनकी वास्तविक शक्ति और प्रभाव की पुष्टि भी करती थी। 1556 से 1560 तक बैरम ख़ाँ अकबर की ओर से प्रभावी रूप से शासन चला रहे थे। इसलिए यह कथन कि उन्हें यह उपाधि वज़ीर नियुक्ति के समय नहीं मिली, सही नहीं है।
- निम्नलिखित पेशवाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें आरोही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए:
- रघुनाथ राव (राघोबा)
- बालाजी बाजी राव
- नारायण राव
- बालाजी विश्वनाथ
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 1,3, 2, 4
(b) 1, 2,3,4
(c) 4, 2, 3, 1
(d) 3, 4, 1,2
उत्तर: ( c )
व्याख्या:
पेशवा शब्द का आशय है—सबसे अग्रणी या प्रधान मंत्री। आरंभ में यह पद मात्र सलाहकार और प्रशासनिक प्रमुख तक सीमित था, परंतु समय के साथ इसकी शक्तियाँ बढ़ती गईं और 18वीं शताब्दी में पेशवा मराठा साम्राज्य के वास्तविक शासक रूप में स्थापित हो गए। छत्रपति शिवाजी द्वारा नियुक्त मोरोपंत पिंगले से लेकर 1818 में बाजीराव द्वितीय तक, लगभग 170 वर्षों में पेशवाओं ने मराठा राजनीति, सैन्य अभियानों और राज्य-व्यवस्था को संगठित एवं व्यापक दिशा प्रदान की।
| क्रम | पेशवा / अधिकारी | कार्यकाल | नियुक्तकर्ता / परिस्थितियाँ | प्रमुख कार्य / उपलब्धियाँ | विशेष तथ्य |
| 1 | सोनोपंत दबीर | 1640–1652 | प्रारंभिक काल, अनौपचारिक पेशवा | प्रशासनिक कार्यों का संचालन | प्रथम अनौपचारिक पेशवा |
| 2 | श्यामपंत कुलकर्णी रांजेकर | 1652–1657 | शाहजी भोंसले | शाहजी के अंतर्गत प्रशासन | शाहजी के दरबार में प्रमुख भूमिका |
| 3 | मोरोपंत त्रिंबक पिंगले | 1657–1683 | छत्रपति शिवाजी | शिवाजी द्वारा नियुक्त प्रथम औपचारिक पेशवा | शिवाजी के विश्वसनीय मंत्री |
| 4 | मोरेश्वर पिंगले | 1683–1689 | संभाजी | सैन्य और प्रशासनिक कार्य | संभाजी के काल के महत्वपूर्ण पेशवा |
| 5 | रामचंद्रपंत अमात्य | 1689–1708 | राजाराम | राज्य का संचालन, संकट काल में शासन | ‘अद्यापत्र’ नामक ग्रंथ की रचना; प्रछन्न-राजा की भांति कार्य; ताराबाई के प्रति निष्ठा के कारण बाद में उपेक्षित |
| 6 | बालाजी विश्वनाथ भट्ट | 1713–1719 | शाहू | पेशवा पद को वंशानुगत बनाया; शाही अधिकारों की पुनर्स्थापना; मुगल बादशाह से चौथ-सर्देशमुखी का अधिकार | पेशवा पद के वास्तविक संस्थापक; कान्होजी आंग्रे को अपने पक्ष में किया |
| 7 | बाजीराव प्रथम | 1720–1740 | शाहू | उत्तरी भारत में विस्तार; पालखेड़ और भोपाल में निजाम पर विजय; सालसेट-बसेन पर अधिकार; राजधानी को पुणे स्थानांतरित | अद्वितीय योद्धा; गुरिल्ला युद्धकला में दक्ष; कभी पराजित नहीं हुए |
| 8 | बालाजी बाजीराव (नाना साहेब प्रथम) | 1740–1761 | शाहू द्वारा नियुक्त | मराठा शक्ति चरम पर; मुगल बादशाह की रक्षा हेतु संधि; तृतीय पानीपत युद्ध में पराजय | संगोला समझौता (1750) से पेशवाओं का सर्वोच्च अधिकार |
| 9 | माधवराव प्रथम | 1761–1772 | बालाजी बाजीराव के बाद | पानीपत के बाद मराठा शक्ति का पुनरुत्थान; निजाम, हैदर अली, रोहिल्लों व राजपूतों पर विजय; शाह आलम द्वितीय को दिल्ली के सिंहासन पर पुनः स्थापित | उत्कृष्ट प्रशासक; मराठा साम्राज्य को पुनर्जीवित करने वाले |
| 10 | रघुनाथराव | 1772–1773 | राजनीतिक संघर्ष | सत्ता संघर्ष; नारायण राव की हत्या | प्रथम आंग्ल–मराठा युद्ध का कारण |
| 11 | नारायणराव | 1772–1773 | माधवराव के बाद | अल्पकालीन शासन | रघुनाथराव द्वारा हत्या |
| 12 | रघुनाथराव (द्वितीय प्रयास) | 1773–1774 | बलपूर्वक सत्ता ग्रहण | ब्रिटिश से सहायता अनुबंध | ब्रिटिश हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त |
| 13 | सवाई माधवराव | 1774–1795 | 40 दिन की आयु में अभिषिक्त | नाना फड़नवीस व बारभाई परिषद द्वारा शासन संचालन; प्रथम आंग्ल–मराठा युद्ध का सफल प्रतिरोध | पुरंधर (1776) व सालबाई संधि (1782); नाना फड़नवीस का स्वर्णकाल |
| 14 | बाजीराव द्वितीय | 1796–1818 | रघुनाथराव का पुत्र | बेसिन की अपमानजनक संधि (1802); तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध में पराजय; पेशवा पद का अंत | अंतिम पेशवा; नाना साहेब (1857) उनके दत्तक पुत्र |
- निम्नलिखित युग्मों (ऐलुमिनियम संयंत्र राज्य) में से कौन-सा सही सुमेलित नहीं है?
(a) हीराकुड – ओडिशा
(b) मुरी – छत्तीसगढ़
(c) अलुपुरम (अलवाय) – केरल
(d) बेलगावी – कर्नाटक
उत्तर:(b)
व्याख्या:
(a) हीराकुड – ओडिशा (सही सुमेलित)
हीराकुड, ओडिशा में हिंडाल्को का प्रमुख ऐलुमिनियम स्मेल्टर स्थापित है। हीराकुड बाँध से प्रचुर जलविद्युत उपलब्ध होने के कारण यह क्षेत्र ऐलुमिनियम उद्योग के लिए अत्यंत उपयुक्त माना गया। सस्ती बिजली की उपलब्धता, परिवहन सुविधा और बॉक्साइट संसाधनों के निकट होने के कारण हीराकुड भारत के प्रमुख ऐलुमिनियम उत्पादन केंद्रों में से एक है।
(b) मुरी – छत्तीसगढ़ (गलत सुमेलन)
मुरी वास्तव में झारखंड में स्थित है, न कि छत्तीसगढ़ में। यहाँ हिंडाल्को की एल्यूमिना रिफाइनरी कार्यरत है, जो बॉक्साइट को प्रसंस्करित करके एल्यूमिना तैयार करती है। यह रिफाइनरी एल्यूमिनियम उत्पादन की प्रारंभिक लेकिन महत्वपूर्ण प्रक्रिया का हिस्सा है। स्थान संबंधी त्रुटि के कारण यह विकल्प गलत सुमेलित है।
(c) अलुपुरम / अलवाय – केरल (सही सुमेलित)
अलवाय, केरल में ऐतिहासिक रूप से एल्यूमिनियम उद्योग का विकास हुआ। यह क्षेत्र मालाबार ऐलुमिनियम कंपनी (माल्को) तथा इंडियन ऐलुमिनियम कंपनी की गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध रहा। पर्याप्त जल उपलब्धता और विद्युत सुविधा के कारण यह क्षेत्र एल्यूमिनियम उद्योग के लिए उपयुक्त सिद्ध हुआ।
(d) बेलगावी – कर्नाटक (सही सुमेलित)
बेलगावी, कर्नाटक में हिंडाल्को का प्रमुख एल्यूमिना प्लांट स्थित है, जहाँ उच्च-ग्रेड एल्यूमिना का उत्पादन किया जाता है। यह क्षेत्र कर्नाटक–गोवा बॉक्साइट बेल्ट से निकटता रखता है, जिससे कच्चे माल की आपूर्ति सुगमतापूर्वक होती है। ऊर्जा और परिवहन की उपलब्धता इसे ऐलुमिना–उत्पादन का महत्वपूर्ण केंद्र बनाती है।
- निम्नलिखित युग्मों (राष्ट्रीय उद्यान राज्य/संघ-राज्य क्षेत्र) में से कौन-सा सही सुमेलित नहीं है?
(a) सिमलीपाल – ओडिशा
(b) बांदीपुर – कर्नाटक
(c) राजाजी – उत्तराखंड
(d) पिन वैली – जम्मू और कश्मीर
उत्तर: (d)
व्याख्या:
| विकल्प | राष्ट्रीय उद्यान | सही राज्य | सुमेलन सही/गलत | प्रमुख विशेषताएँ |
| (a) | सिमलीपाल | ओडिशा | सही | मयूरभंज जिला; भारत के सबसे बड़े टाइगर रिज़र्वों में से एक; यूनेस्को बायोस्फीयर रिज़र्व; रॉयल बंगाल टाइगर, एशियाई हाथी, गौर, साल वन। |
| (b) | बांदीपुर | कर्नाटक | सही | चामराजनगर जिला; नीलगिरि बायोस्फीयर रिज़र्व का हिस्सा; बाघ, हाथी, चीतल; मुडुमलाई (TN) व वायनाड (केरल) से जुड़ा विशाल पारिस्थितिक तंत्र। |
| (c) | राजाजी | उत्तराखंड | सही | हरिद्वार, देहरादून, पौड़ी में विस्तृत; शिवालिक पर्वतमाला में; एशियाई हाथी, बाघ, गुलदार; 2015 में टाइगर रिज़र्व घोषित। |
| (d) | पिन वैली | हिमाचल प्रदेश | गलत | लाहौल–स्पीति; शीत मरुस्थलीय पारितंत्र; हिम तेंदुआ, साइबेरियन आइबेक्स, लाल लोमड़ी; पिन नदी घाटी। |
अन्य महत्त्वपूर्ण जानकारी:
| क्रम | राष्ट्रीय उद्यान का नाम | राज्य/संघ-राज्य क्षेत्र | स्थापना वर्ष | विशेषता / प्रमुख प्रजातियाँ |
| 1 | जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान | उत्तराखंड | 1936 | भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान; बाघ संरक्षण, विविध पारिस्थितिकी। |
| 2 | काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान | असम | 1974 | एकशिंगी गेंडा के लिए विश्व प्रसिद्ध; बाघ, हाथी, जल पक्षी। |
| 3 | कान्हा राष्ट्रीय उद्यान | मध्य प्रदेश | 1955 | बंगाल टाइगर, गौर; केंद्रीय भारत का प्रमुख पारिस्थितिक क्षेत्र। |
| 4 | बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान | मध्य प्रदेश | 1968 | बाघों की उच्च घनता और प्राचीन किलों के लिए प्रसिद्ध। |
| 5 | ताडोबा अंधारी राष्ट्रीय उद्यान | महाराष्ट्र | 1955 | बाघ, चीतल, गेंडा; महाराष्ट्र का प्रमुख वन्यजीव क्षेत्र। |
| 6 | गिर राष्ट्रीय उद्यान | गुजरात | 1965 | एशियाई सिंह का एकमात्र आवास। |
| 7 | रणथंभोर राष्ट्रीय उद्यान | राजस्थान | 1980 | बाघ संरक्षण और किले सहित जंगल पारिस्थितिकी। |
| 8 | पेरियार राष्ट्रीय उद्यान | केरल | 1982 | हाथी, बाघ, सुंदरी झील क्षेत्र; लोकप्रिय पर्यटन स्थल। |
| 9 | साईलेंट वैली राष्ट्रीय उद्यान | केरल | 1984 | पश्चिमी घाट का जैव विविधता गरम बिंदु; दुर्लभ प्रजातियाँ। |
| 10 | केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान | राजस्थान | 1981 | पक्षी अभयारण्य के रूप में प्रसिद्ध; प्रवासी पक्षी। |
| 11 | हैमिस राष्ट्रीय उद्यान | लद्दाख (संघ-राज्य) | 1981 | भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान; हिम तेंदुआ आदि। |
| 12 | डिहिंग पटकाई राष्ट्रीय उद्यान | असम | 2021 | पूर्व का अमेज़न कहा जाता; दुर्लभ प्रजातियाँ। |
| 13 | नामदाफा राष्ट्रीय उद्यान | अरुणाचल प्रदेश | 1983 | उत्तर-पूर्व का बड़ा जैव विविधता क्षेत्र। |
| 14 | केन्गचेंज़ोंगा राष्ट्रीय उद्यान | सिक्किम | 1977 | यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल; हिमालयी पारिस्थितिकी। |
- कुल संख्या: भारत में कुल 106 राष्ट्रीय उद्यान हैं, जो लगभग 44,402.95 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करते हैं।
- सबसे पहला: भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान जिम कॉर्बेट था, जिसे 1936 में स्थापित किया गया।
- सबसे बड़ा: हेमिस राष्ट्रीय उद्यान (लद्दाख) क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा है।
- महत्व: राष्ट्रीय उद्यान वन्यजीव व पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा, परियोजना बाघ, अभयारण्य नेटवर्क और जैव विविधता संरक्षण का आधार हैं।
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A) : हिमालय अभी भी ऊँचा हो रहा है।
कारण (R) : भारतीय टेक्टोनिक प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: ( b)
व्याख्या:
अभिकथन (A) सही है: हिमालय एक नवीन वलित पर्वत-तंत्र है। भूवैज्ञानिक दृष्टि से यह पर्वत-श्रृंखला अभी पूर्णतः स्थिर नहीं हुई है। उपग्रह आधारित जीपीएस मापन, भूकंपीय अध्ययनों और स्थलाकृति विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि हिमालय क्षेत्र में अभी भी ऊर्ध्वाधर उत्थान हो रहा है। यद्यपि अपरदन द्वारा कुछ स्थानों पर ऊँचाई कम भी होती है, परंतु समग्र रूप से टेक्टोनिक बलों के कारण हिमालय का उत्थान जारी है।
कारण (R) सही है: भारतीय टेक्टोनिक प्लेट उत्तर दिशा में लगभग 4–5 सेमी प्रति वर्ष की गति से आगे बढ़ रही है और यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है। यह टक्कर संपीडनात्मक बल उत्पन्न करती है, जिसके परिणामस्वरूप स्थलमंडल की परतें वलित होती हैं, भ्रंश सक्रिय रहते हैं, तथा पर्वतों का निरंतर उत्थान होता है। यही प्रक्रिया हिमालय के निर्माण का मूल कारण रही है और आज भी जारी है। इस सतत टकराव के कारण हिमालय क्षेत्र भूकंप-संवेदनशील भी बना हुआ है।
हिमालय के ऊँचा होने का प्रत्यक्ष कारण वही सतत प्लेटीय टकराव है जिसका उल्लेख कारण (R) में किया गया है। यदि भारतीय प्लेट की उत्तरगामी गति और उसका यूरेशियन प्लेट से संपीडन न होता, तो हिमालय में वर्तमान काल में उत्थान भी नहीं होता। इसलिए कारण (R), अभिकथन (A) की सही और पूर्ण व्याख्या करता है।
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
सूची–Ⅰ (कोयला भंडार) सूची–ⅠⅠ (राज्य)
- हुतर – 1. मध्य प्रदेश
- इब नदी – 2. छत्तीसगढ़
- तातापानी – रामकोला- 3. ओडिशा
- उमरिया – 4. झारखंड
कूट:
A B C D
(a) 4 2 3 1
(b) 4 3 2 1
(c) 3 2 4 1
(d) 2 1 3 4
उत्तर: (b)
व्याख्या:
(A) हुतर — झारखंड
हुतर कोयला क्षेत्र झारखंड राज्य के पलामू–लातेहार अंचल में स्थित है। यह क्षेत्र गोंडवाना युगीन कोयला संरचनाओं से संबंधित है और झारखंड के विस्तृत कोयला संसाधनों का भाग है।
(B) इब नदी — ओडिशा
इब नदी (इब-वैली) कोयला क्षेत्र ओडिशा के झारसुगुड़ा और सुंदरगढ़ जिलों में फैला हुआ है। यह महानदी घाटी कोयला क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण घटक है तथा यहाँ प्राप्त थर्मल कोयला ताप विद्युत उत्पादन के लिए उपयुक्त माना जाता है।
(C) तातापानी–रामकोला — छत्तीसगढ़
तातापानी–रामकोला कोयला क्षेत्र छत्तीसगढ़ के सुरगुजा जिले में स्थित है और सोन–महानदी बेसिन से संबद्ध है। यह राज्य के प्रमुख कोयला क्षेत्रों में से एक है और राष्ट्रीय कोयला उत्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
(D) उमरिया — मध्य प्रदेश
उमरिया कोयला क्षेत्र मध्य प्रदेश के शहडोल–अनूपपुर क्षेत्र में अवस्थित है। यह राज्य के प्रमुख कोयला क्षेत्रों (सोहागपुर तथा पेंच–कान्हन–तवा के साथ) में सम्मिलित है और यहाँ मुख्यतः नॉन-कोकिंग कोयला पाया जाता है।
भारत के प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र:
| क्रमांक | राज्य / क्षेत्र | प्रमुख कोयला क्षेत्र | विशेषताएँ / टिप्पणियाँ |
| 1 | झारखंड | झरिया, बोकारो, गिरिडीह, करनपुरा (उत्तर एवं दक्षिण), हुतर कोयला क्षेत्र | झरिया देश का सबसे बड़ा कोकिंग कोयला क्षेत्र; दामोदर घाटी का मुख्य केंद्र |
| 2 | पश्चिम बंगाल | रानीगंज, धनबाद (झारखंड के साथ साझा), दार्जिलिंग–जलपाईगुड़ी | रानीगंज भारत का पहला विकसित कोयला क्षेत्र; कुछ क्षेत्रों में उच्च ग्रेड कोयला |
| 3 | ओडिशा | तालचेर, हिमगिरि, रामपुर, इब नदी (इब-वैली) कोयला क्षेत्र | तालचेर देश के सबसे बड़े कोयला उत्पादक क्षेत्रों में से एक |
| 4 | छत्तीसगढ़ | कोरबा, बिश्रामपुर, सोनहत, तातापानी–रामकोला कोयला क्षेत्र | कोरबा मध्य भारत का प्रमुख कोयला व ताप विद्युत केंद्र |
| 5 | मध्य प्रदेश–उत्तर प्रदेश | सिंगरौली, उमरिया कोयला क्षेत्र | विशाल खुली खदानें; दोनों राज्यों (यूपी-एमपी) में विस्तृत क्षेत्र (सिंगरौली); एनटीपीसी की प्रमुख परियोजनाएँ |
| 6 | महाराष्ट्र | चांदा–वर्धा (चंद्रपुर), काम्पटी, बंदर | चंद्रपुर प्रमुख उत्पादक; काम्पटी ऐतिहासिक क्षेत्र |
| 7 | तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश | सिंगरेनी क्षेत्र | दक्षिण भारत का सबसे महत्वपूर्ण कोयला उत्खनन क्षेत्र |
| 8 | उत्तर–पूर्व भारत | असम (मकुम, जयपुर, नज़ीरा) मेघालय (चेरापूंजी, दारंगिरी), नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश (नामचिक–नामफुक) | छोटे पर उच्च गुणवत्ता वाले कोयला भंडार |
| 9 | जम्मू एवं कश्मीर | कलाकोट | सीमित उत्पादन; प्रमुख क्षेत्र कलाकोट |
- निम्नलिखित दिवसों पर विचार कीजिए और इन्हें कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए :
- विश्व स्वास्थ्य दिवस
- राष्ट्रीय समुद्री दिवस
- विश्व एथलेटिक्स दिवस
- विश्व रेड क्रॉस दिवस
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 3, 2, 1,4
(b) 2, 3, 4, 1
(c) 4, 2, 3, 1
(d) 2, 1, 3, 4
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- राष्ट्रीय समुद्री दिवस — 5 अप्रैल
- यह दिवस भारत में प्रत्येक वर्ष 5 अप्रैल को मनाया जाता है।
- इसका उद्देश्य भारत के समुद्री इतिहास, व्यापारिक नौवहन, समुद्री सुरक्षा और शिपिंग उद्योग के महत्व को रेखांकित करना है।
- यह दिन 1919 में एस.एस. लॉयल्टी जहाज की पहली समुद्री यात्रा की स्मृति में मनाया जाता है।
- विश्व स्वास्थ्य दिवस — 7 अप्रैल
- यह दिवस विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की स्थापना (7 अप्रैल 1948) की स्मृति में मनाया जाता है।
- उद्देश्य: वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य जागरूकता, रोग-निवारण, और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार को बढ़ावा देना।
- प्रत्येक वर्ष इस दिवस की एक विशिष्ट थीम होती है।
- विश्व एथलेटिक्स दिवस — आमतौर पर 7 मई (तिथि परिवर्तनशील)
- यह दिवस विश्व एथलेटिक्स महासंघ (पूर्व में IAAF) द्वारा मनाया जाता है।
- इसका उद्देश्य युवाओं में खेल भावना, शारीरिक फिटनेस और एथलेटिक्स के प्रति रुचि विकसित करना है।
- इसकी तिथि हर वर्ष मई माह में बदलती रहती है, परंतु यह निश्चित रूप से अप्रैल के बाद आता है।
- विश्व रेड क्रॉस दिवस — 8 मई
- यह दिवस हेनरी ड्यूनेंट (Red Cross Movement के संस्थापक) के जन्मदिवस पर मनाया जाता है।
- उद्देश्य: मानवीय सहायता, आपदा राहत, स्वास्थ्य सेवा और तटस्थ मानवीय कार्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
82.सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची–Ⅰ सूची ⅠⅠ
(पुरस्कार) (प्राप्तकर्ता)
- आर्यभट्ट पुरस्कार, 2024 – 1. अमिताभ बच्चन
- विश्व साहित्य पुरस्कार, 2024 – 2. ममता जी. सागर
- c. लता दीनानाथ मंगेशकर पुरस्कार, 2024 -3. डॉ. सुब्बा राव पवुलुरी
- d. गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार, 2024 – 4. आलोक शुक्ला
कूट :
A B C D
(a) 2 3 1 4
(b) 4 2 1 3
(c) 3 2 1 4
(d) 3 2 4 1
उत्तर: (c )
व्याख्या:
| क्रम | पुरस्कार का नाम | वर्ष | प्राप्तकर्ता | संबंधित क्षेत्र | पुरस्कार का उद्देश्य / महत्व | अतिरिक्त तथ्य |
| 1. | आर्यभट्ट पुरस्कार | 2024 | डॉ. सुब्बा राव पवुलुरी | विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार | विज्ञान एवं तकनीकी अनुसंधान, नवाचार और वैज्ञानिक उपलब्धियों में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रदान किया जाता है | यह पुरस्कार प्राचीन भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री आर्यभट्ट की स्मृति में दिया जाता है |
| 2. | विश्व साहित्य पुरस्कार | 2024 | ममता जी. सागर | साहित्य एवं काव्य | वैश्विक साहित्य, स्त्री विमर्श, सामाजिक चेतना तथा भाषायी नवाचार में उत्कृष्ट योगदान के लिए | ममता जी. सागर समकालीन साहित्य की प्रमुख कवयित्री एवं लेखिका हैं |
| 3. | लता दीनानाथ मंगेशकर पुरस्कार | 2024 | अमिताभ बच्चन | कला, संस्कृति एवं सिनेमा | भारतीय कला, सिनेमा, सांस्कृतिक प्रभाव और सार्वजनिक जीवन में दीर्घकालिक योगदान के लिए | यह पुरस्कार लता मंगेशकर एवं उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर की स्मृति से जुड़ा है |
| 4. | गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार | 2024 | आलोक शुक्ला | पर्यावरण संरक्षण | जमीनी स्तर पर पर्यावरण संरक्षण, वन, जल और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा हेतु नेतृत्व के लिए | इसे “ग्रीन नोबेल” भी कहा जाता है |
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची–Ⅰ सूची ⅠⅠ
(विटामिन) (रोग)
- A. विटामिन A – बेरीबेरी
- B. विटामिन B – 2. अंधापन
- C. विटामिन C – 3. रिकेट्स
- D. विटामिन D – 4. स्कर्वी
कूट :
A B C D
(a) 1 3 2 4
(b) 1 2 3 4
(c) 4 3 2 1
(d) 2 1 4 3
उत्तर: (d)
व्याख्या:
विटामिन मानव शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व हैं, जिनकी आवश्यकता बहुत कम मात्रा में होती है, किंतु इनके अभाव में शरीर की सामान्य वृद्धि, विकास और जैव-रासायनिक क्रियाएँ प्रभावित हो जाती हैं। विटामिन स्वयं ऊर्जा प्रदान नहीं करते, परंतु ये एंजाइमों के सह-कारक (co-enzymes) के रूप में कार्य करके पाचन, चयापचय, तंत्रिका तंत्र, प्रतिरक्षा प्रणाली, दृष्टि तथा हड्डियों के स्वास्थ्य को सुचारु बनाए रखते हैं।
मानव शरीर अधिकांश विटामिनों का संश्लेषण स्वयं नहीं कर पाता, इसलिए इनकी पूर्ति आहार के माध्यम से करना अनिवार्य है। किसी विशेष विटामिन की दीर्घकालिक कमी से विशिष्ट अभावजन्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं, जैसे— विटामिन A की कमी से अंधापन, विटामिन B₁ की कमी से बेरीबेरी, विटामिन C की कमी से स्कर्वी तथा विटामिन D की कमी से रिकेट्स।
| क्रम | विटामिन | रासायनिक नाम | प्रमुख कार्य | कमी से होने वाले रोग/लक्षण |
| 1 | विटामिन A | रेटिनॉल | दृष्टि, त्वचा व श्लेष्मा झिल्ली की रक्षा | नाइट ब्लाइंडनेस (अंधापन), ज़ेरोफ्थैल्मिया |
| 2 | विटामिन B₁ | थायमिन | कार्बोहाइड्रेट चयापचय, तंत्रिका तंत्र | बेरीबेरी |
| 3 | विटामिन B₂ | राइबोफ्लेविन | ऊर्जा उत्पादन, त्वचा व आँखों का स्वास्थ्य | चेलोसिस, ग्लोसाइटिस, त्वचा विकार |
| 4 | विटामिन B₃ | नियासिन | ऊतक श्वसन, पाचन तंत्र | पेलाग्रा (डर्मेटाइटिस, डायरिया, डिमेंशिया) |
| 5 | विटामिन B₅ | पैंटोथेनिक अम्ल | वसा व कार्बोहाइड्रेट चयापचय | थकान, पैरों में जलन (Burning feet) |
| 6 | विटामिन B₆ | पाइरिडॉक्सिन | अमीनो अम्ल चयापचय | एनीमिया, त्वचा विकार, तंत्रिका लक्षण |
| 7 | विटामिन B₇ | बायोटिन | वसा व प्रोटीन चयापचय | त्वचा रोग, बाल झड़ना |
| 8 | विटामिन B₉ | फोलिक अम्ल | DNA निर्माण, RBC निर्माण | मेगालोब्लास्टिक एनीमिया |
| 9 | विटामिन B₁₂ | सायनोकोबालामिन | तंत्रिका तंत्र, RBC निर्माण | पर्निशियस एनीमिया, तंत्रिका विकार |
| 10 | विटामिन C | एस्कॉर्बिक अम्ल | प्रतिरक्षा, घाव भरना | स्कर्वी |
| 11 | विटामिन D | कैल्सीफेरॉल | कैल्शियम अवशोषण, हड्डियाँ | रिकेट्स (बच्चे), ऑस्टियोमलेशिया (वयस्क) |
| 12 | विटामिन E | टोकोफेरॉल | एंटीऑक्सीडेंट, कोशिका रक्षा | मांसपेशी कमजोरी, बांझपन |
| 13 | विटामिन K | फिलोक्विनोन | रक्त का थक्का बनना | अधिक रक्तस्राव |
- निम्नलिखित पर्वतों पर विचार कीजिए तथा इन्हे इनके स्थान के अनुसार पश्चिम से पूर्व की ओर सही क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
- काराकोरम
- पॉण्टिक
- हिंदू कुश
- ज़ाग्रोस
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:
(a) 4, 1, 2, 3
(b) 4, 2, 3, 1
(c) 2, 4, 3, 1
(d) 2, 3, 4, 1
उत्तर: (b) 4, 2, 3, 1
व्याख्या:
पश्चिम से पूर्व की ओर पर्वतों का सही क्रम इस प्रकार है:
- (1) ज़ाग्रोस पर्वत — सबसे पश्चिमी
ज़ाग्रोस पर्वत ईरान तथा आंशिक रूप से इराक में विस्तृत हैं और पश्चिम एशिया के प्रमुख पर्वत तंत्रों में गिने जाते हैं। इनका निर्माण अरब प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराव से हुआ है। यह पर्वत श्रेणी भूमध्यसागरीय–अल्पाइन पर्वत तंत्र का हिस्सा है और दिए गए विकल्पों में सबसे पश्चिम में स्थित है।
- (2) पॉण्टिक पर्वत
पॉण्टिक पर्वत उत्तरी तुर्की में काला सागर के दक्षिणी तट के समानांतर फैले हुए हैं। ये अनातोलिया क्षेत्र में स्थित हैं और आर्द्र जलवायु तथा घने वनों के लिए प्रसिद्ध हैं। भौगोलिक दृष्टि से ये ज़ाग्रोस के पूर्व और हिंदू कुश के पश्चिम में स्थित हैं।
- (3) हिंदू कुश पर्वत
हिंदू कुश पर्वत अफगानिस्तान और पाकिस्तान में फैले हुए हैं तथा मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के बीच संक्रमण क्षेत्र का निर्माण करते हैं। यह पर्वत श्रेणी हिमालय–पामीर पर्वत तंत्र से जुड़ी हुई है और प्राचीन काल से भारत तथा मध्य एशिया के बीच संपर्क मार्ग के रूप में ऐतिहासिक महत्व रखती है। यह पॉण्टिक के पूर्व और काराकोरम के पश्चिम में स्थित है।
- (4) काराकोरम पर्वत — सबसे पूर्वी
काराकोरम पर्वत भारत (लद्दाख), पाकिस्तान और चीन में विस्तृत हैं तथा हिमालय के उत्तर-पश्चिम में स्थित हैं। यह पर्वत श्रेणी विश्व की दूसरी सबसे ऊँची चोटी K2 और विशाल हिमनदों, विशेषकर सियाचिन, के लिए प्रसिद्ध है। दिए गए पर्वतों में यह सबसे पूर्वी पर्वत श्रेणी है।
हालांँकि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने इस प्रश्न का उत्तर (c) 2, 4, 3, 1 माना है।
- निम्नलिखित युग्मों (नदी और उसकी प्रवाह दिशा) में से कौन-सा सही सुमेलित नहीं है ?
(a) मेकांग नदी – दक्षिण–पश्चिम
(b) अंगारा नदी – उत्तर
(c) अमूर नदी – उत्तर–पूर्व
(d) सिर दरिया – उत्तर–पश्चिम
उत्तर: (a)
व्याख्या:
(a) मेकांग नदी – दक्षिण-पश्चिम (गलत सुमेलन)
मेकांग नदी का प्रवाह दक्षिण-पश्चिम दिशा में नहीं होता। इसका उद्गम तिब्बती पठार के छिंगहाई क्षेत्र से होता है और यह चीन, म्यांमार, लाओस, थाईलैंड, कंबोडिया होते हुए वियतनाम में दक्षिण चीन सागर में गिरती है। इसका सामान्य प्रवाह उत्तर से दक्षिण-पूर्व दिशा में है, इसलिए दक्षिण-पश्चिम दिशा से जोड़ना भौगोलिक रूप से गलत है।
(b) अंगारा नदी – उत्तर (सही सुमेलन)
अंगारा नदी रूस की एक प्रमुख नदी है, जो बैकाल झील से निकलने वाली एकमात्र नदी है। यह दक्षिण से उत्तर दिशा में प्रवाहित होकर येनिसेई नदी में मिलती है। अतः अंगारा नदी का उत्तर दिशा में बहना सही सुमेलन है।
(c) अमूर नदी – उत्तर-पूर्व (सही सुमेलन)
अमूर नदी शिल्का और आर्गुन नदियों के संगम से निकलती है और रूस-चीन सीमा के सहारे पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में बहती है। यह अंततः ओखोट्स्क सागर (प्रशांत महासागर) में गिरती है। इसलिए इसका उत्तर-पूर्व दिशा में प्रवाह भौगोलिक रूप से सही है।
(d) सिर दरिया – उत्तर-पश्चिम (सही सुमेलन)
सिर दरिया मध्य एशिया की एक महत्त्वपूर्ण नदी है, जिसका उद्गम तियान शान पर्वत श्रेणी में नरीन और कारा दरिया नदियों से होता है। यह किर्गिज़स्तान, उज्बेकिस्तान और कज़ाख़स्तान से होकर मुख्यतः उत्तर-पश्चिम दिशा में प्रवाहित होकर अराल सागर में गिरती है। अतः यह युग्म सही सुमेलित है।
- निम्नलिखित युग्मों (देश – तेल क्षेत्र) में से कौन-सा सही सुमेलित नहीं है?
(a) इराक – जुबैर
(b) सऊदी अरब – धाहरन
(c) ईरान – हफ्त केल
(d) कुवैत – काशगन
उत्तर: (d)
व्याख्या:
(a) इराक – जुबैर (सही सुमेलन)
जुबैर तेल क्षेत्र दक्षिणी इराक में बसरा के निकट स्थित है और देश के सबसे बड़े तथा पुराने तेल क्षेत्रों में शामिल है। इराक विश्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में से एक है।
(b) सऊदी अरब – धाहरन (सही सुमेलन)
धाहरन सऊदी अरब के पूर्वी प्रांत में स्थित है और सऊदी अरामको का ऐतिहासिक मुख्यालय रहा है। यद्यपि धाहरन एक नगर है, फिर भी यह देश के प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र का अभिन्न भाग माना जाता है।
(c) ईरान – हफ्त केल (सही सुमेलन)
हफ्त केल तेल क्षेत्र दक्षिण-पश्चिमी ईरान के खुज़ेस्तान प्रांत में स्थित है, जो ईरान के पेट्रोलियम उत्पादन का प्रमुख केंद्र है। यह ईरान के सबसे पुराने तेल क्षेत्रों में से एक है।
(d) कुवैत – काशगन (गलत सुमेलन)
काशगन तेल क्षेत्र कजाकिस्तान में कैस्पियन सागर के उत्तरी भाग में स्थित एक अपतटीय क्षेत्र है और इसका कुवैत से कोई भौगोलिक संबंध नहीं है। कुवैत के प्रमुख तेल क्षेत्र बुर्गन, मगवा और अहमदी हैं।
मध्य-पूर्व एशिया के प्रमुख तेल क्षेत्र
| क्रम | देश | तेल क्षेत्र / स्थान | भौगोलिक स्थिति | प्रमुख विशेषताएँ |
| 1. | सऊदी अरब | घावर | पूर्वी प्रांत | विश्व का सबसे बड़ा ऑनशोर तेल क्षेत्र |
| 2. | सऊदी अरब | सफानिया | फारस की खाड़ी (ऑफशोर) | विश्व का सबसे बड़ा अपतटीय तेल क्षेत्र |
| 3. | इराक | किरकुक | उत्तरी इराक | ऐतिहासिक एवं रणनीतिक तेल क्षेत्र |
| 4. | इराक | रुमैला | दक्षिणी इराक | उच्च उत्पादन क्षमता |
| 5. | इराक | जुबैर | बसरा के निकट, दक्षिणी इराक | इराक के सबसे बड़े व पुराने तेल क्षेत्रों में से एक |
| 6. | ईरान | अहवाज़ | खुज़ेस्तान | ईरान का सबसे बड़ा ऑनशोर क्षेत्र |
| 7. | ईरान | हफ्त केल) | खुज़ेस्तान प्रांत | ईरान के सबसे पुराने तेल क्षेत्रों में से एक |
| 8. | कुवैत | बुर्गन | दक्षिण-पूर्व कुवैत | विश्व का दूसरा सबसे बड़ा ऑनशोर क्षेत्र |
| 9. | कुवैत | मगवा, अहमदी | कुवैत | सहायक उत्पादन क्षेत्र |
| 10. | कजाकिस्तान | काशगन | कैस्पियन सागर, कजाकिस्तान | अपतटीय क्षेत्र, मध्य एशिया में स्थित |
| 11. | यूएई | ज़कुम | अबू धाबी तट | यूएई का सबसे बड़ा क्षेत्र |
| 12. | यूएई | मुरबान | अबू धाबी | उच्च गुणवत्ता कच्चा तेल |
| 13. | क़तर | अल-शहीन | फारस की खाड़ी | प्रमुख अपतटीय क्षेत्र |
| 14. | ओमान | फहूद | उत्तरी ओमान | ओमान का मुख्य तेल क्षेत्र |
| 15. | बहरीन | अवाली | बहरीन द्वीप | अरब का पहला तेल क्षेत्र (1932) |
| 16. | सऊदी अरब | धाहरन | पूर्वी प्रांत | सऊदी अरामको का ऐतिहासिक मुख्यालय, तेल क्षेत्र का केंद्र |
- भूमध्यसागरीय जलवायु के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यहाँ शीतऋतु में वर्षा होती है।
- शीतकालीन अयनांत के कारण वायुदाब पेटियाँ दक्षिण की ओर खिसक जाती हैं।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- कथन 1 सत्य है: भूमध्यसागरीय जलवायु की सर्वाधिक विशिष्ट पहचान शीतकालीन वर्षा तथा ग्रीष्मकालीन शुष्कता है। ग्रीष्म ऋतु में यह क्षेत्र उपोष्णकटिबंधीय उच्च दाब पेटी के प्रभाव में रहता है। इस अवधि में वायु का अवरोहण होता है, जिससे बादल बनने की प्रक्रिया बाधित हो जाती है और वर्षा नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप गर्मियाँ सामान्यतः शुष्क रहती हैं। इसके विपरीत, शीत ऋतु में उपोष्णकटिबंधीय उच्च दाब पेटी का प्रभाव कम हो जाता है। इस समय पश्चिमी पवनें भूमध्यसागरीय क्षेत्र में प्रवेश करती हैं और उनके साथ आने वाले समशीतोष्ण चक्रवात पर्याप्त वर्षा कराते हैं। इसी कारण भूमध्यसागरीय जलवायु में शीतकालीन वर्षा को इसकी मौलिक विशेषता माना जाता है।
- कथन 2 सत्य है: शीतकालीन अयनांत उत्तरी गोलार्ध में लगभग 22 दिसंबर को घटित होता है, जब सूर्य की सीधी किरणें मकर रेखा पर पड़ती हैं। इस खगोलीय स्थिति के कारण तापीय विषुवत रेखा दक्षिण की ओर स्थानांतरित हो जाती है। तापीय विषुवत रेखा के इस स्थानांतरण का सीधा प्रभाव वैश्विक वायुदाब व्यवस्था पर पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ), उपोष्णकटिबंधीय उच्च दाब पेटियाँ तथा पश्चिमी पवन क्षेत्र सभी दक्षिण की ओर खिसक जाते हैं। यह परिवर्तन वैश्विक पवन व्यवस्था और वर्षा प्रतिरूप को प्रभावित करता है, विशेषकर मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में।
- पश्चिमी यूरोप की जलवायु के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- पश्चिमी यूरोप में सभी महीनों में वर्षा होती है।
- पश्चिमी यूरोप पछुआ पवनों की पेटी के अन्तर्गत स्थित है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 2
(b) केवल 1
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c )
व्याख्या:
कथन 1 सही है: पश्चिमी यूरोप में मुख्यतः समुद्री पश्चिमी तट जलवायु पाई जाती है। इस जलवायु की प्रमुख विशेषता यह है कि वर्ष भर मध्यम किंतु नियमित वर्षा होती रहती है तथा तापमान में अत्यधिक उतार–चढ़ाव नहीं पाया जाता। किसी एक विशेष ऋतु में वर्षा का पूर्ण अभाव इस जलवायु क्षेत्र में नहीं होता।
इस निरंतर वर्षा के पीछे अटलांटिक महासागर की निर्णायक भूमिका है। अटलांटिक से आने वाली आर्द्र समुद्री हवाएँ पूरे वर्ष सक्रिय रहती हैं और निरंतर नमी की आपूर्ति करती हैं। इसके अतिरिक्त, उत्तर अटलांटिक प्रवाह नामक गर्म महासागरीय धारा पश्चिमी यूरोप के तटीय एवं अंतर्देशीय भागों को अपेक्षाकृत गर्म और आर्द्र बनाए रखती है, जिससे वर्षा की संभावनाएँ बनी रहती हैं।
इसके साथ ही, समशीतोष्ण चक्रवात पूरे वर्ष इस क्षेत्र को प्रभावित करते रहते हैं। ये चक्रवात पश्चिमी पवनों के साथ गतिशील होकर नियमित वर्षा कराते हैं। इन्हीं कारणों से पश्चिमी यूरोप में सभी महीनों में वर्षा होती है और कथन 1 सही सिद्ध होता है।
कथन 2 भी सही है : पछुआ पवनें 30° से 60° अक्षांशों के बीच प्रवाहित होती हैं। उत्तरी गोलार्ध में इनका सामान्य प्रवाह दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर होता है। पश्चिमी यूरोप का अधिकांश भाग लगभग 40° से 60° उत्तर अक्षांश के बीच स्थित है, जिसके कारण यह क्षेत्र सीधे पछुआ पवनों की पेटी के अंतर्गत आता है।
इन पछुआ पवनों का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि वे अटलांटिक महासागर से प्रचुर मात्रा में नमी लेकर पश्चिमी यूरोप की ओर प्रवाहित होती हैं। नमी से परिपूर्ण ये पवनें बादल निर्माण और वर्षा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं। इसी कारण पश्चिमी यूरोप में वर्ष भर वर्षा की निरंतरता बनी रहती है। इस प्रकार भौगोलिक स्थिति और पवन व्यवस्था के आधार पर कथन 2 भी पूर्णतः सही है।
परीक्षा उपयोगी अतिरिक्त तथ्य
- पश्चिमी यूरोप की जलवायु को ब्रिटिश प्रकार की जलवायु भी कहा जाता है।
- प्रमुख क्षेत्र: ब्रिटेन, फ्रांस का पश्चिमी भाग, नीदरलैंड्स, बेल्जियम।
- कृषि पर प्रभाव: वर्ष भर घास की उपलब्धता → डेयरी फार्मिंग का विकास।
- ऊपरी गंगा के मैदानी कृषि जलवायु क्षेत्र के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- यह क्षेत्र केन्द्रीय और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विस्तृत है।
- इस क्षेत्र में सिंचाई गहनता 130% से अधिक तथा कृषि गहनता 140% है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) केवल 2
(b) केवल 1
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c )
व्याख्या:
कथन 1 — सही
ऊपरी गंगा का मैदानी कृषि–जलवायु क्षेत्र मुख्यतः गंगा नदी के ऊपरी प्रवाह के दोनों तटों पर विकसित है। इसका विस्तार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों के साथ-साथ केन्द्रीय उत्तर प्रदेश के कुछ भागों तक है। समतल स्थलाकृति, उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी तथा नदियों और नहरों के सघन जाल के कारण यह क्षेत्र कृषि के लिए अत्यंत अनुकूल है। इसलिए कथन 1 पूर्णतः सही है।
कथन 2 — सही
इस क्षेत्र में गंगा–यमुना नहर प्रणाली, नलकूपों के व्यापक प्रयोग और सतही व भूमिगत जल संसाधनों की प्रचुरता के कारण सिंचाई गहनता 130% से अधिक पाई जाती है। साथ ही वर्ष में खरीफ, रबी और ज़ायद जैसी दो से तीन फसलों की खेती होने से कृषि (फसल) गहनता 140% या उससे अधिक रहती है। अतः कथन 2 भी तथ्यात्मक रूप से सही है।
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची–Ⅰ सूची ⅠⅠ
(दर्रा) (समुद्र तल से ऊँचाई)
- देबसा – 1. 5360 मीटर
- रोहतांग – 2. 4850 मीटर
- बारा लाचा – 3. 3978 मीटर
- बनिहाल – 4. 2832 मीटर
कूट :
A B C D
(a) 3 1 4 2
(b) 1 4 2 3
(c) 1 3 2 4
(d) 3 1 2 4
उत्तर: (c)
व्याख्या:
(A) देबसा दर्रा — 5360 मीटर
- देबसा दर्रा हिमाचल प्रदेश में स्थित एक अत्यंत ऊँचा और दुर्गम पर्वतीय दर्रा है। इसका भौगोलिक महत्व इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि यह कुल्लू घाटी को स्पीति घाटी से जोड़ता है। अधिक ऊँचाई और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यह क्षेत्र मानवीय गतिविधियों की दृष्टि से सीमित रहा है।
- यह दर्रा विशेष रूप से ट्रेकिंग और साहसिक अभियानों के लिए प्रसिद्ध है। अत्यधिक ऊँचाई के कारण यहाँ मौसम की परिस्थितियाँ कठोर रहती हैं, जिससे यह दर्रा सामान्य यातायात के लिए उपयुक्त नहीं है।
(B) रोहतांग दर्रा — 3978 मीटर
- पर्वतीय दर्रा है, जो कुल्लू घाटी को लाहौल–स्पीति घाटी से जोड़ता है। यह दर्रा लंबे समय से क्षेत्रीय संपर्क और आवागमन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
- रणनीतिक एवं आर्थिक दृष्टि से रोहतांग दर्रा मनाली–लेह मार्ग का एक प्रमुख हिस्सा रहा है। वर्ष के अधिकांश समय यह हिमाच्छादित रहता है, जिससे यातायात में बाधाएँ उत्पन्न होती थीं। हाल ही में अटल सुरंग (रोहतांग) के निर्माण से इस दर्रे का महत्व और अधिक बढ़ गया है।
(C) बारा-लाचा दर्रा — 4850 मीटर
- बारा-लाचा दर्रा हिमाचल प्रदेश में स्थित एक महत्वपूर्ण उच्च पर्वतीय दर्रा है। यह लाहौल क्षेत्र को लद्दाख (लेह) से जोड़ता है और लेह–मनाली राजमार्ग का एक प्रमुख दर्रा है।
- भौगोलिक दृष्टि से यह दर्रा चंद्रभागा (चिनाब) और भागा नदियों के जलग्रहण क्षेत्र के निकट स्थित है, जिससे इसका जलविज्ञान संबंधी महत्व भी बढ़ जाता है। ऊँचाई और स्थिति के कारण यह दर्रा सामरिक एवं परिवहन दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
(D) बनिहाल दर्रा — 2832 मीटर
- बनिहाल दर्रा जम्मू और कश्मीर में स्थित एक प्रमुख पर्वतीय दर्रा है। यह जम्मू क्षेत्र को कश्मीर घाटी से जोड़ता है और ऐतिहासिक रूप से आवागमन का महत्वपूर्ण मार्ग रहा है।
- यह दर्रा जम्मू–श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है, जिससे इसका आर्थिक और सामरिक महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। बनिहाल सुरंग, जिसे जवाहर सुरंग भी कहा जाता है, इसी क्षेत्र में स्थित है और वर्ष भर संपर्क बनाए रखने में सहायक है।
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A) : जूट भारत का विशुद्ध पौधा है।
कारण (R) : जूट खरीफ की फसल है, जिसे फरवरी से जून में बोया जाता है तथा जुलाई से अक्टूबर के मध्य काटा जाता है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- अभिकथन (A) सही है: जूट भारत की एक प्राचीन एवं पारंपरिक रेशा फसल है। ऐतिहासिक, वनस्पति तथा कृषि-भौगोलिक अध्ययनों के अनुसार जूट का उद्गम भारत–बांग्लादेश के गंगा–ब्रह्मपुत्र डेल्टा क्षेत्र से माना जाता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से जूट की वृद्धि और प्रारंभिक विकास का प्रमुख केंद्र रहा है। भारत में जूट की खेती अत्यंत प्राचीन काल से होती चली आ रही है और औपनिवेशिक काल में यह एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक एवं निर्यात फसल के रूप में स्थापित हुई। वर्तमान समय में भी पश्चिम बंगाल, असम, बिहार और ओडिशा जैसे राज्य जूट उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र हैं। इन तथ्यों के आधार पर जूट को भारत का देशी अथवा विशुद्ध पौधा मानना पूर्णतः तथ्यसंगत है।
- कारण (R) सही है: जूट एक खरीफ ऋतु की फसल है, जिसकी कृषि-जलवायु आवश्यकताएँ उष्ण एवं आर्द्र परिस्थितियों से जुड़ी होती हैं। इसकी सफल खेती के लिए अपेक्षाकृत अधिक तापमान, उच्च आर्द्रता, पर्याप्त वर्षा तथा उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी आवश्यक मानी जाती है। सामान्यतः जूट की बुवाई विभिन्न क्षेत्रों में फरवरी से जून के बीच की जाती है, जबकि इसकी कटाई जुलाई से अक्टूबर के मध्य होती है। इस प्रकार कारण (R) में जूट की फसल ऋतु, बुवाई एवं कटाई काल का विवरण कृषि दृष्टि से पूर्णतः सही है।
- यद्यपि अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों अपने-अपने स्तर पर सही हैं, फिर भी कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता। अभिकथन (A) जूट की उत्पत्ति और देशीयता से संबंधित है, जबकि कारण (R) केवल उसकी कृषि ऋतु और फसल चक्र की जानकारी देता है। किसी फसल का खरीफ या रबी होना यह प्रमाणित नहीं करता कि वह उसी देश की देशी फसल है। उदाहरण के रूप में, कपास खरीफ फसल होते हुए भी उसकी सभी किस्मों का उद्गम भारत में नहीं हुआ है, और आलू शीतकालीन फसल होते हुए भी भारत का देशी पौधा नहीं है।
- रामगंगा परियोजना की विशेषताओं के संबंध में निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा सही सुमेलित नहीं है?
(a) सिंचित क्षेत्र – 6 लाख हेक्टेयर
(b) स्थिति – गढ़वाल (उत्तराखंड)
(c) बांध की लंबाई – 825.8 मीटर
(d) जलविद्युत शक्ति उत्पादन क्षमता – 198 मेगावाट
उत्तर: c
व्याख्या:
- रामगंगा परियोजना: रामगंगा परियोजना, जिसे कालागढ़ परियोजना अथवा कालागढ़ बाँध के नाम से भी जाना जाता है, उत्तराखंड राज्य में रामगंगा नदी पर स्थित एक महत्वपूर्ण बहुउद्देशीय परियोजना है। यह परियोजना मुख्य रूप से कृषि-सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण तथा क्षेत्रीय विकास के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर विकसित की गई है।
- परियोजना का उद्देश्य: रामगंगा परियोजना एक बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना है। इसका प्रमुख उद्देश्य कृषि क्षेत्रों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना, पनबिजली का उत्पादन करना तथा बाढ़ नियंत्रण में सहायता प्रदान करना है। इसके अतिरिक्त यह परियोजना आसपास के क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक विकास में भी योगदान देती है।
- स्थान (स्थिति): रामगंगा परियोजना उत्तराखंड राज्य के पौड़ी गढ़वाल ज़िले में स्थित कालागढ़ क्षेत्र में अवस्थित है। यह परियोजना पहाड़ी क्षेत्र में जल संग्रहण कर आगे उत्तर प्रदेश के मैदानी भागों में जल की आपूर्ति सुनिश्चित करती है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण परियोजना का क्षेत्रीय महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
- सिंचित क्षेत्र: इस परियोजना के अंतर्गत उपलब्ध जल का उपयोग उत्तरी भारत के विस्तृत कृषि क्षेत्रों की सिंचाई के लिए किया जाता है। अनुमानतः यह परियोजना लगभग छह लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा प्रदान करने की क्षमता रखती है। इस कारण रामगंगा परियोजना उत्तर भारत की कृषि व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
- जलविद्युत शक्ति उत्पादन क्षमता: रामगंगा परियोजना के अंतर्गत स्थापित जलविद्युत गृह की कुल क्षमता लगभग 198 मेगावाट है। इसमें समान क्षमता की तीन इकाइयाँ स्थापित की गई हैं, जिनके माध्यम से नियमित रूप से विद्युत उत्पादन किया जाता है। यह उत्पादन क्षेत्रीय ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक है।
- बाँध की लंबाई: रामगंगा बाँध, जिसे कालागढ़ बाँध भी कहा जाता है, मिट्टी और चट्टानों से निर्मित एक तटबंधीय बाँध है। इसकी वास्तविक लंबाई लगभग 630 मीटर है। अतः यदि बाँध की लंबाई 825.8 मीटर बताई जाती है, तो वह तथ्यात्मक रूप से गलत है। इसी आधार पर संबंधित सुमेलन में वही विकल्प गलत माना जाएगा।
- विश्व के कुछ देशों के कृषित क्षेत्रों के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- USA, चीन और जापान की तुलना में भारत का कृषित भौगोलिक क्षेत्र अधिकतम है।
- उष्ण मानसूनी जलवायु प्रदेश में स्थित होने के कारण भारत में वर्ष भर विविधीकृत फसलोत्पादन होता है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 2
(b) केवल 1
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c) 1 और 2 दोनों
व्याख्या:
कथन 1: संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और जापान की तुलना में भारत का कृषित भौगोलिक क्षेत्र अधिकतम है — सत्य
इस कथन का आशय यह है कि कुल कृषि योग्य अथवा कृषित भूमि के क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का स्थान इन देशों से ऊपर है। उपलब्ध आधिकारिक आँकड़ों (जैसे World Bank, FAO) के अनुसार भारत में लगभग सत्रह करोड़ हेक्टेयर के आसपास भूमि नियमित रूप से कृषि कार्यों में प्रयुक्त होती है। यह क्षेत्रफल संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन दोनों से अधिक है, जबकि जापान का कृषित क्षेत्रफल अपेक्षाकृत बहुत कम है।
यदि विश्व के प्रमुख कृषि प्रधान देशों की तुलना की जाए, तो भारत का कृषित भौगोलिक क्षेत्र सर्वाधिक पाया जाता है। इसी कारण भारत न केवल कृषि उत्पादन में अग्रणी है, बल्कि जनसंख्या के बड़े हिस्से की आजीविका भी कृषि पर निर्भर है। अतः कृषित भूमि के विस्तार के आधार पर कथन 1 को तथ्यात्मक रूप से सत्य माना जाता है।
कथन 2: उष्ण मानसूनी जलवायु प्रदेश में स्थित होने के कारण भारत में वर्ष भर विविधीकृत फसलोत्पादन होता है — सत्य
भारत का अधिकांश भाग उष्ण मानसूनी जलवायु प्रदेश के अंतर्गत आता है, जहाँ वर्षा, तापमान और ऋतु चक्र कृषि के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं। मानसून की मौसमी प्रकृति भारतीय कृषि व्यवस्था का आधार है और यही फसल विविधता का प्रमुख कारण भी है।
ग्रीष्म ऋतु के दौरान जून से सितंबर के बीच होने वाली मानसूनी वर्षा खरीफ फसलों के लिए अनुकूल वातावरण बनाती है। इस अवधि में धान, कपास, गन्ना और विभिन्न दलहन फसलों की खेती की जाती है। इसके पश्चात मानसून की वापसी के बाद शीत ऋतु में अपेक्षाकृत शुष्क मौसम रहता है, जिसमें सिंचाई की सहायता से गेहूँ, सरसों और चना जैसी रबी फसलें उगाई जाती हैं।
इसके अतिरिक्त ग्रीष्म ऋतु के सीमित काल में ज़ायद फसलें भी उगाई जाती हैं। इस प्रकार खरीफ, रबी और ज़ायद—तीनों फसल चक्रों के कारण भारत में वर्ष भर कृषि गतिविधियाँ चलती रहती हैं। मानसूनी जलवायु के साथ-साथ भौगोलिक विविधता, जैसे ऊँचाई, तापमान और वर्षा का असमान वितरण, भारत में फसलोत्पादन को चक्रीय और विविध बनाता है। इसलिए कथन 2 भी पूर्णतः सत्य है।
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-Ⅰ सूची ⅠⅠ
(स्थान) (नदियों का संगम)
- देवप्रयाग – 1. अलकनंदा और पिंडर
- रुद्रप्रयाग – 2. अलकनंदा और भागीरथी
- कर्णप्रयाग – 3. भागीरथी और भीलंगना
- टिहरी – 4. अलकनंदा और मंदाकिनी
कूट:
A B C D
(a) 2 4 1 3
(b) 4 1 3 2
(c) 4 1 2 3
(d) 2 3 1 4
उत्तर: (a)
व्याख्या:
उत्तराखंड के हिमालय क्षेत्र में बहने वाली अलकनंदा और भागीरथी नदी प्रणालियाँ भारतीय भौतिक भूगोल तथा धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा—दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इन नदियों के प्रवाह मार्ग में स्थित प्रमुख संगम स्थलों को प्रयाग कहा जाता है, जहाँ दो नदियाँ मिलकर एक नई नदी-धारा का निर्माण करती हैं। अलकनंदा नदी के साथ पाँच प्रमुख सहायक नदियों के संगम को सामूहिक रूप से पंचप्रयाग कहा जाता है।
| क्रम | संगम स्थल / प्रयाग | संबंधित नदियाँ | जिला / स्थान | भौगोलिक महत्व | धार्मिक / सांस्कृतिक / आधुनिक महत्व |
| A | देवप्रयाग | अलकनंदा + भागीरथी | टिहरी गढ़वाल | यहीं से संगम के बाद नदी को गंगा कहा जाता है | पंचप्रयागों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण, गंगा का आधिकारिक उद्गम स्थल |
| B | रुद्रप्रयाग | अलकनंदा + मंदाकिनी | रुद्रप्रयाग | मंदाकिनी नदी केदारनाथ क्षेत्र से निकलकर यहाँ अलकनंदा में मिलती है | केदारनाथ यात्रा मार्ग पर स्थित, भगवान शिव (रुद्र) से संबद्ध |
| C | कर्णप्रयाग | अलकनंदा + पिंडर | चमोली | पिंडर नदी नंदा देवी क्षेत्र से निकलती है | महाभारत के कर्ण से नाम जुड़ा, पंचप्रयागों में एक |
| D | टिहरी | भागीरथी + भीलंगना | टिहरी गढ़वाल | भीलंगना नदी भागीरथी में मिलती है | टिहरी बाँध स्थित, भारत की प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल |
- इसरो द्वारा विकसित “PraVaHa” सॉफ्टवेयर के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं ?
- यह विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र की अग्रणी उपलब्धि है।
- अंतरिक्ष वाहनों के प्रारंभिक वायुगतिकीय डिज़ाइन के लिए बड़ी संख्या में विन्यास के मूल्यांकन की आवश्यकता होती है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- “PraVaHa” एक स्वदेशी संगणकीय द्रव गतिकी आधारित सॉफ़्टवेयर है, जिसे विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र, तिरुवनंतपुरम द्वारा विकसित किया गया है। यह केन्द्र भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का प्रमुख प्रक्षेपण-यान अभिकल्पना केन्द्र है। इस सॉफ़्टवेयर का विकास विशेष रूप से रॉकेट, प्रक्षेपण यान तथा पुनःप्रवेश यानों के चारों ओर वायु प्रवाह के विश्लेषण के लिए किया गया है। “PraVaHa” का महत्व इस तथ्य में निहित है कि इसने विदेशी तकनीकी साधनों पर निर्भरता को कम किया है। यह स्वदेशी तकनीकी क्षमता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा के अनुरूप एक मार्गदर्शक उपलब्धि मानी जाती है। अतः कथन 1 पूर्णतः सही है।
- किसी भी अंतरिक्ष यान या प्रक्षेपण वाहन के विकास में प्रारंभिक अभिकल्पना चरण अत्यंत निर्णायक होता है। इस चरण में विभिन्न आकृतियों, नोज़ कोन, फिन, तथा चरणों जैसे अनेक अभिकल्प विकल्पों का परीक्षण किया जाता है। प्रत्येक विन्यास का परीक्षण इसलिए आवश्यक होता है ताकि वायुगतिकीय व्यवहार को बेहतर ढंग से समझा जा सके। इस प्रक्रिया के अंतर्गत वायु प्रतिरोध, उत्थान बल, झटका तरंगें, संरचनात्मक स्थिरता, ईंधन दक्षता तथा तापीय प्रभाव जैसे कारकों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। इन सभी पहलुओं को संतुलित और अनुकूल बनाने के लिए सैकड़ों से लेकर हजारों अभिकल्प विकल्पों का विश्लेषण आवश्यक होता है। इस प्रकार के व्यापक और जटिल मूल्यांकन को “PraVaHa” जैसे सॉफ़्टवेयर तेज़, सटीक और किफायती बनाते हैं। इसलिए कथन 2 भी वैज्ञानिक दृष्टि से सही है।
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): अप्रैल 2024 में भारत ने फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल प्रदान की।
कारण (R) : मिसाइल की मारक क्षमता 490 किलोमीटर है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- भारत और फिलीपींस के बीच जनवरी 2022 में लगभग 375 मिलियन अमेरिकी डॉलर का ब्रह्मोस मिसाइल निर्यात समझौता संपन्न हुआ था। इसी समझौते के अंतर्गत अप्रैल 2024 में भारत ने फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल प्रणाली की पहली खेप की आपूर्ति की। यह अवसर ऐतिहासिक था क्योंकि यह पहली बार था जब भारत ने किसी विदेशी देश को सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल का वास्तविक निर्यात किया। रणनीतिक दृष्टि से यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भारत की ‘मेक इन इंडिया’ पहल और रक्षा निर्यात नीति की बड़ी सफलता को दर्शाता है। फिलीपींस के लिए यह मिसाइल दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करने में सहायक है। अतः अभिकथन (A) पूरी तरह सत्य है।
- ब्रह्मोस मिसाइल की मारक क्षमता के संबंध में 490 किलोमीटर कोई मानक, आधिकारिक अथवा घोषित सीमा नहीं है। प्रारंभिक ब्रह्मोस मिसाइल की मारक क्षमता लगभग 290 किलोमीटर थी, जो मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था के प्रतिबंधों के कारण निर्धारित थी। भारत के 2016 में मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था में शामिल होने के बाद ब्रह्मोस मिसाइल की रेंज को बढ़ाकर लगभग 400 किलोमीटर से अधिक कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, नवीन उन्नत संस्करणों में इसकी मारक क्षमता को 600 से 800 किलोमीटर तक बढ़ाने की तकनीकी क्षमता विकसित की जा चुकी है। इस प्रकार 490 किलोमीटर की रेंज न तो प्रारंभिक संस्करण से मेल खाती है और न ही नवीनतम आधिकारिक संस्करणों से। इसलिए कारण (R) असत्य है।
- अप्रैल 2024 में हुए माओवाद-विरोधी ऑपरेशन के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- यह महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में हुआ था।
- यह ऑपरेशन BSF (बी.एस.एफ.) एवं डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड द्वारा किया गया था।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c )
व्याख्या:
- कथन 1 गलत है: अप्रैल 2024 में हुआ यह प्रमुख माओवाद-विरोधी अभियान महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में नहीं हुआ था। यह अभियान वास्तव में छत्तीसगढ़ राज्य के कांकेर जिले में, विशेष रूप से बिनागुंडा गाँव के निकट स्थित वन क्षेत्र में संचालित किया गया था। कांकेर जिला छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का हिस्सा है, जो लंबे समय से माओवादी गतिविधियों के प्रति संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है।
- कथन 2 सही है: इस माओवाद-विरोधी अभियान को संयुक्त रूप से सीमा सुरक्षा बल तथा डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड द्वारा अंजाम दिया गया था। डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड छत्तीसगढ़ पुलिस की एक विशेष इकाई है, जिसका गठन विशेष रूप से माओवादी उग्रवाद से निपटने के उद्देश्य से किया गया है। दोनों बलों के समन्वय से इस अभियान को सफलतापूर्वक संचालित किया गया। गश्त के दौरान माओवादियों द्वारा सुरक्षा बलों पर भारी गोलीबारी की गई, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच मुठभेड़ हुई। इस कार्रवाई के परिणामस्वरूप 29 माओवादियों के शव बरामद किए गए तथा 22 हथियार जब्त किए गए, जिनमें विभिन्न प्रकार की स्वचालित और अर्धस्वचालित राइफलें, पिस्तौलें, हथगोले और बड़ी मात्रा में गोला-बारूद शामिल था। इस मुठभेड़ में सुरक्षा बलों के तीन जवान घायल हुए, किंतु सभी की स्थिति खतरे से बाहर बताई गई।
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अधिकथन (A): मानव विकास सूचकांक (एच.डी.आई.) एवं सतत विकास लक्ष्यों (एस.डी.जी.) पर आधारित भारतीय राज्यों की वरीयता में सकारात्मक संबंध है।
कारण (R) : सतत विकास लक्ष्यों के आधारभूत आयामों का शिक्षा एवं स्वास्थ्य से घनिष्ठता के साथ संबंध है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- मानव विकास सूचकांक मुख्यतः स्वास्थ्य, शिक्षा और आय अथवा जीवन स्तर जैसे तीन बुनियादी आयामों पर आधारित होता है। इसी प्रकार सतत विकास लक्ष्य भी मानव कल्याण को केंद्र में रखकर निर्मित किए गए हैं। इनमें स्वास्थ्य, शिक्षा, गरीबी उन्मूलन, रोजगार और आर्थिक वृद्धि जैसे तत्वों को विशेष महत्व दिया गया है। इस कारण जिन भारतीय राज्यों में मानव विकास सूचकांक का स्तर अधिक होता है, वे प्रायः सतत विकास लक्ष्य आधारित सूचकों में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं। इस आधार पर मानव विकास सूचकांक और सतत विकास लक्ष्यों पर आधारित राज्यों की रैंकिंग के बीच सकारात्मक संबंध पाया जाता है। अतः अभिकथन (A) सही है।
- सतत विकास लक्ष्यों की संकल्पना मानव क्षमताओं के विकास को केंद्रीय स्थान देती है। शिक्षा और स्वास्थ्य न केवल अलग-अलग लक्ष्य के रूप में सम्मिलित हैं, बल्कि वे अन्य सभी लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक आधार भी प्रदान करते हैं। बेहतर स्वास्थ्य से उत्पादकता में वृद्धि होती है और गरीबी में कमी आती है, जबकि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा रोजगार, लैंगिक समानता और नवाचार को प्रोत्साहित करती है। इसी कारण नीति आयोग द्वारा तैयार किया गया सतत विकास लक्ष्य सूचकांक भी राज्यों के प्रदर्शन का मूल्यांकन मुख्यतः शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्रों में उपलब्धियों के आधार पर करता है। अतः कारण (R) भी सही है।
- अभिकथन (A) और कारण (R) के बीच स्पष्ट तार्किक संबंध है। मानव विकास सूचकांक और सतत विकास लक्ष्य दोनों का वैचारिक आधार शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूल मानव विकास तत्व हैं। यही साझा आधार यह स्पष्ट करता है कि क्यों दोनों सूचकों में राज्यों की रैंकिंग प्रायः एक-दूसरे के अनुरूप होती है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि सतत विकास लक्ष्यों के शिक्षा और स्वास्थ्य केंद्रित आयाम ही मानव विकास सूचकांक तथा सतत विकास लक्ष्य आधारित रैंकिंग के बीच पाए जाने वाले सकारात्मक संबंध की सही व्याख्या करते हैं।
- सूची-Ⅰ में देशों के नाम हैं, जबकि सूची-ⅠⅠ में वर्ष 2022 में प्रवासियों द्वारा भेजी गई राशि को क्रम (रैंक) के अनुसार दर्शाया गया है। सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
सूची–Ⅰ सूची–ⅠⅠ
(देश) (रैंक)
- मेक्सिको – 1. प्रथम
- चीन – 2. द्वितीय
- भारत – 3. तृतीय
- फिलीपींस – 4. चतुर्थ
कूट:
A B C D
(a) 1 2 3 4
(b) 3 4 2 1
(c) 4 1 2 3
(d) 2 3 1 4
उत्तर: d
व्याख्या:
- भारत — प्रथम स्थान: वर्ष 2022 में भारत विश्व का सबसे बड़ा धन-प्रेषण प्राप्तकर्ता देश रहा। प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी गई कुल राशि 111 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक थी। खाड़ी देशों, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप तथा दक्षिण–पूर्व एशिया में बड़ी भारतीय प्रवासी आबादी इसकी प्रमुख वजह रही। सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, निर्माण और सेवा क्षेत्रों में भारतीय श्रमिकों की व्यापक उपस्थिति ने भारत को इस क्षेत्र में अग्रणी बनाया। इसलिए भारत का प्रथम स्थान पर होना पूर्णतः सही है।
- मेक्सिको — द्वितीय स्थान: मेक्सिको को वर्ष 2022 में लगभग 61 अरब अमेरिकी डॉलर का धन-प्रेषण प्राप्त हुआ, जिसके कारण यह वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर रहा। संयुक्त राज्य अमेरिका में कार्यरत मैक्सिकन प्रवासी इस धन-प्रेषण का मुख्य स्रोत हैं। मेक्सिको की अर्थव्यवस्था में प्रवासी धनराशि की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर घरेलू उपभोग और सामाजिक स्थिरता के संदर्भ में। अतः मेक्सिको का द्वितीय स्थान सही है।
- चीन — तृतीय स्थान: चीन को वर्ष 2022 में लगभग 51 अरब अमेरिकी डॉलर का धन-प्रेषण प्राप्त हुआ, जिससे वह वैश्विक रैंकिंग में तृतीय स्थान पर रहा। यद्यपि चीन की अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, फिर भी प्रवासी धनराशि का सापेक्ष योगदान भारत और मेक्सिको की तुलना में कम है। इसके बावजूद कुल राशि के आधार पर चीन का तृतीय स्थान तथ्यात्मक रूप से सही है।
- फिलीपींस — चतुर्थ स्थान: फिलीपींस को वर्ष 2022 में लगभग 38 अरब अमेरिकी डॉलर का धन-प्रेषण प्राप्त हुआ, जिसके कारण वह चौथे स्थान पर रहा। इस देश की विशेषता यह है कि बड़ी संख्या में फिलीपीनी श्रमिक विदेशों में कार्यरत हैं। प्रवासी धनराशि फिलीपींस की सकल घरेलू उत्पाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और घरेलू अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करती है। अतः फिलीपींस का चतुर्थ स्थान भी पूर्णतः सही है।
2024 / 2024–25 में सर्वाधिक रेमिटेंस प्राप्त करने वाले देश
| क्रम | देश | रेमिटेंस प्राप्ति (लगभग, अरब अमेरिकी डॉलर) | प्रमुख तथ्य |
| 1 | भारत | 129+ | विश्व में सर्वाधिक रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश; अब तक का उच्चतम स्तर |
| 2 | मेक्सिको | 68 | अमेरिका में कार्यरत प्रवासी श्रमिकों से प्रमुख प्रवाह |
| 3 | चीन | 48 | एशिया के प्रमुख रेमिटेंस प्राप्त देशों में शामिल |
| 4 | फिलीपींस | 40 | अर्थव्यवस्था में रेमिटेंस का महत्वपूर्ण योगदान |
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-Ⅰ सूची ⅠⅠ
(राज्य) (2019-23 के दौरान आधारभूत संरचनाओं पर किए
गए खर्च के अनुसार श्रेष्ठता क्रम)
- महाराष्ट्र – 1. प्रथम
- उत्तर प्रदेश – 2. द्वितीय
- तमिलनाडु – 3. तृतीय
- कर्नाटक – 4. चतुर्थ
कूट :
A B C D
(a) 2 3 1 4
(b) 4 1 2 3
(c) 1 2 3 4
(d) 2 1 3 4
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- उत्तर प्रदेश — प्रथम स्थान: वर्ष 2019 से 2023 के बीच अवसंरचना व्यय के मामले में उत्तर प्रदेश प्रथम स्थान पर रहा। इस अवधि में राज्य का कुल अवसंरचना व्यय लगभग पाँच लाख इकतीस हजार करोड़ रुपये रहा। इसका प्रमुख कारण राज्य में बड़े पैमाने पर विकसित किया गया एक्सप्रेसवे नेटवर्क है, जिसमें पूर्वांचल, बुंदेलखंड, गंगा और यमुना एक्सप्रेसवे जैसे महत्त्वपूर्ण मार्ग शामिल हैं। इसके अतिरिक्त औद्योगिक कॉरिडोर, शहरी अवसंरचना और आवासीय परियोजनाओं में भी व्यापक निवेश किया गया। देश का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य होने के कारण यहाँ बड़े स्तर पर अवसंरचना विकास की आवश्यकता रही, जिसने इसे शीर्ष स्थान दिलाया।
- महाराष्ट्र — द्वितीय स्थान: महाराष्ट्र वर्ष 2019 से 2023 के बीच अवसंरचना व्यय के मामले में द्वितीय स्थान पर रहा, जहाँ कुल व्यय लगभग चार लाख उनतालीस हजार करोड़ रुपये रहा। इस राज्य में मुंबई मेट्रो और तटीय सड़क जैसी प्रमुख शहरी परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। इसके साथ ही औद्योगिक क्लस्टरों के विकास, बंदरगाहों, परिवहन नेटवर्क और ऊर्जा क्षेत्र में भी निरंतर निवेश किया गया। देश की सबसे बड़ी राज्य अर्थव्यवस्था होने के कारण महाराष्ट्र ने इस अवधि में उच्च पूंजीगत व्यय बनाए रखा।
- तमिलनाडु — तृतीय स्थान: तमिलनाडु ने 2019 से 2023 के दौरान लगभग दो लाख चौरासी हजार करोड़ रुपये का अवसंरचना व्यय किया और इस आधार पर तृतीय स्थान प्राप्त किया। राज्य में औद्योगिक अवसंरचना, बंदरगाह विकास, सड़क नेटवर्क और ऊर्जा परियोजनाओं पर विशेष जोर दिया गया। शहरी विकास भी राज्य की प्राथमिकताओं में शामिल रहा। निर्यात-उन्मुख उद्योगों और लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा देने की रणनीति के कारण तमिलनाडु का अवसंरचना निवेश अपेक्षाकृत संतुलित और लक्षित रहा।
- कर्नाटक — चतुर्थ स्थान: कर्नाटक वर्ष 2019 से 2023 के बीच अवसंरचना व्यय के मामले में चतुर्थ स्थान पर रहा, जहाँ कुल व्यय लगभग दो लाख छिहत्तर हजार करोड़ रुपये रहा। राज्य में शहरी अवसंरचना, विशेषकर बेंगलुरु महानगर क्षेत्र, सड़क नेटवर्क, सूचना प्रौद्योगिकी पार्कों और ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश किया गया। यद्यपि कर्नाटक की आर्थिक क्षमता सुदृढ़ है, फिर भी तुलनात्मक रूप से अन्य राज्यों की तुलना में इस अवधि में अवसंरचना व्यय थोड़ा कम रहा, जिसके कारण यह चौथे स्थान पर रहा।
- आई.सी.टी. आधारित ई-गवर्नेस के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
- ई-गवर्नेस सरकार की पारदर्शिता को कम करता है।
- ई-गवर्नेस से सरकार की लागत कम हो जाती है।
- ई-गवर्नेस से सरकार में नागरिकों का योगदान बढ़ जाता है।
- ई-गवर्नेस नौकरशाही की लाल फीताशाही को बढ़ाता है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 2, 3 और 4
(b) 1, 2 और 3
(c) 2 और 4
(d) 2 और 3
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- कथन 1: ई-गवर्नेंस सरकार की पारदर्शिता को कम करता है — गलत: ई-गवर्नेंस का मूल उद्देश्य प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ाना होता है, न कि उसे कम करना। ऑनलाइन पोर्टल, डैशबोर्ड, सूचना के अधिकार से जुड़े डिजिटल मंच और खुले आँकड़ा प्लेटफॉर्म के माध्यम से नागरिकों के लिए सूचनाओं तक पहुँच सरल और त्वरित हो जाती है। इससे निर्णय-प्रक्रिया अधिक स्पष्ट होती है और सरकारी कार्यों में जवाबदेही बढ़ती है।
- कथन 2: ई-गवर्नेंस से सरकार की लागत कम हो जाती है — सही: ई-गवर्नेंस के माध्यम से प्रशासनिक लागत में उल्लेखनीय कमी आती है। कागजी कार्यवाही में कमी, मैनुअल प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण, समय और मानव संसाधनों की बचत तथा सेवाओं की तेज़ और स्वचालित आपूर्ति जैसे कारक इसके प्रमुख कारण हैं। डिजिटल भुगतान और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण जैसी व्यवस्थाओं से धन की हानि कम होती है और कार्यालयी खर्च घटता है।
- कथन 3: ई-गवर्नेंस से सरकार में नागरिकों का योगदान बढ़ जाता है — सही: ई-गवर्नेंस सहभागी शासन को प्रोत्साहित करता है। डिजिटल मंचों के माध्यम से नागरिक सुझाव दे सकते हैं, शिकायत दर्ज करा सकते हैं और नीति-निर्माण प्रक्रियाओं में भाग ले सकते हैं। इससे सरकार और नागरिकों के बीच संवाद सशक्त होता है तथा जनभागीदारी बढ़ती है। परिणामस्वरूप लोकतांत्रिक सहभागिता मजबूत होती है, इसलिए यह कथन भी सही है।
- कथन 4: ई-गवर्नेंस नौकरशाही की लालफीताशाही को बढ़ाता है — गलत: वास्तव में ई-गवर्नेंस का उद्देश्य लालफीताशाही को कम करना है। डिजिटल प्रक्रियाएँ कार्यप्रणाली को सरल और समयबद्ध बनाती हैं तथा मानवीय हस्तक्षेप को घटाती हैं। इससे अनावश्यक विलंब, भ्रष्टाचार और अतिरिक्त अनुमोदनों में कमी आती है।
- संघ लोक सेवा आयोग को निम्नलिखित में से किस स्रोत/किन स्रोतों से कार्य-शक्तियाँ प्राप्त होती है/हैं ?
- संविधान
- संसदीय कानून
- कार्यकारी नियम और आदेश
- परम्पराएँ
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 1, 2, 3 और 4
(c) 1 और 2
(b) केवल 1
(d) 1 और 3
उत्तर: (a)
व्याख्या:
UPSC (संघ लोक सेवा आयोग) अपनी कार्य-शक्तियाँ निम्नलिखित स्रोतों से प्राप्त करता है:
- संविधान: संघ लोक सेवा आयोग की स्थापना, संरचना, कार्यक्षेत्र तथा उसकी स्वतंत्रता का मूल और सर्वोच्च आधार भारतीय संविधान है। संविधान के अंतर्गत अनुच्छेद 315 संघ लोक सेवा आयोग तथा राज्य लोक सेवा आयोगों की स्थापना का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 320 में आयोग के प्रमुख कार्यों का उल्लेख है, जिनमें भर्ती, पदोन्नति और अनुशासनात्मक मामलों में परामर्श देना शामिल है। अनुच्छेद 321 संसद को यह अधिकार देता है कि वह विधि द्वारा आयोग को अतिरिक्त कार्य सौंप सके। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 322 और 323 आयोग के सदस्यों की सेवा शर्तों, व्यय तथा प्रतिवेदन से संबंधित प्रावधान करते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि संघ लोक सेवा आयोग की शक्तियों का प्राथमिक और सर्वोच्च स्रोत संविधान ही है।
- संसदीय कानून: संविधान स्वयं यह व्यवस्था करता है कि संसद संघ लोक सेवा आयोग को अतिरिक्त कार्य और शक्तियाँ प्रदान कर सकती है। इसका आधार अनुच्छेद 321 है, जिसके अनुसार संसद विधि बनाकर आयोग को नए दायित्व सौंप सकती है। इसके अंतर्गत भर्ती प्रक्रियाओं, सेवा शर्तों और परामर्श की प्रकृति से संबंधित विभिन्न विधिक प्रावधान किए जाते हैं। प्रशासनिक सुधारों के संदर्भ में भी आयोग की भूमिका का विस्तार संसदीय कानूनों के माध्यम से संभव होता है। अतः संसदीय कानून भी संघ लोक सेवा आयोग की कार्य-शक्तियों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
- कार्यकारी नियम और आदेश: सरकार द्वारा जारी कार्यकारी नियम, अधिसूचनाएँ और आदेश भी संघ लोक सेवा आयोग के कार्यक्षेत्र को प्रभावित करते हैं। उदाहरणस्वरूप यह निर्धारित किया जाता है कि किन सेवाओं या पदों पर आयोग से परामर्श अनिवार्य होगा, भर्ती नियम क्या होंगे तथा सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े दिशा-निर्देश कैसे लागू किए जाएंगे। यद्यपि ये कार्यकारी नियम संविधान और संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अधीन होते हैं और आयोग की स्वतंत्रता को सीमित नहीं कर सकते, फिर भी ये उसके व्यावहारिक कार्य-क्षेत्र को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं।
- परम्पराएँ: संघ लोक सेवा आयोग की भूमिका केवल लिखित संवैधानिक और विधिक प्रावधानों तक सीमित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक प्रशासनिक परम्पराओं से भी विकसित हुई है। व्यवहार में सरकार अधिकांश मामलों में आयोग की सलाह को स्वीकार करती है और उसकी निष्पक्षता तथा राजनीतिक तटस्थता का सम्मान किया जाता है। कुछ परिस्थितियों में औपचारिक परामर्श के स्थान पर स्थापित प्रशासनिक प्रथाओं के अनुसार कार्य किया जाता है। ये परम्पराएँ आयोग की संस्थागत प्रतिष्ठा, स्वायत्तता और प्रभावशीलता को और अधिक सुदृढ़ बनाती हैं।
- निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही सुमेलित है ?
संवैधानिक निकाय संवैधानिक अनुच्छेद
(a) राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग – 340
(b) वित्त आयोग – 263
(c) निर्वाचन आयोग – 165
(d) राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग – 148
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- (a) राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग — अनुच्छेद 340: अनुच्छेद 340 राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान करता है कि वे सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति की जाँच के लिए एक आयोग का गठन करें। इसी संवैधानिक प्रावधान के अंतर्गत ऐतिहासिक रूप से पिछड़ा वर्ग आयोगों, जैसे काका कालेलकर आयोग और मंडल आयोग, का गठन किया गया था। यद्यपि 102वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2018 के पश्चात राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को अनुच्छेद 338B के अंतर्गत संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है, फिर भी इस प्रश्न में अनुच्छेद 338B विकल्पों में सम्मिलित नहीं है। इसलिए दिए गए विकल्पों के संदर्भ में (a) ही सही सुमेलन बनता है।
- (b) वित्त आयोग — अनुच्छेद 280: वित्त आयोग का गठन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत किया जाता है। यह आयोग केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व के वितरण से संबंधित सिफारिशें करता है। इसके विपरीत अनुच्छेद 263 अंतर-राज्य परिषद से संबंधित है, जिसका उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय और परामर्श को बढ़ावा देना है। अतः वित्त आयोग को अनुच्छेद 263 से जोड़ना गलत है।
- (c) निर्वाचन आयोग — अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग का प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में किया गया है, जो चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण से संबंधित है। दूसरी ओर, अनुच्छेद 165 राज्य के महाधिवक्ता से संबंधित है। इसलिए निर्वाचन आयोग को अनुच्छेद 165 से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से गलत है।
- (d) राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग — अनुच्छेद 338: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का गठन अनुच्छेद 338 के अंतर्गत किया गया है। यह आयोग अनुसूचित जातियों के अधिकारों और हितों की रक्षा से संबंधित है। इसके विपरीत अनुच्छेद 148 भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से संबंधित है। अतः राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को अनुच्छेद 148 से जोड़ना भी गलत सुमेलन है।
- निम्नलिखित के सही कालानुक्रम की पहचान कीजिए:
- शंकरी प्रसाद बनाम भारतीय संघ
- सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य
- गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य
- केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 3, 4, 2, 1
(b) 1, 2, 3, 4
(c) 1, 4, 3, 2
(d) 3, 2, 1, 4
उत्तर: (b)
व्याख्या:
प्रश्नगत मामलों का सही कालानुक्रमिक अनुक्रम इस प्रकार है:
- शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951)
-
- संदर्भ: संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951
- मुख्य प्रश्न: क्या संसद मौलिक अधिकारों का संशोधन कर सकती है?
- निर्णय:
-
- संसद को अनुच्छेद 368 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों में संशोधन की पूर्ण शक्ति है।
- अनुच्छेद 13 (जो “विधि” को मौलिक अधिकारों के विरुद्ध होने पर शून्य घोषित करता है) संवैधानिक संशोधन पर लागू नहीं होता।
- यह निर्णय संसद के पक्ष में था और सबसे प्रारंभिक है।
- सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1965)
-
- संदर्भ: संविधान (17वाँ संशोधन)
- मुख्य प्रश्न: क्या भूमि सुधार कानूनों को नौवीं अनुसूची में डालना वैध है?
- निर्णय:
-
- शंकरी प्रसाद के निर्णय की पुनः पुष्टि की गई।
- संसद की संशोधन शक्ति को बरकरार रखा गया।
- विशेष महत्व: पहली बार कुछ न्यायाधीशों ने संकेत दिया कि संसद की शक्ति असीमित नहीं हो सकती।
- गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967)
- मुख्य प्रश्न: क्या संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है?
- निर्णय:
- संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।
- अनुच्छेद 368 केवल प्रक्रिया बताता है, शक्ति नहीं।
- महत्त्व:
- यह निर्णय संसद की संशोधन शक्ति पर कड़ा प्रतिबंध लगाता है।
- यह निर्णय भावी अधिनिर्णय के सिद्धांत पर आधारित था।
- केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)
-
- संदर्भ: संविधान (24वाँ, 25वाँ, 29वाँ संशोधन)
- मुख्य प्रश्न: संसद की संशोधन शक्ति की सीमा क्या है?
- निर्णय:
-
-
- संसद को संविधान में संशोधन की व्यापक शक्ति है,
- लेकिन वह संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकती।
-
- महत्त्व:
-
- मूल संरचना सिद्धांत की स्थापना।
- गोलकनाथ और शंकरी प्रसाद के बीच संतुलन।
105.नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 352 आपातकालीन स्थिति की घोषणा से संबंधित है।
कारण (R):आपातकालीन स्थिति किसी भी समय उत्पन्न हो सकती है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: a
व्याख्या:
- अभिकथन (A) सही है: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 352 भाग XVIII के अंतर्गत आता है, जिसमें आपातकालीन उपबंधों का वर्णन किया गया है। यह अनुच्छेद राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा का संवैधानिक आधार प्रदान करता है। इसके अनुसार राष्ट्रीय आपातकाल केवल विशिष्ट परिस्थितियों में ही घोषित किया जा सकता है, जैसे युद्ध, बाह्य आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में। 44वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से आंतरिक अशांति के स्थान पर सशस्त्र विद्रोह शब्द को शामिल किया गया, जिससे इस प्रावधान को अधिक स्पष्ट और सीमित बनाया गया। अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, किंतु यह घोषणा मंत्रिपरिषद की लिखित सलाह पर आधारित होती है। इसके अतिरिक्त, इस घोषणा को संसद की स्वीकृति प्राप्त होना अनिवार्य है। इन सभी संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर यह स्पष्ट है कि अभिकथन (A) पूर्णतः सही है।
- कारण (R) गलत है: भारतीय संविधान में आपातकाल कोई सामान्य अथवा मनमाना प्रावधान नहीं है, जिसे किसी भी समय लागू किया जा सके। इसके विपरीत, संविधान आपातकाल की घोषणा के लिए विशिष्ट और स्पष्ट परिस्थितियों को निर्धारित करता है। आपातकाल की घोषणा केवल तब की जा सकती है जब संविधान में उल्लिखित परिस्थितियाँ, जैसे युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह, वस्तुतः विद्यमान हों। राष्ट्रपति की संतुष्टि भी इन वस्तुनिष्ठ परिस्थितियों पर आधारित होनी चाहिए और यह निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन होता है। इसलिए किसी भी समय आपातकाल उत्पन्न होने की बात कहना संवैधानिक सीमाओं और प्रक्रियाओं की अनदेखी करता है। अतः कारण (R) गलत है।
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-Ⅰ सूची ⅠⅠ
(योजना का नाम) (आरम्भ तिथि)
- प्रधानमंत्री आवास योजना– ग्रामीण – 1. मई, 2016
- जल जीवन मिशन – 2. अक्टूबर, 2014
- स्वच्छ भारत मिशन – ग्रामीण – 3. अगस्त, 2019
- प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना – 4. नवंबर, 2016
कूट :
A B C D
(a) 3 4 1 2
(b) 1 2 3 4
(c) 2 3 4 1
(d) 4 3 2 1
उत्तर: (d)
व्याख्या:
(A) प्रधानमंत्री आवास योजना – ग्रामीण — नवंबर, 2016
- उद्देश्य: 2022 (बाद में 2024/25 तक विस्तार) तक सभी के लिए आवास—विशेषकर ग्रामीण गरीबों के लिए।
- पृष्ठभूमि: यह इंदिरा आवास योजना का पुनर्गठित रूप है।
- लॉन्च: नवंबर 2016
- विशेषताएँ: पक्का घर, शौचालय, बिजली, एलपीजी, पेयजल जैसी सुविधाओं का अभिसरण।
(B) जल जीवन मिशन — अगस्त, 2019
- लॉन्च: 15 अगस्त 2019
- उद्देश्य: हर ग्रामीण परिवार को नल से जल उपलब्ध कराना।
- महत्त्व: स्वास्थ्य सुधार, महिलाओं पर जल-संग्रह का बोझ कम, सतत जल प्रबंधन।
(C) स्वच्छ भारत मिशन – ग्रामीण — अक्टूबर, 2014
- लॉन्च: 2 अक्टूबर 2014
- उद्देश्य: खुले में शौच की समाप्ति (ODF), स्वच्छता व्यवहार में परिवर्तन।
- उपलब्धि: बड़े पैमाने पर शौचालय निर्माण, ODF/ODF+/ODF++ की दिशा में प्रगति।
(D) प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना — मई, 2016
- लॉन्च: मई 2016
- उद्देश्य: बीपीएल/वंचित परिवारों की महिलाओं को स्वच्छ रसोई ईंधन उपलब्ध कराना।
- लाभ: स्वास्थ्य जोखिमों में कमी, महिलाओं के जीवनस्तर में सुधार।
- मानव विकास सूचकांक (एच.डी.आई.) में किन संकेतांकों का उपयोग किया जाता है?
- आय स्तर
- शिक्षा
- पर्यावरण की स्थिति
- संभावित जीवन अवधि या आयु
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 4
(c) केवल 1, 2 और 3
(d) केवल 1 और 4
उत्तर: (b)
व्याख्या:
मानव विकास सूचकांक एक समग्र मापदंड है, जिसके माध्यम से किसी देश या क्षेत्र में लोगों के जीवन की गुणवत्ता का आकलन किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल आर्थिक समृद्धि को मापना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि लोग कितने स्वस्थ हैं, कितने शिक्षित हैं और कितना सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं। इसी कारण मानव विकास सूचकांक को जीवन की बहुआयामी गुणवत्ता का संकेतक माना जाता है। मानव विकास सूचकांक तीन मूलभूत आयामों पर आधारित होता है—
- आय स्तर: आय स्तर मानव विकास सूचकांक का एक प्रमुख आयाम है। इसके माध्यम से यह आकलन किया जाता है कि लोगों का जीवन स्तर कैसा है और उनके पास जीवन यापन के लिए कितने आर्थिक संसाधन उपलब्ध हैं। इस उद्देश्य से प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय को ध्यान में रखा जाता है, जिससे औसत व्यक्ति की क्रय शक्ति और जीवन स्तर का अनुमान लगाया जा सके। इसलिए आय स्तर को मानव विकास सूचकांक का एक आवश्यक संकेतक माना जाता है।
- शिक्षा: शिक्षा मानव विकास का अत्यंत महत्वपूर्ण आधार है। मानव विकास सूचकांक में शिक्षा का आकलन दो पहलुओं के माध्यम से किया जाता है—वयस्क जनसंख्या द्वारा औसतन प्राप्त औपचारिक शिक्षा के वर्ष और बच्चों द्वारा भविष्य में प्राप्त की जाने वाली अनुमानित शिक्षा के वर्ष। यह आयाम समाज में ज्ञान, कौशल और बौद्धिक विकास के स्तर को दर्शाता है। इसी कारण शिक्षा को मानव विकास सूचकांक में शामिल किया गया है।
- संभावित जीवन अवधि / जीवन प्रत्याशा: संभावित जीवन अवधि या जीवन प्रत्याशा मानव विकास सूचकांक का एक अनिवार्य आयाम है, जो किसी समाज की स्वास्थ्य स्थिति को दर्शाता है। इसके माध्यम से यह आकलन किया जाता है कि किसी देश में जन्म लेने वाला व्यक्ति औसतन कितने वर्षों तक जीवित रहने की संभावना रखता है। यह आयाम स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, पोषण स्तर, स्वच्छता और समग्र जीवन परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करता है। इसलिए जीवन प्रत्याशा को मानव विकास सूचकांक में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाता है।
पर्यावरण की स्थिति, जैसे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, वन आवरण और जलवायु परिवर्तन, मानव कल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसके बावजूद मानव विकास सूचकांक की मूल गणना में इन कारकों को प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं किया जाता। इसलिए पर्यावरण की स्थिति को मानव विकास सूचकांक का मूल संकेतक नहीं माना जाता।
- भारत सरकार द्वारा प्रारम्भ की गई निम्नलिखित योजनाओं को कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए और नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
- स्वच्छ भारत मिशन
- प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना
- प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना
- प्रधानमंत्री महिला शक्ति केंद्र योजना
कूट:
(a) 3, 1, 2, 4
(b) 1, 2, 3, 4
(c) 2, 1, 4, 3
(d) 4, 2, 1, 3
उत्तर: (b)
व्याख्या:
योजनाओं का सही कालानुक्रमिक क्रम इस प्रकार है:
- स्वच्छ भारत मिशन — 2 अक्टूबर 2014
- उद्देश्य: खुले में शौच की समाप्ति; ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन; स्वच्छता के प्रति जन-जागरूकता।
- महत्त्व: गांधी जयंती से जोड़ा गया; शहरी एवं ग्रामीण दोनों घटक।
- प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना — 2015
- उद्देश्य: युवाओं को उद्योग-संगत कौशल प्रशिक्षण; रोजगार एवं स्वरोजगार को बढ़ावा।
- कार्यान्वयन: कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय
- महत्त्व: स्किल इंडिया मिशन का प्रमुख स्तंभ
- प्रधानमंत्री महिला शक्ति केंद्र योजना — 2017
- उद्देश्य: महिलाओं का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण; जिला एवं ब्लॉक स्तर पर समर्थन तंत्र।
- कार्यान्वयन: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय
- महत्त्व: बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ को संस्थागत समर्थन
- प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना — मार्च 2020
- संदर्भ: कोविड-19 महामारी
- उद्देश्य: गरीब, मजदूर, किसान, महिलाएँ एवं कमजोर वर्गों को राहत; निःशुल्क खाद्यान्न, डीबीटी, बीमा और नकद सहायता
- महत्त्व: आपदा-आधारित सामाजिक सुरक्षा योजना
- माल्थस ने तर्क दिया कि जनसंख्या_____ प्रगति में बढ़ती है, जबकि कृषि उत्पादन/खाद्य आपूर्ति____ प्रगति में बढ़ती है।
निम्नलिखित विकल्पों में से, रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए सही उत्तर चुनिए :
(a) ज्यामितीय, अंकगणितीय
(b) अंकगणितीय, ज्यामितीय
(c) रैखिक, घातांकीय
(d) घातांकीय, रैखिक
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- थॉमस रॉबर्ट माल्थस ने वर्ष 1798 में अपनी प्रसिद्ध कृति जनसंख्या के सिद्धांत पर निबंध प्रकाशित किया। माल्थस का मूल तर्क यह था कि जनसंख्या वृद्धि और खाद्य आपूर्ति की वृद्धि की दरों में अंतर्निहित असंतुलन दीर्घकाल में समाज के लिए गंभीर संकट उत्पन्न कर सकता है। उनके अनुसार यह असंतुलन सामाजिक, आर्थिक और नैतिक समस्याओं की जड़ बनता है।
- जनसंख्या की वृद्धि — ज्यामितीय प्रगति: माल्थस के अनुसार, यदि जनसंख्या की वृद्धि पर कोई बाधा न हो तो वह स्वाभाविक रूप से ज्यामितीय प्रगति में बढ़ती है। ज्यामितीय प्रगति का अर्थ है कि जनसंख्या निश्चित समयांतराल पर दोगुनी होती जाती है, जैसे एक से दो, दो से चार, चार से आठ और इसी प्रकार आगे बढ़ती रहती है। यह तीव्र वृद्धि मनुष्य की प्राकृतिक प्रजनन क्षमता तथा विवाह और संतति उत्पन्न करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण होती है। इसी आधार पर माल्थस ने निष्कर्ष निकाला कि जनसंख्या की वृद्धि की प्रवृत्ति अत्यंत तेज होती है।
- कृषि उत्पादन अथवा खाद्य आपूर्ति — अंकगणितीय प्रगति: इसके विपरीत माल्थस का मत था कि खाद्य उत्पादन या कृषि उत्पादन केवल अंकगणितीय प्रगति में बढ़ता है। अंकगणितीय प्रगति में प्रत्येक चरण पर समान मात्रा की वृद्धि होती है, जैसे एक से दो, दो से तीन, तीन से चार और आगे इसी क्रम में। खाद्य उत्पादन की इस सीमित वृद्धि के पीछे भूमि की सीमित उपलब्धता, प्राकृतिक संसाधनों की बाधाएँ और उस समय उपलब्ध तकनीकी स्तर जैसे कारक उत्तरदायी थे। परिणामस्वरूप खाद्य आपूर्ति की वृद्धि जनसंख्या की तुलना में अपेक्षाकृत धीमी रहती है।
- माल्थस का निष्कर्ष: माल्थस के अनुसार जब जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ती है और खाद्य आपूर्ति धीमी गति से बढ़ती है, तो दोनों के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जाता है। यही असंतुलन समाज में गंभीर संकटों को जन्म देता है। इसके परिणामस्वरूप अकाल, भूख, बीमारी, युद्ध और व्यापक गरीबी जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। माल्थस ने इन परिस्थितियों को जनसंख्या पर लगने वाले प्राकृतिक अथवा सकारात्मक नियंत्रण के रूप में देखा।
- माल्थस के नियंत्रण उपाय: माल्थस ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए दो प्रकार के उपायों का उल्लेख किया। पहला नैतिक नियंत्रण था, जिसके अंतर्गत विलंबित विवाह और संयम को शामिल किया गया। दूसरा प्राकृतिक नियंत्रण था, जिसमें अकाल, महामारी और युद्ध जैसे कारकों को शामिल किया गया। उनके अनुसार ये नियंत्रण जनसंख्या और खाद्य आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं, भले ही इनके सामाजिक परिणाम कठोर और पीड़ादायक क्यों न हों।
- काँग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- जनवरी 1934 में काँग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया गया।
- समाजवाद से सहानुभूति होने के कारण औपचारिक रूप में जवाहरलाल नेहरू इस दल में शामिल हुए।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 2
(b) केवल 1
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: d
व्याख्या :
- कथन 1 में यह कहा गया है कि जनवरी 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया गया। तथ्यात्मक रूप से यह कथन सही नहीं है। यद्यपि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की वैचारिक पहल 1933–34 के दौरान प्रारंभ हो गई थी, किंतु इसका औपचारिक संगठनात्मक गठन जनवरी 1934 में नहीं हुआ था। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का विधिवत गठन अक्टूबर 1934 में बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) में आयोजित इसके प्रथम सम्मेलन में हुआ। इस सम्मेलन में आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया और यूसुफ मेहरअली जैसे प्रमुख समाजवादी नेताओं ने निर्णायक भूमिका निभाई। इसलिए जनवरी 1934 को कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की आधिकारिक स्थापना तिथि नहीं माना जा सकता। अतः कथन 1 गलत है।
- कथन 2 में यह कहा गया है कि समाजवाद से सहानुभूति होने के कारण जवाहरलाल नेहरू औपचारिक रूप से कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए। यह कथन भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जवाहरलाल नेहरू समाजवाद से वैचारिक रूप से अत्यंत प्रभावित थे और वे सोवियत संघ तथा समाजवादी योजना के प्रबल प्रशंसक थे। इसके बावजूद नेहरू कभी भी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के औपचारिक सदस्य नहीं बने। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर रहकर ही समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि कांग्रेस को एक व्यापक और समावेशी राष्ट्रीय मंच के रूप में बनाए रखना आवश्यक है और किसी वैचारिक गुट में औपचारिक रूप से शामिल होने से कांग्रेस के भीतर विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। नेहरू के औपचारिक रूप से कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल न होने के कारण पार्टी के कई नेताओं में निराशा और असंतोष भी देखने को मिला। उन्हें यह महसूस हुआ कि नेहरू की समाजवादी प्रतिबद्धता व्यवहारिक राजनीति में अपेक्षाकृत सीमित रह गई।
- निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए :
- अबुल फजल की हत्या
- शेख मुबारक की मृत्यु
- फ़ैज़ी की मृत्यु
- दनियाल की मृत्यु
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 2, 4, 3, 1
(b) 2, 3, 1, 4
(c) 2, 1, 4, 3
(d) 3, 2, 1, 4
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- शेख मुबारक की मृत्यु — 1593 ई.: शेख मुबारक अकबर के शासनकाल के एक प्रमुख इस्लामी विद्वान, दार्शनिक और धार्मिक चिंतक थे। वे अकबर की धार्मिक उदारता तथा सुलह-ए-कुल की नीति के वैचारिक समर्थक माने जाते हैं। उनके विचारों का अकबर की धार्मिक सोच पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे दो महान विद्वानों—फ़ैज़ी और अबुल फ़ज़ल—के पिता भी थे। शेख मुबारक की मृत्यु 1593 ई. में हुई, इसलिए कालक्रम की दृष्टि से यह घटना सबसे पहले घटित हुई।
- फ़ैज़ी की मृत्यु — 1595 ई.: फ़ैज़ी अकबर के दरबार के प्रमुख कवि, विद्वान और अनुवादक थे। वे संस्कृत ग्रंथों के फ़ारसी अनुवाद कार्य में अग्रणी भूमिका निभाते थे, जिनमें महाभारत जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ भी शामिल हैं। उन्हें अकबर के नवरत्नों में गिना जाता है। फ़ैज़ी की मृत्यु 15 अक्टूबर 1595 ई. को हुई, जो शेख मुबारक की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद की घटना है।
- अबुल फ़ज़ल की हत्या — 1602 ई.: अबुल फ़ज़ल अकबर के अत्यंत निकट सहयोगी, प्रमुख इतिहासकार और कुशल प्रशासक थे। उन्होंने अकबरनामा और आईन-ए-अकबरी जैसी प्रसिद्ध कृतियों की रचना की, जो मुगल इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। राजकुमार सलीम, जो आगे चलकर जहाँगीर बने, से उनके वैचारिक और राजनीतिक मतभेद थे। इन्हीं कारणों से 1602 ई. में बुंदेलखंड क्षेत्र में उनकी हत्या करवा दी गई। यह घटना फ़ैज़ी की मृत्यु के बाद घटित हुई।
- दानियाल की मृत्यु — 1605 ई. : दानियाल अकबर के सबसे छोटे पुत्र थे और उन्हें प्रशासनिक रूप से सक्षम माना जाता था। हालांकि अत्यधिक मद्यपान की आदत के कारण उनका स्वास्थ्य धीरे-धीरे खराब हो गया। उनकी मृत्यु 19 मार्च 1605 ई. को हुई, जो अकबर की मृत्यु से कुछ ही महीने पहले की घटना है। इस प्रकार चारों घटनाओं में दानियाल की मृत्यु सबसे अंतिम मानी जाती है।
- निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए:
- लिनलिथगो का अगस्त प्रस्ताव
- क्रिप्स मिशन का भारत आगमन
- रामगढ़ काँग्रेस अधिवेशन
- काँग्रेसी मंत्रियों के त्याग पत्र
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 4, 2, 3, 1
(b) 1, 3, 4, 2
(c) 3, 1, 4, 2
(d) 4, 3, 1, 2
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- काँग्रेसी मंत्रियों के त्यागपत्र — 1939 : सितंबर 1939 में ब्रिटेन ने भारतीय नेताओं की सहमति के बिना भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में सम्मिलित कर लिया। कांग्रेस ने इस निर्णय को भारतीयों के लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन माना। इसके विरोधस्वरूप प्रांतीय स्वायत्तता के अंतर्गत कार्यरत कांग्रेस मंत्रियों ने विभिन्न प्रांतों में सामूहिक रूप से अपने पदों से त्यागपत्र दे दिए। यह कदम ब्रिटिश शासन के प्रति कांग्रेस के गहरे असंतोष को दर्शाता था और आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन के अधिक उग्र चरणों की भूमिका बना।
- रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन — मार्च 1940 : रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन मार्च 1940 में तत्कालीन बिहार प्रांत के रामगढ़ में आयोजित हुआ, जो वर्तमान में झारखंड राज्य में स्थित है। इस अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने की। इसमें कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की माँग को पुनः स्पष्ट रूप से दोहराया और ब्रिटिश सरकार को यह संदेश दिया कि भारत की सहमति के बिना किसी भी युद्ध-समर्थन को स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह अधिवेशन कांग्रेस की युद्धकालीन नीति को औपचारिक रूप से निर्धारित करने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
- लिनलिथगो का अगस्त प्रस्ताव — अगस्त 1940 : अगस्त 1940 में वायसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा एक संवैधानिक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, जिसे अगस्त प्रस्ताव के नाम से जाना जाता है। इसमें युद्ध के पश्चात संवैधानिक विकास का आश्वासन दिया गया तथा भारतीयों को कार्यकारी परिषद में अधिक प्रतिनिधित्व देने का संकेत दिया गया। हालांकि कांग्रेस ने इन प्रस्तावों को अपर्याप्त और अस्पष्ट मानते हुए अस्वीकार कर दिया। यह घटना ब्रिटिश सरकार द्वारा कांग्रेस को संतुष्ट करने का एक असफल प्रयास सिद्ध हुई।
- क्रिप्स मिशन का भारत आगमन — मार्च 1942 : मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक मिशन भारत भेजा, जिसका उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध में भारत का सहयोग प्राप्त करना था। इस मिशन के अंतर्गत युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस देने का प्रस्ताव रखा गया। कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक दलों ने इन प्रस्तावों को अस्पष्ट और अपूर्ण मानते हुए अस्वीकार कर दिया। क्रिप्स मिशन की असफलता के परिणामस्वरूप भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हुई। इस प्रकार यह चारों घटनाओं में सबसे अंतिम घटना मानी जाती है।
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-Ⅰ सूची ⅠⅠ
(पुस्तक) (लेखक)
- हिंदू पॉलिटी – 1. डी.डी. कोसाम्बी
- द वंडर दैट वाज़ इंडिया – 2. ए.एल. बाशम
- ऐन इंट्रोडक्शन टू द स्टडी ऑफ इंडियन हिस्ट्री – 3. के.पी. जायसवाल
- द अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया – 4. विंसेंट आर्थर स्मिथ
कूट:
A B C D
(a) 1 2 3 4
(b) 3 2 1 4
(c) 3 2 4 1
(d) 1 2 4 3
उत्तर: (b)
व्याख्या:
(A) हिंदू पॉलिटी — के. पी. जायसवाल : हिंदू पॉलिटी के लेखक के. पी. जायसवाल हैं। इस पुस्तक में प्राचीन भारत की राजनीतिक संस्थाओं का विस्तृत अध्ययन किया गया है, जिसमें गणराज्य, राजतंत्र तथा सभा–समिति जैसी व्यवस्थाओं का विश्लेषण शामिल है। इस कृति का प्रमुख महत्व यह है कि इसने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि प्राचीन भारत में लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक परंपराएँ विद्यमान थीं।
(B) द वंडर दैट वाज़ इंडिया — ए. एल. बाशम: द वंडर दैट वाज़ इंडिया के लेखक ए. एल. बाशम हैं। यह पुस्तक प्राचीन भारतीय सभ्यता की एक समग्र और संतुलित प्रस्तुति करती है, जिसमें धर्म, दर्शन, विज्ञान, कला, साहित्य और समाज जैसे विभिन्न पक्षों को सम्मिलित किया गया है। इसकी विशेषता यह है कि भारत को केवल राजनीतिक घटनाओं के माध्यम से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक उपलब्धियों के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। इस कृति ने विश्व स्तर पर भारत की सभ्यतागत पहचान को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(C) ऐन इंट्रोडक्शन टू द स्टडी ऑफ इंडियन हिस्ट्री — डी. डी. कोसाम्बी : ऐन इंट्रोडक्शन टू द स्टडी ऑफ इंडियन हिस्ट्री के लेखक डी. डी. कोसाम्बी हैं। इस पुस्तक में भारतीय इतिहास की वैज्ञानिक और भौतिकवादी व्याख्या प्रस्तुत की गई है। कोसाम्बी ने इतिहास लेखन में मार्क्सवादी पद्धति का प्रयोग करते हुए पुरातत्त्व, नृविज्ञान और अर्थव्यवस्था को ऐतिहासिक विश्लेषण से जोड़ा। इस कृति का महत्व इस बात में निहित है कि इसने भारतीय इतिहासलेखन को एक नया विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण प्रदान किया।
(D) द अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया — विंसेंट आर्थर स्मिथ: द अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया के लेखक विंसेंट आर्थर स्मिथ हैं। इस पुस्तक में मौर्य काल से गुप्त काल तक के प्राचीन भारतीय इतिहास का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है। इसका दृष्टिकोण औपनिवेशिक इतिहासलेखन शैली पर आधारित है। ब्रिटिश काल में यह कृति प्राचीन भारतीय इतिहास की पहली व्यवस्थित और क्रमबद्ध प्रस्तुति मानी जाती है।
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची–Ⅰ सूची ⅠⅠ
(जीवमंडल रिजर्व) (राज्य)
- सिमलीपाल – 1. केरल
- नोकरेक – 2. ओडिशा
- अगस्त्यमलाई – 3. असम
- मानस – 4. मेघालय
कूट :
A B C D
(a) 2 4 1 3
(b) 2 4 3 1
(c) 1 2 4 3
(d) 3 1 4 2
उत्तर: (a)
व्याख्या:
(A) सिमलीपाल — ओडिशा (2)
- सिमलीपाल जीवमंडल रिज़र्व ओडिशा राज्य के मयूरभंज ज़िले में स्थित है। यह क्षेत्र साल (साल वृक्ष) के घने वनों, समृद्ध जैव विविधता और विविध वन्यजीव प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध है। सिमलीपाल को पहले राष्ट्रीय उद्यान और बाघ अभयारण्य का दर्जा मिला तथा बाद में इसे यूनेस्को जीवमंडल रिज़र्व के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। यहाँ रॉयल बंगाल टाइगर, एशियाई हाथी, गौर तथा अनेक दुर्लभ वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। इसलिए सिमलीपाल का सही सुमेलन ओडिशा से है।
(B) नोकरेक — मेघालय (4)
- नोकरेक जीवमंडल रिज़र्व मेघालय राज्य के गारो पहाड़ियों में स्थित है। यह क्षेत्र अपनी अद्वितीय पारिस्थितिकी और उच्च वर्षा के लिए जाना जाता है। नोकरेक विशेष रूप से सिट्रस (संतरा) प्रजातियों के उद्गम स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यह जीवमंडल रिज़र्व पूर्वोत्तर भारत की जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अतः नोकरेक का सही सुमेलन मेघालय से होता है।
(C) अगस्त्यमलाई — केरल (1)
- अगस्त्यमलाई जीवमंडल रिज़र्व पश्चिमी घाट क्षेत्र में स्थित है और इसका विस्तार मुख्यतः केरल (तथा आंशिक रूप से तमिलनाडु) में है। यह क्षेत्र अत्यधिक वर्षा, सदाबहार वनों और उच्च स्थानिक (एंडेमिक) प्रजातियों के लिए जाना जाता है। अगस्त्यमलाई को जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में मान्यता प्राप्त है। यहाँ औषधीय पौधों की बहुतायत है और यह क्षेत्र पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। इसलिए इसका सही सुमेलन केरल से है।
(D) मानस — असम (3)
- मानस जीवमंडल रिज़र्व असम राज्य में स्थित है और यह भूटान की सीमा से सटा हुआ है। मानस क्षेत्र एक साथ राष्ट्रीय उद्यान, बाघ अभयारण्य और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। यह क्षेत्र ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली से जुड़ा हुआ है और यहाँ एक-सींग वाला गैंडा, रॉयल बंगाल टाइगर, स्वर्ण लंगूर जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसलिए मानस जीवमंडल रिज़र्व का सही सुमेलन असम से होता है।
भारत के प्रमुख जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र:
| क्रम संख्या | वर्ष | जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र का नाम | राज्य |
| 1 | 1986 | नीलगिरि जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक |
| 2 | 1988 | नन्दा देवी जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | उत्तराखंड |
| 3 | 1988 | नोकरेक जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | मेघालय |
| 4 | 1989 | गल्फ ऑफ मन्नार जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | तमिलनाडु |
| 5 | 1989 | सुंदरबन जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | पश्चिम बंगाल |
| 6 | 1989 | मानस जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | असम |
| 7 | 1989 | ग्रेट निकोबार जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह |
| 8 | 1994 | सिमलीपाल जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | ओडिशा |
| 9 | 1997 | दिब्रू–सैखोवा जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | असम |
| 10 | 1998 | दिहांग–दिबांग जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | अरुणाचल प्रदेश |
| 11 | 1999 | पंचमढ़ी जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | मध्य प्रदेश |
| 12 | 2000 | खांगचेंदजोंगा (कंचनजंगा) जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | सिक्किम |
| 13 | 2001 | अगस्थ्यमलाई जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | केरल, तमिलनाडु |
| 14 | 2005 | अचानकमार–अमरकंटक जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ |
| 15 | 2008 | ग्रेट रन ऑफ कच्छ जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | गुजरात |
| 16 | 2009 | शीत मरुस्थल (कोल्ड डेज़र्ट) जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | हिमाचल प्रदेश |
| 17 | 2010 | शेषाचलम पहाड़ियाँ जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | आंध्र प्रदेश |
| 18 | 2011 | पन्ना जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र | मध्य प्रदेश |
- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- वैज्ञानिक जाँच व्यावहारिक आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है।
- विज्ञान में ईमानदारी विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) कथन 1 सही है, 2 अप्रत्याशित है।
(b) कथन 1 सही है, 2 सही नहीं है।
(c) दोनों कथन 1 और 2 सही हैं।
(d) दोनों कथन 1 और 2 गलत हैं।
उत्तर(c)
व्याख्या:
कथन 1 सही है: वैज्ञानिक जाँच केवल प्रयोगों या अवलोकनों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह कुछ मूलभूत व्यावहारिक आदर्शों पर आधारित होती है। इनमें निष्पक्षता, तर्कसंगतता, सत्यनिष्ठा तथा पुनरावृत्ति और परीक्षणयोग्यता जैसे तत्व शामिल हैं। निष्पक्षता के अंतर्गत वैज्ञानिक व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर तथ्यों का विश्लेषण करता है, जबकि तर्कसंगतता कारण और परिणाम के आधार पर निष्कर्ष निकालने में सहायता करती है। सत्यनिष्ठा सत्य की खोज को सर्वोपरि रखती है और पुनरावृत्ति यह सुनिश्चित करती है कि प्राप्त परिणामों की जाँच दोबारा की जा सके। इन आदर्शों के अभाव में वैज्ञानिक अनुसंधान अव्यवस्थित, अविश्वसनीय और असत्यापित हो जाएगा। इसलिए यह स्पष्ट है कि वैज्ञानिक जाँच की विश्वसनीयता और सफलता इन व्यावहारिक आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है।
कथन 2 सही है: ईमानदारी विज्ञान की आधारशिला मानी जाती है। इसका अर्थ है कि वैज्ञानिक आँकड़ों का सही और निष्पक्ष संग्रह तथा प्रस्तुतीकरण करें, परिणामों में किसी भी प्रकार की हेरफेर या मनगढ़ंत निष्कर्षों से बचें और प्रयोगों की सीमाओं तथा संभावित त्रुटियों को स्वीकार करें। इसके साथ ही पूर्ववर्ती शोध और स्रोतों का उचित संदर्भ देना भी वैज्ञानिक ईमानदारी का अनिवार्य अंग है। यदि ईमानदारी का पालन न किया जाए, तो गलत सिद्धांत विकसित हो सकते हैं, नीतिगत निर्णय भ्रामक हो सकते हैं और समाज तथा मानव जीवन पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण अनुसंधान कदाचार को विज्ञान में एक गंभीर अपराध माना जाता है।
- निम्नलिखित में से कौन-सा उच्च से निचले क्रम में पौधों की प्रजातियों का सही क्रम है?
(a) पादप जगत – संघ – वर्ग – गण
(b) वर्ग – पादप जगत – संघ – गण
(c) वर्ग संघ – गण – पादप जगत
(d) गण – वर्ग – संघ – पादप जगत
उत्तर: (a)
व्याख्या:
जैव वर्गीकरण वह वैज्ञानिक प्रणाली है जिसके अंतर्गत जीवों को उनकी संरचना, विकासात्मक समानताओं तथा आनुवंशिक संबंधों के आधार पर क्रमबद्ध किया जाता है। पौधों के संदर्भ में यह वर्गीकरण वनस्पति विज्ञान के अंतर्गत किया जाता है। इसका उद्देश्य पौधों की विशाल विविधता को एक व्यवस्थित ढाँचे में समझना, पहचानना और अध्ययन को सरल बनाना है।
- पादप जगत: पादप जगत वर्गीकरण का सबसे उच्च और व्यापक स्तर है। इस स्तर पर सभी प्रकार के पौधों को एक साथ सम्मिलित किया जाता है। इसमें शैवाल, ब्रायोफाइट, टेरिडोफाइट, जिम्नोस्पर्म तथा एंजियोस्पर्म जैसे सभी पादप समूह शामिल होते हैं। सभी पौधों की मूलभूत विशेषताएँ, जैसे स्वपोषी होना और प्रकाश संश्लेषण की क्षमता, इसी स्तर पर निर्धारित की जाती हैं।
- संघ: पादप जगत को आगे संरचनात्मक तथा प्रजनन संबंधी समानताओं के आधार पर विभिन्न संघों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक संघ पौधों के एक विशिष्ट समूह का प्रतिनिधित्व करता है। उदाहरण के रूप में ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा और स्पर्मेटोफाइटा प्रमुख संघ हैं। इस स्तर पर पौधों के शरीर की जटिलता और प्रजनन विधियों में अंतर स्पष्ट होने लगता है।
- वर्ग: प्रत्येक संघ को आगे वर्गों में बाँटा जाता है। वर्गीकरण का यह स्तर पौधों की अधिक सूक्ष्म विशेषताओं पर आधारित होता है। उदाहरण के लिए एंजियोस्पर्मा संघ के अंतर्गत पौधों को एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री वर्गों में विभाजित किया जाता है। बीज की संरचना और भ्रूणीय पत्तियों की संख्या के आधार पर यह विभाजन किया जाता है।
- गण: वर्ग के अंतर्गत समान लक्षणों वाले पौधों को गण या क्रम में रखा जाता है। इस स्तर पर पौधों की पुष्प संरचना, फल और अन्य शारीरिक विशेषताओं में समानता पाई जाती है। उदाहरण के रूप में द्विबीजपत्री वर्ग के अंतर्गत रोसालेस और मालवालेस जैसे गण सम्मिलित हैं। यह स्तर पौधों के पारस्परिक संबंधों को और अधिक स्पष्ट करता है।
- निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा “पारिस्थितिकीय निकेत” के बारे में सही नहीं है ?
(a) यदि किसी आवास में संसाधनों का समान वितरण होता है, तो एकल प्रजाति का प्रभुत्व न्यूनतम हो जाता है।
(b) पारिस्थितिकीय निकेत में यदि संसाधन पर्याप्त हैं, तो प्रजातियों की संख्या कम हो जाती है।
(c) प्रबल प्रजातियाँ विस्तृत एवं व्यापक पारिस्थितिकीय निकेत को घेरती हैं।
(d) प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र के पारिस्थितिकीय निकेत में यदि संसाधन पर्याप्त हैं, तो प्रजातियों की अधिक संख्या हो जाती है।
उत्तर: (b)
व्याख्या:
पारिस्थितिकीय निकेत से आशय किसी प्रजाति की उस विशिष्ट भूमिका से है, जो वह पारिस्थितिकी तंत्र में निभाती है। इसमें यह शामिल होता है कि वह प्रजाति किन संसाधनों का उपयोग करती है, अन्य प्रजातियों के साथ उसका अंतःक्रिया संबंध कैसा है, तथा वह किन पर्यावरणीय परिस्थितियों में स्वयं को अनुकूलित कर पाती है। सरल शब्दों में, पारिस्थितिकीय निकेत यह स्पष्ट करता है कि कोई प्रजाति कहाँ रहती है, क्या खाती है, कैसे जीवित रहती है और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में उसका स्थान क्या है।
(a): यदि किसी आवास में संसाधनों का समान वितरण होता है, तो एकल प्रजाति का प्रभुत्व न्यूनतम हो जाता है — सही
जब किसी आवास में भोजन, स्थान, प्रकाश जैसे संसाधन समान रूप से उपलब्ध होते हैं, तब किसी एक प्रजाति को असामान्य लाभ प्राप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में प्रतिस्पर्धा संतुलित बनी रहती है और कोई भी प्रजाति अत्यधिक प्रभुत्व स्थापित नहीं कर पाती। परिणामस्वरूप समुदाय में विभिन्न प्रजातियाँ सह-अस्तित्व में रह पाती हैं और जैव-विविधता में वृद्धि होती है। इसलिए यह कथन सही है।
(b): पारिस्थितिकीय निकेत में यदि संसाधन पर्याप्त हैं, तो प्रजातियों की संख्या कम हो जाती है — गलत
यह कथन पारिस्थितिक सिद्धांतों के विपरीत है। जब किसी पारिस्थितिकीय निकेत में संसाधन पर्याप्त और विविध होते हैं, तब प्रजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा कम हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों में अधिक संख्या में प्रजातियाँ एक ही क्षेत्र में सह-अस्तित्व बनाए रख सकती हैं। अतः संसाधनों की प्रचुरता सामान्यतः प्रजातियों की संख्या को बढ़ाती है, न कि घटाती है। इसी कारण यह कथन गलत है।
(c): प्रबल प्रजातियाँ विस्तृत एवं व्यापक पारिस्थितिकीय निकेत को घेरती हैं — सही
प्रबल अथवा प्रभुत्वशाली प्रजातियाँ सामान्यतः संसाधनों की व्यापक श्रृंखला का उपयोग करने में सक्षम होती हैं। वे पर्यावरणीय उतार–चढ़ाव के प्रति अधिक सहनशील होती हैं और विभिन्न परिस्थितियों में जीवित रह सकती हैं। इसी कारण ऐसी प्रजातियाँ अन्य प्रजातियों की तुलना में अधिक विस्तृत पारिस्थितिकीय निकेत में पाई जाती हैं। इसलिए यह कथन सही है।
(d): प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र में यदि पारिस्थितिकीय निकेत के संसाधन पर्याप्त हों, तो प्रजातियों की संख्या अधिक हो जाती है — सही
यह कथन जैव-विविधता के एक मूलभूत सिद्धांत को स्पष्ट करता है। संसाधनों की पर्याप्तता से प्रजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा में कमी आती है, जिससे अधिक प्रजातियाँ एक ही पारिस्थितिकी तंत्र में सह-अस्तित्व बनाए रख पाती हैं। इस सह-अस्तित्व के परिणामस्वरूप प्रजातियों की संख्या और जैव-विविधता दोनों में वृद्धि होती है। अतः यह कथन पूर्णतः सही है।
118 . सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-Ⅰ सूची ⅠⅠ
(लेखक) (पुस्तक)
- लल्लनजी गोपाल – 1. अ कंप्रिहेंसिव हिस्ट्री ऑफ इंडिया : द दिल्ली सल्तनत
- हबीब एवं निज़ामी – 2. द इकोनॉमिक लाइफ ऑफ नॉर्थर्न इंडिया
- के.एस. लाल – 3. अर्ली चौहान डाइनेस्टीज़
- दशरथ शर्मा – 4. हिस्ट्री ऑफ द खलजीज़
कूट :
कोड:
A B C D
(a) 3 4 1 2
(b) 4 3 1 2
(c) 2 1 4 3
(d) 1 2 3 4
उत्तर: ( c)
व्याख्या:
| क्रम | लेखक / इतिहासकार | पुस्तक का नाम | विषय-वस्तु / अध्ययन क्षेत्र |
| (A) | लल्लनजी गोपाल | The Economic Life of Northern India | प्राचीन एवं प्रारंभिक मध्यकालीन उत्तर भारत की सामाजिक–आर्थिक संरचना; कृषि, व्यापार, कर व्यवस्था, शिल्प तथा ग्रामीण–शहरी अर्थव्यवस्था का विश्लेषण |
| (B) | इरफ़ान हबीब एवं ख़लीक अहमद निज़ामी | A Comprehensive History of India : The Delhi Sultanate | दिल्ली सल्तनत का समग्र इतिहास—राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक पक्ष |
| (C) | के. एस. लाल | History of the Khaljis | खलजी वंश का शासन, प्रशासनिक सुधार, सैन्य विस्तार एवं सामाजिक प्रभाव |
| (D) | दशरथ शर्मा | Early Chauhan Dynasties | चौहान वंश का प्रारंभिक इतिहास—उत्पत्ति, राजनीतिक विकास, प्रशासन एवं राजपूत इतिहास |
- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- बिहार में जगदीशपुर के जमींदार, कुँवर सिंह ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया।
- लॉर्ड डलहौजी ने रानी लक्ष्मी बाई के दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी होने की मान्यता प्रदान की।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- कथन 1: कुँवर सिंह बिहार के जगदीशपुर, वर्तमान भोजपुर जिले, के प्रमुख जमींदार थे। उन्होंने 1857 के विद्रोह के दौरान बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में अंग्रेज़ों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया। लगभग अस्सी वर्ष की आयु में भी उन्होंने अद्भुत साहस और रणनीतिक कौशल का प्रदर्शन करते हुए गुरिल्ला युद्ध पद्धति अपनाई और कई मोर्चों पर अंग्रेज़ी सेनाओं को कड़ी चुनौती दी। उनकी वीरता, संगठन क्षमता और नेतृत्व के कारण बिहार क्षेत्र में विद्रोह को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ। इसलिए कथन 1 पूर्णतः सही है।
- कथन 2: यह कथन तथ्यात्मक रूप से असत्य है। लॉर्ड डलहौजी ने देशी रियासतों के विलय के लिए डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स की नीति अपनाई थी। इस सिद्धांत के अनुसार यदि किसी देशी राज्य का शासक प्राकृतिक उत्तराधिकारी के बिना मृत्यु को प्राप्त होता था, तो उस रियासत को अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला लिया जाता था। झाँसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु के पश्चात रानी लक्ष्मी बाई ने अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को उत्तराधिकारी घोषित किया। किंतु लॉर्ड डलहौजी ने दत्तक उत्तराधिकारी को मान्यता देने से इंकार कर दिया और झाँसी को ब्रिटिश शासन में विलय कर लिया। यही अन्याय रानी लक्ष्मी बाई के अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह का एक प्रमुख कारण बना। अतः कथन 2 गलत है।
- निम्नलिखित विदेशी यात्रियों पर विचार कीजिए तथा उन्हें आरोही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए :
- इत्सिंग
- अल-बरुनी
- ह्वेन त्सांग
- फाह्यान
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 3, 4, 2, 1
(b) 2,4,3
(c) 1, 2, 3, 4
(d) 4,3 1,2
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- इत्सिंग: इत्सिंग एक चीनी बौद्ध भिक्षु थे जो 7वीं शताब्दी ई.पू. (लगभग 671-695 ई.पू.) में भारत आए थे। वे बौद्ध धर्म का अध्ययन करने आए थे और उन्होंने कई बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद किया था।
- अल–बिरूनी: अल–बिरूनी एक फ़ारसी विद्वान थे जो 11वीं शताब्दी ई. (लगभग 1017 ई.) में महमूद ग़ज़नी के समय भारत आए थे। उन्हें उनकी कृति “किताब अल–हिंद” के लिए जाना जाता है, जो भारतीय संस्कृति, विज्ञान और धर्म का विस्तृत विवरण प्रदान करती है।
- ह्वेनत्सांग (ह्वेन त्सांग): ह्वेन त्सांग एक चीनी बौद्ध भिक्षु थे, जो 7वीं शताब्दी ई.पू. (लगभग 630-645 ई.पू.) में भारत आए थे। उन्होंने बौद्ध धर्म का अध्ययन करने के लिए भारत में व्यापक यात्रा की और भारतीय समाज और संस्कृति के विस्तृत अभिलेख छोड़े।
- फाह्यान (फा–हिएन): फा–हिएन एक चीनी बौद्ध भिक्षु थे, जो 5वीं शताब्दी की शुरुआत में (लगभग 399-414 ई.) भारत आए थे। वे बौद्ध धर्मग्रंथों को इकट्ठा करने और बौद्ध प्रथाओं का पालन करने आए थे।
कालानुक्रमिक क्रम में:
| क्रम (कालानुक्रम) | नाम | शताब्दी | भारत आगमन / सक्रिय काल | संक्षिप्त परिचय |
| 1. | फाहियान | 5वीं शताब्दी ई. | 399–414 ई. | बौद्ध भिक्षु; गुप्त कालीन समाज, प्रशासन और बौद्ध धर्म पर महत्वपूर्ण विवरण |
| 2. | ह्वेन त्सांग | 7वीं शताब्दी ई. | 630–645 ई. | नालंदा सहित भारत की शिक्षा, धर्म और प्रशासन का विस्तृत वर्णन |
| 3. | इत्सिंग | 7वीं शताब्दी ई. | 671–695 ई. | बौद्ध ग्रंथों, मठों और समुद्री मार्गों पर महत्वपूर्ण विवरण |
| 4. | अल-बिरूनी | 11वीं शताब्दी ई. | लगभग 1017 ई. | विद्वान; भारतीय समाज, धर्म, विज्ञान और दर्शन पर प्रसिद्ध कृति किताब-उल-हिंद |
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): बलबन ने अपने शासन को सुदृढ़ बनाया और सम्पूर्ण सत्ता की अपने हाथों में केन्द्रित कर लिया।
कारण (R) : वह उत्तर-पश्चिम सीमा को मंगोल आक्रमणों से सुरक्षित करना चाहता था।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- बलबन ने दिल्ली सल्तनत में शासन की एक कठोर केंद्रीकृत व्यवस्था स्थापित की। उसने राजत्व की दैवी अवधारणा को प्रोत्साहित किया और स्वयं को ईश्वर की इच्छा से शासक मानते हुए सुल्तान की सर्वोच्चता पर बल दिया। तुर्की अमीरों, विशेष रूप से चहलगानी की शक्ति को सीमित किया गया, दरबारी अनुशासन को सख़्त बनाया गया और क़ानून-व्यवस्था पर कठोर नियंत्रण स्थापित किया गया। विद्रोहों के दमन, गुप्तचर व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण और दंडात्मक नीतियों के माध्यम से बलबन ने आंतरिक स्थिरता सुनिश्चित की। इन सभी उपायों से यह स्पष्ट होता है कि सत्ता का केंद्रीकरण उसकी प्रमुख शासन-नीति थी। अतः अभिकथन (A) सही है।
- बलबन के शासनकाल में मंगोलों का खतरा वास्तविक और लगातार बना हुआ था। इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए उसने उत्तर-पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया। सीमावर्ती क्षेत्रों में चौकियाँ स्थापित की गईं, सैन्य तैयारियों को सुदृढ़ किया गया और प्रशासनिक सतर्कता बढ़ाई गई। यह नीति सल्तनत की भौगोलिक सुरक्षा और बाहरी आक्रमणों से रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक थी। अतः कारण (R) तथ्यात्मक रूप से सही है।
- यद्यपि अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों ही सही हैं, फिर भी कारण (R), अभिकथन (A) की प्रत्यक्ष व्याख्या नहीं करता। बलबन द्वारा सत्ता का केंद्रीकरण मुख्यतः आंतरिक अव्यवस्था, अमीरों की अत्यधिक शक्ति और सल्तनत की प्रशासनिक कमजोरी को दूर करने के उद्देश्य से किया गया था। मंगोल आक्रमणों से निपटना उसकी सुरक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष अवश्य था, किंतु यह केंद्रीकरण का एकमात्र या प्रत्यक्ष कारण नहीं था। इसलिए दोनों कथन सही होने पर भी कारण, अभिकथन की सही व्याख्या नहीं करता।
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-Ⅰ सूची ⅠⅠ
(निबंधकार) (निबंध)
- देवना भट्ट – 1. दान सागर
- हेमाद्रि – 2. पराशर माधव
- माधवाचार्य – 3. चतुर्वर्ग चिंतामणि
- बल्लाल सेन – 4. स्मृति चंद्रिका
कूट:
A B C D
(a) 4 3 2 1
(b) 3 2 1 4
(c) 2 4 1 3
(d) 1 4 2 3
उत्तर: (a)
व्याख्या:
(A) देवना भट्ट — स्मृति चंद्रिका
- देवना भट्ट एक प्रसिद्ध धर्मशास्त्री एवं निबंधकार थे।
- उनका प्रमुख ग्रंथ स्मृति चंद्रिका स्मृति साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण रचना है।
- इसमें वर्णाश्रम धर्म, आचार, व्रत, दान एवं सामाजिक कर्तव्यों का विस्तृत विवेचन मिलता है।
(B) हेमाद्रि — चतुर्वर्ग चिंतामणि
- हेमाद्रि (13वीं शताब्दी) यादव वंश के शासक महादेव के दरबारी विद्वान थे।
- उनका ग्रंथ चतुर्वर्ग चिंतामणि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों पर आधारित एक महान निबंध-संग्रह है।
- यह मध्यकालीन धर्मशास्त्र का अत्यंत प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।
(C) माधवाचार्य — पराशर माधव
- माधवाचार्य एक प्रतिष्ठित धर्मशास्त्री एवं वैदिक विद्वान थे।
- उनका ग्रंथ पराशर माधव, पराशर स्मृति पर आधारित एक व्याख्यात्मक निबंध है।
- इसमें विशेष रूप से कलियुगीन धर्म, आचार और कर्तव्यों पर प्रकाश डाला गया है।
(D) बल्लाल सेन — दान सागर
- बल्लाल सेन (12वीं शताब्दी) बंगाल के सेन वंश के शासक एवं विद्वान थे।
- उनका ग्रंथ दान सागर दान की विधियों, प्रकारों और धार्मिक महत्व पर केंद्रित है।
- यह ग्रंथ स्मृति-निबंध परंपरा में एक विशिष्ट स्थान रखता है।
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): भारत पर तुर्की आक्रमण सफल हुआ।
कारण (R): उत्तर भारत में राजनीतिक एकता नहीं थी।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: c
व्याख्या:
अभिकथन (A) सही है: ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी के दौरान तुर्की आक्रमणकारियों, जैसे महमूद ग़ज़नवी और मुहम्मद ग़ोरी, ने उत्तर भारत पर बार-बार आक्रमण किए। प्रारंभ में ये आक्रमण मुख्यतः लूट और सैन्य दबाव तक सीमित थे, किंतु समय के साथ इनका स्वरूप बदल गया। 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद ग़ोरी की निर्णायक विजय के बाद उत्तर भारत में तुर्की सत्ता का स्थायी विस्तार संभव हुआ। इसके परिणामस्वरूप 1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा दिल्ली सल्तनत की स्थापना की गई। इस प्रकार तुर्की आक्रमण केवल अस्थायी लूट नहीं रहे, बल्कि राजनीतिक सत्ता की स्थापना में परिणत हुए। अतः अभिकथन (A) ऐतिहासिक रूप से सही है।
कारण (R) सही है: तुर्की आक्रमणों के समय उत्तर भारत में राजनीतिक विखंडन की स्थिति विद्यमान थी। विभिन्न राजपूत राज्यों के बीच आपसी संघर्ष चल रहे थे और छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य अपने-अपने हितों की रक्षा में लगे हुए थे। किसी सशक्त केंद्रीय सत्ता का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। पृथ्वीराज चौहान, जयचंद, चंदेल और परमार जैसे शासकों के बीच परस्पर प्रतिद्वंद्विता के कारण किसी भी बाहरी आक्रमण के विरुद्ध एक संयुक्त सैन्य मोर्चा नहीं बन सका। इस राजनीतिक विभाजन ने तुर्की आक्रमणकारियों को लाभ पहुँचाया। अतः कारण (R) भी सही है।
अभिकथन (A) यह बताता है कि तुर्की आक्रमण सफल रहे, जबकि कारण (R) उस सफलता के पीछे निहित एक प्रमुख ऐतिहासिक कारण को स्पष्ट करता है। उत्तर भारत में राजनीतिक एकता के अभाव ने तुर्की आक्रमणकारियों के लिए विजय का मार्ग प्रशस्त किया। इसलिए कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।
- वॉइस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट (वी.ओ.जी.एस.एस.) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- भारत ने हाल ही में अपना दूसरा वॉइस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट सम्पन्न किया है।
- ग्लोबल साउथ मुख्यतः विकसित देशों से संबंधित है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b)
व्याख्या:
कथन 1 सही है।
- वॉइस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट भारत की एक प्रमुख कूटनीतिक पहल है, जिसका उद्देश्य विकासशील देशों की आवाज़ को वैश्विक मंचों पर प्रमुखता से रखना है।
- पहला शिखर सम्मेलन: 12–13 जनवरी 2023 (वर्चुअल), जिसमें एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका सहित अनेक विकासशील देशों की व्यापक भागीदारी रही।
- दूसरा शिखर सम्मेलन: 17 नवंबर 2023 (वर्चुअल), जिसमें पहले सम्मेलन के निष्कर्षों को आगे बढ़ाते हुए विकास, वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा, जलवायु और तकनीक जैसे मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण को सुदृढ़ किया गया।
- यह पहल भारत की सबका साथ, सबका विकास और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबिंबित करती है।
कथन 2 गलत है।
- ग्लोबल साउथ शब्द का प्रयोग विकासशील और कम आय वाले देशों के लिए किया जाता है।
- इसमें मुख्यतः अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, एशिया (भारत सहित), पश्चिम एशिया के कुछ हिस्से और ओशिनिया के विकासशील देश शामिल हैं।
- इसके विपरीत, ग्लोबल नॉर्थ में सामान्यतः उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश आते हैं।
- ग्लोबल साउथ देशों की प्रमुख चुनौतियाँ हैं:
- विकासात्मक असमानताएँ,
- वित्त और तकनीक तक सीमित पहुँच,
- जलवायु परिवर्तन का असमान प्रभाव,
- वैश्विक शासन में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व।
- “कोहिमा शांति स्मारक और इको-पार्क” के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- इसका उद्घाटन कार्यक्रम 8 मार्च, 2024 को कोहिमा में आयोजित किया गया।
- इसे दक्षिण कोरिया द्वारा विकसित किया जाएगा।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (B)
व्याख्या:
कथन 1 सही है: कोहिमा शांति स्मारक का उद्घाटन 8 मार्च, 2024 को नागालैंड की राजधानी कोहिमा में आयोजित किया गया था। यह स्मारक द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1944 में हुए कोहिमा युद्ध में बलिदान देने वाले सैनिकों की स्मृति में स्थापित किया गया है, जिसे एशिया–प्रशांत क्षेत्र में युद्ध का एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। उद्घाटन कार्यक्रम में भारत में जापान के राजदूत, नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। यह पहल भारत और जापान के बीच ऐतिहासिक तथा मैत्रीपूर्ण संबंधों और साझा युद्ध-स्मृति को दर्शाती है।
कथन 2 गलत है: उपलब्ध आधिकारिक और विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार कोहिमा शांति स्मारक का विकास नागालैंड सरकार, जापान सरकार तथा जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी के सहयोग से किया गया है। इस परियोजना में दक्षिण कोरिया की किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष भूमिका का उल्लेख नहीं मिलता है। इसके अतिरिक्त, यदि किसी इको-पार्क से संबंधित दक्षिण कोरिया की भागीदारी की चर्चा की जाती है, तो उसके संबंध में भी कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
- “प्रतिभाशाली प्रारम्भिक पेशेवरों के लिए गतिशीलता व्यवस्था योजना” (MATES), के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- यह भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक द्विपक्षीय ढाँचा है।
- इस योजना में अध्ययन के विशिष्ट क्षेत्रों में ज्ञान और कौशल वाले भारतीय स्नातकों (18 से 30 वर्ष की आयु) को दो वर्ष तक ऑस्ट्रेलिया में रहने और काम करने की पेशकश की जाएगी।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- MATES योजना भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच स्थापित एक द्विपक्षीय गतिशीलता ढाँचा है। इस पहल की घोषणा भारत–ऑस्ट्रेलिया व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते के अंतर्गत की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच कुशल मानव संसाधन के आदान–प्रदान को प्रोत्साहित करना, पेशेवर संपर्कों का विस्तार करना तथा दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को और अधिक सुदृढ़ बनाना है। इसलिए कथन 1 सही है।
- MATES योजना के अंतर्गत 18 से 30 वर्ष आयु वर्ग के योग्य भारतीय स्नातकों और प्रारम्भिक स्तर के पेशेवरों का चयन किया जाएगा। चयनित प्रतिभागियों को दो वर्ष तक ऑस्ट्रेलिया में रहने और कार्य करने का अवसर प्रदान किया जाएगा। यह योजना विशेष रूप से उभरते और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों, जैसे प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, डिजिटल कौशल और नवाचार, में ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव को बढ़ाने पर केंद्रित है। अतः कथन 2 भी सही है।
- परमाणु सुरक्षा पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (ICONS– 2024) के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं ?
- यह सम्मेलन 25 मई, 2024 को आयोजित किया गया था।
- भारत ने हाल ही में परमाणु सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक अन्तर-मंत्रालयी परमाणु तस्कर विरोधी टीम (CNST) का पुनर्गठन किया है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2 3
उत्तर: (c)
व्याख्या:
- परमाणु सुरक्षा पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (आईकॉन–2024) का आयोजन 25 मई, 2024 को नहीं, बल्कि 21 मई, 2024 को वियना, ऑस्ट्रिया में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के मुख्यालय में हुआ था, जिसका मुख्य विषय “Shaping the Future” (भविष्य को आकार देना) था।। यह सम्मेलन अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी द्वारा आयोजित किया गया, जिसका उद्देश्य परमाणु सामग्री और परमाणु सुविधाओं की सुरक्षा को सुदृढ़ करना था। इसके साथ ही सम्मेलन का लक्ष्य परमाणु तस्करी तथा अन्य अवैध गतिविधियों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग को बढ़ाना और सदस्य देशों के बीच सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान–प्रदान सुनिश्चित करना था। तिथि संबंधी त्रुटि के कारण कथन 1 तथ्यात्मक रूप से गलत है।
- भारत ने परमाणु सुरक्षा को और अधिक सुदृढ़ करने के उद्देश्य से काउंटर न्यूक्लियर स्मगलिंग टीम का हाल ही में पुनर्गठन किया है। यह एक अंतर-मंत्रालयी तंत्र है, जिसमें गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, परमाणु ऊर्जा विभाग तथा विभिन्न सुरक्षा और खुफिया एजेंसियाँ शामिल हैं। इस टीम का प्रमुख उद्देश्य परमाणु एवं रेडियोधर्मी सामग्री की अवैध तस्करी को रोकना, सीमा सुरक्षा और निगरानी को मजबूत करना तथा अंतरराष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा मानकों के अनुरूप भारत की तैयारियों को सुदृढ़ करना है। अतः कथन 2 सही है।
128.“पिरूल लाओ पैसे पाओ” अभियान के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- यह जंगल की आग को कम करने और ग्रामीणों को आय प्रदान करने से संबंधित है।
- उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने इस अभियान की शुरुआत की।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: ( a)
व्याख्या:
“पिरुल लाओ – पैसे पाओ“ अभियान उत्तराखंड सरकार द्वारा शुरू किया गया एक पहल है, जिसका उद्देश्य जंगलों में लगी आग को नियंत्रित करने और ग्रामीणों को आर्थिक लाभ प्रदान करने के लिए पिरुल (जंगली पाइंस) को एकत्रित करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
पिरूल, अर्थात चीड़ के पेड़ों की सूखी पत्तियाँ और सुइयाँ, अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं और उत्तराखंड के वनों में वनाग्नि का एक प्रमुख कारण मानी जाती हैं। “पिरूल लाओ–पैसे पाओ” अभियान के अंतर्गत ग्रामीणों को पिरूल एकत्र कर उसे जमा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इससे वनों में ज्वलनशील सामग्री की मात्रा कम होती है और जंगल की आग की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आती है। एकत्रित पिरूल का उपयोग बायो-ब्रिकेट, ऊर्जा उत्पादन तथा अन्य वैकल्पिक ईंधन और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है। इसके बदले ग्रामीणों को प्रत्यक्ष आर्थिक भुगतान किया जाता है, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय का स्रोत प्राप्त होता है। इसलिए कथन 1 सही है।
इस अभियान की शुरुआत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा की गई थी। यह पहल राज्य सरकार की वन संरक्षण, जलवायु अनुकूलन और ग्रामीण आजीविका को सुदृढ़ करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में इसे राज्य स्तर पर लागू किया गया, ताकि स्थानीय समुदायों की भागीदारी आधारित वन प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा सके और पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण विकास को भी सुनिश्चित किया जा सके। अतः कथन 2 भी सही है।
- जस्टिस पार्टी के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- जस्टिस पार्टी ने काँग्रेस का विरोध उसे एक ब्राह्मण प्रभुत्व वाला संगठन कह कर किया।
- इसने गैर-ब्राह्मणों के लिए वैसे ही साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का दावा किया जैसा कि मार्ले-मिंटो सुधार ने मुसलमानों को दिया था।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं ?
(a) केवल 2
(b) केवल 1
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (C )
व्याख्या:
- जस्टिस पार्टी की स्थापना 1916 ईस्वी में मद्रास प्रेसिडेंसी में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य प्रशासन, शिक्षा और राजनीति में गैर-ब्राह्मण वर्गों के हितों की रक्षा करना था। जस्टिस पार्टी का यह मानना था कि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पर ब्राह्मण नेतृत्व और ब्राह्मण हितों का अत्यधिक प्रभुत्व है तथा वह गैर-ब्राह्मण वर्गों की समस्याओं और आकांक्षाओं का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं करती। इसी वैचारिक आधार पर जस्टिस पार्टी ने काँग्रेस का राजनीतिक और वैचारिक विरोध किया। अतः कथन 1 सही है।
- मार्ले–मिंटो सुधार, 1909 के अंतर्गत मुसलमानों को अलग निर्वाचन क्षेत्र के रूप में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया था। जस्टिस पार्टी ने इसी तर्ज़ पर गैर-ब्राह्मण वर्गों के लिए भी सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की माँग की। उसका तर्क था कि यदि मुसलमानों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में विशेष प्रावधान दिए जा सकते हैं, तो सामाजिक और शैक्षिक रूप से वंचित गैर-ब्राह्मण वर्गों को भी समान अधिकार मिलना चाहिए। इस माँग का उद्देश्य प्रशासनिक और राजनीतिक ढाँचे में समान अवसर और प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना था। इसलिए कथन 2 भी सही है।
- वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी का गठन 1927 में हुआ था और इसे अखिल भारतीय संगठन का रूप दिया गया।
- इस पार्टी का उद्देश्य काँग्रेस के अंतर्गत ही काम करना था जिसमें इसको अधिक क्रांतिकारी रुझान वाली पार्टी और आम जनता का संगठन बनाया जा सके।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 2
(b) केवल 1
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
व्याख्या:
कथन 1: वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी का विकास 1925 से 1927 के बीच के कालखंड में अवश्य हुआ, किंतु इसका गठन एक साथ एक अखिल भारतीय संगठन के रूप में नहीं किया गया था। वास्तविकता यह है कि यह पार्टी प्रारंभ में प्रांतीय और क्षेत्रीय इकाइयों के रूप में उभरी, जैसे बंगाल, बंबई, पंजाब और संयुक्त प्रांत। इन सभी इकाइयों के बीच वैचारिक समानता अवश्य थी, परंतु 1927 में न तो इसका कोई स्पष्ट और औपचारिक अखिल भारतीय ढाँचा स्थापित हो पाया और न ही यह पूरे देश में एक एकीकृत संगठन के रूप में स्थिर रह सकी। सरकारी दमन, कम्युनिस्ट मामलों जैसे मेरठ षड्यंत्र केस तथा आंतरिक सीमाओं के कारण इसे अखिल भारतीय स्तर पर संगठित करने के प्रयास सफल नहीं हो पाए। अतः कथन 1 तथ्यात्मक रूप से गलत है।
कथन 2: वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी के नेताओं का यह मानना था कि भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस एक व्यापक जनाधार वाला मंच है और उसके भीतर रहकर ही मजदूरों और किसानों के हितों को प्रभावी रूप से आगे बढ़ाया जा सकता है। पार्टी का उद्देश्य काँग्रेस को अधिक जनोन्मुख, अधिक क्रांतिकारी तथा मजदूर–किसान समर्थक दिशा में ले जाना था। इसी सोच के तहत वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी ने ट्रेड यूनियनों, किसान आंदोलनों और वामपंथी विचारधारा को काँग्रेस की राजनीति से जोड़ने का प्रयास किया। इसलिए कथन 2 सही है।
- निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए :
- ईस्ट इंडिया एसोसिएशन
- नेशनल इंडियन एसोसिएशन
- इंडियन सोसायटी
- इंडियन एसोसिएशन
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 1, 2, 3, 4
(b) 2, 1, 4, 3
(c) 1, 2, 4, 3
(d) 1,3, 2, 4
उत्तर: (a)
व्याख्या:
ईस्ट इंडिया एसोसिएशन — 1866
ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना वर्ष 1866 में दादाभाई नौरोजी द्वारा लंदन में की गई थी। इसका प्रमुख उद्देश्य ब्रिटिश संसद और ब्रिटेन के जनमत को भारतीय समस्याओं से अवगत कराना था। इस संगठन ने भारत के आर्थिक शोषण, विशेषकर संपत्ति के अपवहन के सिद्धांत को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया। इसका ऐतिहासिक महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह पहला संगठन था जिसने भारत के प्रश्न को ब्रिटेन के राजनीतिक मंच पर संगठित और तार्किक ढंग से उठाया।
नेशनल इंडियन एसोसिएशन — 1870
नेशनल इंडियन एसोसिएशन की स्थापना 1870 में लंदन में हुई। इसकी स्थापना में मैरी कारपेंटर की प्रमुख भूमिका रही, जबकि सर सैयद अहमद ख़ान से इसे वैचारिक प्रेरणा मिली। इस संगठन का उद्देश्य भारत और ब्रिटेन के शिक्षित वर्गों के बीच संवाद को बढ़ावा देना तथा भारतीय छात्रों और सामाजिक–राजनीतिक मुद्दों को समर्थन प्रदान करना था। यह संस्था भारत–ब्रिटेन बौद्धिक संपर्क का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनी।
इंडियन सोसायटी — 1867
इंडियन सोसायटी की स्थापना 1867 में लंदन में हुई। यह मुख्यतः भारतीय छात्रों और प्रवासियों का एक बौद्धिक एवं राजनीतिक मंच थी। इसका उद्देश्य भारतीय मामलों पर चर्चा करना और ब्रिटिश समाज में भारत के पक्ष में जनमत तैयार करना था। यद्यपि इसकी स्थापना नेशनल इंडियन एसोसिएशन से पूर्व हुई, फिर भी इसका व्यापक राजनीतिक प्रभाव बाद के वर्षों में उभरा। इसी कारण कालानुक्रमिक दृष्टि से इसे तीसरे स्थान पर रखा जाता है।
इंडियन एसोसिएशन — 1876
इंडियन एसोसिएशन की स्थापना 1876 में कलकत्ता में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस द्वारा की गई। इसका उद्देश्य अखिल भारतीय स्तर पर राजनीतिक चेतना का प्रसार करना था। इस संगठन ने सिविल सेवा परीक्षा में आयु-सीमा, भारतीयों के अधिकारों और प्रशासनिक सुधारों जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। इंडियन एसोसिएशन को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का वैचारिक आधार माना जाता है, इसलिए आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में इसका विशेष स्थान है।
नोट- लोक सेवा आयोग उत्तर प्रदेश ने इस प्रश्न का उत्तर (a) 1, 2, 3, 4 स्वीकार किया है।
- निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए, सबसे पहले से लेकर आखिरी गतिविधि तक:
- शाही भारतीय नौसेना विद्रोह
- कैबिनेट मिशन की घोषणा
- अंतरिम सरकार का गठन
- ब्रिटिश संसदीय प्रतिनिधिमंडल का दिल्ली में आगमन
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 2, 4, 1, 3
(b) 4, 2, 1, 3
(c) 4, 3, 2, 1
(d) 4, 1, 2, 3
उत्तर: (*)
व्याख्या:
ब्रिटिश संसदीय प्रतिनिधिमंडल का भारत आगमन (जनवरी–फरवरी 1946)
जनवरी–फरवरी 1946 के दौरान एक ब्रिटिश संसदीय प्रतिनिधिमंडल भारत आया। यह प्रतिनिधिमंडल गैर-कार्यकारी और अन्वेषणात्मक प्रकृति का था, जिसे भारतीय नेताओं से भेंट कर भारत में स्वतंत्रता से संबंधित राजनीतिक मतों और परिस्थितियों का आकलन करना था। यह मिशन कैबिनेट मिशन नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता प्रक्रिया की दिशा में एक प्रारंभिक राजनीतिक सर्वेक्षण के रूप में कार्य करता था।
शाही भारतीय नौसेना विद्रोह (फरवरी 1946)
18 से 23 फरवरी 1946 के बीच शाही भारतीय नौसेना के भारतीय नाविकों द्वारा बंबई, कराची, मद्रास सहित कई बंदरगाहों पर सशस्त्र विद्रोह किया गया। इस विद्रोह ने ब्रिटिश शासन की सैन्य नींव को गहरा आघात पहुँचाया। इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को यह स्पष्ट संकेत दिया कि अब भारत पर बलपूर्वक शासन बनाए रखना संभव नहीं है।
कैबिनेट मिशन की घोषणा एवं आगमन (फरवरी–मार्च 1946)
फरवरी 1946 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने कैबिनेट मिशन की घोषणा की। इस मिशन में लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, स्टैफोर्ड क्रिप्स और ए. वी. अलेक्ज़ेंडर शामिल थे। मिशन मार्च 1946 में भारत पहुँचा और 16 मई 1946 को कैबिनेट मिशन योजना की घोषणा की गई। यह भारत में सत्ता हस्तांतरण के लिए ब्रिटिश सरकार का अंतिम संवैधानिक प्रयास था और विभाजन से पहले भारत के लिए प्रस्तावित अंतिम संघीय ढाँचा भी इसी के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया।
अंतरिम सरकार का गठन (2 सितंबर 1946)
2 सितंबर 1946 को अंतरिम सरकार का गठन किया गया, जिसका नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू ने किया। इस सरकार के गठन के साथ वायसराय की कार्यकारी परिषद का भारतीयकरण हुआ और पहली बार वास्तविक शासन भारतीय नेताओं के हाथों में आया। यह व्यवस्था 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति की प्रत्यक्ष तैयारी थी।
नोट- लोक सेवा आयोग उत्तर प्रदेश ने इस प्रश्न का उत्तर (c) 4, 3, 2, 1 स्वीकार किया है।
- अनुच्छेद 19 के अंतर्गत निम्नलिखित में से कौन-सी एक स्वतंत्रता की भारतीय संविधान द्वारा गारंटी नहीं दी गई है?
(a) किसी व्यापार अथवा व्यवसाय को करने की स्वतंत्रता
(b) पूरे देश में इच्छानुसार घूमने-फिरने की स्वतंत्रता
(c) शांतिपूर्वक तथा बिना शस्त्रों के एकत्र होने की स्वतंत्रता
(d) सम्पत्ति रखने, खरीदने और बेचने की स्वतंत्रता
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- अनुच्छेद 19 : संरचना और उद्देश्य: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1) नागरिकों को कुछ मूलभूत लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएँ प्रदान करता है। ये स्वतंत्रताएँ व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास, राजनीतिक सहभागिता, आर्थिक गतिविधियों तथा सामाजिक संगठन के लिए अनिवार्य मानी जाती हैं। अनुच्छेद 19 का उद्देश्य नागरिकों को एक सक्रिय, स्वतंत्र और जिम्मेदार लोकतांत्रिक जीवन जीने में सक्षम बनाना है।
- अनुच्छेद 19(1) के अंतर्गत वर्तमान में गारंटीकृत स्वतंत्रताएँ: वर्तमान में अनुच्छेद 19(1) के अंतर्गत छह स्वतंत्रताएँ सुनिश्चित की गई हैं। इनमें वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्वक और बिना शस्त्रों के एकत्र होने की स्वतंत्रता, संघ या सहकारी समितियाँ बनाने की स्वतंत्रता, भारत के संपूर्ण क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से आवागमन की स्वतंत्रता, भारत के किसी भी भाग में निवास और बसने की स्वतंत्रता तथा व्यापार, व्यवसाय या पेशा करने की स्वतंत्रता शामिल हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि संपत्ति का अधिकार अब अनुच्छेद 19 के अंतर्गत सम्मिलित नहीं है।
- संपत्ति के अधिकार की प्रारंभिक संवैधानिक स्थिति (1950): संविधान के प्रारंभिक स्वरूप में संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार था। अनुच्छेद 19(1)(f) नागरिकों को संपत्ति रखने, प्राप्त करने और उसका निपटान करने की स्वतंत्रता प्रदान करता था, जबकि अनुच्छेद 31 राज्य द्वारा संपत्ति अधिग्रहण से संबंधित शर्तों को निर्धारित करता था। इस प्रकार संपत्ति का अधिकार मूल अधिकारों का एक अभिन्न हिस्सा था। संपत्ति के मौलिक अधिकार के कारण भूमि सुधार कानूनों, जमींदारी उन्मूलन तथा सामाजिक-आर्थिक समानता से जुड़े सरकारी प्रयासों को बार-बार न्यायिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इससे राज्य की कल्याणकारी नीतियों के क्रियान्वयन में गंभीर बाधाएँ उत्पन्न हुईं और विधायिका तथा न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति बनी। इन व्यावहारिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 को हटा दिया गया। इसके स्थान पर नया अनुच्छेद 300A जोड़ा गया, जिसमें यह प्रावधान किया गया कि किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से विधि द्वारा प्राधिकृत किए बिना वंचित नहीं किया जाएगा। इस संशोधन के बाद संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार न रहकर एक कानूनी या संवैधानिक अधिकार बन गया।
- मौलिक अधिकार और कानूनी अधिकार में अंतर: मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद 32 के अंतर्गत जा सकते हैं, जबकि कानूनी अधिकारों के लिए सामान्यतः उच्च न्यायालय का सहारा लिया जाता है। मौलिक अधिकारों को उच्चतम संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होता है और उनका संशोधन कठिन होता है, जबकि कानूनी अधिकार विधायिका के अधीन होते हैं और अपेक्षाकृत सरलता से बदले जा सकते हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय की पुष्टि: सर्वोच्च न्यायालय ने जिलुभाई ननभाई खाचर बनाम गुजरात राज्य (1995) मामले में स्पष्ट किया कि संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि एक वैधानिक अधिकार है। यह निर्णय संपत्ति के अधिकार की वर्तमान संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है।
134.नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): भारतीय संविधान के अनुसार, एक ही व्यक्ति एक ही समय में दो अथवा दो से अधिक राज्यों के राज्यपाल के पद पर कार्य नहीं कर सकता।
कारण (R) : भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 में यह कहा गया है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 153 यह प्रावधान करता है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा, परंतु यह कहीं भी यह निषेध नहीं करता कि एक ही व्यक्ति एक समय में दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल नहीं हो सकता। अतः यह कहना कि संविधान इसकी अनुमति नहीं देता, तथ्यात्मक रूप से गलत है।
- कारण के रूप में दिया गया कथन कि अनुच्छेद 153 में यह कहा गया है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा, पूर्णतः सही है। अनुच्छेद 153 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक राज्य में राज्यपाल का पद अनिवार्य रूप से विद्यमान रहे, ताकि राज्य की संवैधानिक व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित हो सके। इस अनुच्छेद में यह नहीं कहा गया है कि प्रत्येक राज्य के लिए राज्यपाल का पद किसी भिन्न-भिन्न व्यक्ति द्वारा ही भरा जाएगा। अतः यह प्रावधान पद की अनिवार्यता को दर्शाता है, न कि व्यक्ति की संख्या को सीमित करता है।
- 7वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 के बाद प्रशासनिक सुविधा के लिए एक व्यक्ति को एक से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त करने की व्यवस्था स्वीकार की गई। व्यवहार में भी कई उदाहरण मिलते हैं, जहाँ एक ही व्यक्ति ने एक से अधिक राज्यों अथवा राज्य और केंद्रशासित प्रदेश का अतिरिक्त प्रभार संभाला है। व्यवहारिक स्तर पर भी भारतीय संवैधानिक परंपरा इस तथ्य की पुष्टि करती है। स्वतंत्रता के बाद कई अवसरों पर एक ही व्यक्ति को एक से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। उदाहरण के रूप में, 1947 में सी. राजगोपालाचारी ने मद्रास और पश्चिम बंगाल—दोनों राज्यों के राज्यपाल के रूप में कार्य किया। हाल के वर्षों में भी अनेक राज्यपालों को दो राज्यों का अथवा किसी राज्य के साथ किसी केंद्रशासित प्रदेश का अतिरिक्त प्रभार सौंपा जाता रहा है।
- इसलिए अभिकथन (A) गलत है, जबकि कारण (R) सही है।
- निम्नलिखित में से कौन-से जोड़े का मिलान सही नहीं है?
(a) किसी राज्य का नाम बदलना – राज्य विधान-मंडल की शक्तियाँ
(b) किसी नए राज्य की स्थापना करना – संसद की शक्ति
(c) विधि के समक्ष समानता – नागरिकों एवं गैर-नागरिकों दोनों के लिए सुनिश्चित की
गई है
(d) लोक सेवाओं में अवसर की समानता – केवल भारत के नागरिकों के लिए सुनिश्चित है
उत्तर : (a)
व्याख्या:
- (a) किसी राज्य का नाम बदलना — राज्य विधान-मंडल की शक्तियाँ — गलत
यह सुमेलन संवैधानिक रूप से गलत है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के अनुसार किसी राज्य का नाम परिवर्तित करने की शक्ति संसद को प्राप्त है, न कि राज्य विधान-मंडल को। अनुच्छेद 3 संसद को नए राज्य के गठन, किसी राज्य के क्षेत्र को घटाने या बढ़ाने, उसकी सीमाओं में परिवर्तन करने तथा उसके नाम में परिवर्तन करने का अधिकार देता है। इस प्रक्रिया में राज्य विधान-मंडल की भूमिका केवल परामर्शात्मक होती है और उसकी सहमति अनिवार्य नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने बाबूलाल पराते बनाम बॉम्बे राज्य (1960) मामले में भी यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद को पूर्ण शक्ति प्राप्त है। अतः विकल्प (a) गलत सुमेलित है।
- (b) किसी नए राज्य की स्थापना — संसद की शक्ति — सही
किसी नए राज्य की स्थापना, किसी राज्य का विभाजन या राज्यों का विलय करना संसद की शक्ति के अंतर्गत आता है। यह अधिकार भी अनुच्छेद 3 द्वारा संसद को प्रदान किया गया है। तेलंगाना का गठन वर्ष 2014 में तथा वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड का गठन इसी संवैधानिक प्रावधान के अंतर्गत किया गया। इसलिए यह सुमेलन पूर्णतः सही है।
- (c) विधि के समक्ष समानता — नागरिकों एवं गैर-नागरिकों दोनों के लिए — सही
अनुच्छेद 14 के अनुसार राज्य भारत के राज्यक्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। यहाँ “व्यक्ति” शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसमें नागरिक और विदेशी दोनों सम्मिलित होते हैं। इस प्रकार अनुच्छेद 14 किसी नागरिक-विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वभौमिक समानता के सिद्धांत को व्यक्त करता है। इसलिए यह सुमेलन भी सही है।
- (d) लोक सेवाओं में अवसर की समानता — केवल भारत के नागरिकों के लिए — सही
लोक सेवाओं में अवसर की समानता का प्रावधान अनुच्छेद 16 के अंतर्गत किया गया है। अनुच्छेद 16(1) और 16(2) सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर सुनिश्चित करते हैं, जबकि अनुच्छेद 16(3) संसद को यह अधिकार देता है कि वह नागरिकता के आधार पर पात्रता निर्धारित कर सके। व्यवहार में सरकारी सेवाएँ केवल भारतीय नागरिकों के लिए आरक्षित होती हैं और विदेशी नागरिकों को अनुच्छेद 16 का लाभ प्राप्त नहीं होता। इसलिए यह सुमेलन भी संवैधानिक रूप से सही है।
136.सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-Ⅰ सूची ⅠⅠ
- भारत की संचित निधि – 1. अनुच्छेद 266
- वित्त आयोग – 2. अनुच्छेद 360
- वित्तीय आपातकाल – 3. अनुच्छेद 280
- भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक – 4. अनुच्छेद 148
कूट:
A B C D
(a) 1 2 3 4
(b) 1 3 2 4
(c) 3 1 2 4
(d) 4 1 3 2
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- भारत की समेकित निधि → 1. अनुच्छेद 266
भारत की समेकित निधि का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 266 में निहित है। अनुच्छेद 266(1) भारत की समेकित निधि तथा अनुच्छेद 266(2) राज्यों की समेकित निधि से संबंधित है। केंद्र सरकार की समस्त आय—जैसे कर, शुल्क, ऋण तथा प्राप्त अनुदान—इसी निधि में जमा किए जाते हैं। इस निधि से कोई भी व्यय संसद की पूर्व स्वीकृति के बिना नहीं किया जा सकता, जो अनुदान और विनियोग अधिनियम के माध्यम से दी जाती है। इस प्रकार, यह भारत की सबसे प्रमुख और सर्वोच्च सरकारी निधि मानी जाती है।
- वित्त आयोग → 3. अनुच्छेद 280
वित्त आयोग का गठन अनुच्छेद 280 के अंतर्गत किया जाता है। यह एक संवैधानिक निकाय है, न कि वैधानिक संस्था। इसका मुख्य कार्य केंद्र और राज्यों के बीच करों के बँटवारे की सिफारिश करना तथा राज्यों को दिए जाने वाले अनुदानों के संबंध में सुझाव देना है। इसके माध्यम से देश में वित्तीय संघवाद को सुदृढ़ किया जाता है। संविधान के अनुसार वित्त आयोग का गठन प्रत्येक पाँच वर्ष में या आवश्यकता पड़ने पर उससे पहले भी किया जा सकता है।
- वित्तीय आपातकाल → 2. अनुच्छेद 360
वित्तीय आपातकाल का प्रावधान अनुच्छेद 360 में किया गया है। इसे तब घोषित किया जा सकता है जब राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए कि भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता अथवा साख संकट में है। वित्तीय आपातकाल लागू होने पर केंद्र सरकार को राज्यों के वित्तीय मामलों पर व्यापक नियंत्रण प्राप्त हो जाता है। इस स्थिति में सरकारी कर्मचारियों के वेतन में कटौती की जा सकती है तथा राज्यों को वित्तीय निर्देश जारी किए जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि अब तक भारत में कभी भी वित्तीय आपातकाल घोषित नहीं किया गया है।
- भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक → 4. अनुच्छेद 148
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 148 में है, जो उनकी नियुक्ति और पद से संबंधित है। CAG को भारत की लोक-धन व्यवस्था का प्रहरी कहा जाता है। उनका प्रमुख कार्य केंद्र और राज्य सरकारों के खातों की लेखा-परीक्षा करना तथा वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। वे अपने प्रतिवेदन संसद और राज्य विधानसभाओं के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, जिससे विधायिका और कार्यपालिका के बीच वित्तीय उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता बनी रहती है।
- भारतीय संविधान में शोषण के विरुद्ध अधिकार के अन्तर्गत निम्नलिखित में से किसकी परिकल्पना की गई है?
- अस्पृश्यता का अन्त
- मानव देह व्यापार और बलात् श्रम का निषेध
- कारखानों और खदानों में बच्चों की मजदूरी का निषेध
- अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 1 और 4
(b) 1 और 2
(c) 2 और 3
(d) 3 और 4
उत्तर: (c)
व्याख्या:
- भारतीय संविधान में शोषण के विरुद्ध अधिकार का प्रावधान मुख्यतः अनुच्छेद 23 और 24 के अंतर्गत किया गया है। इन अनुच्छेदों का उद्देश्य मानव गरिमा की रक्षा करना और बलपूर्वक या अमानवीय परिस्थितियों में कार्य कराने जैसी प्रथाओं को समाप्त करना है। यह अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
- अनुच्छेद 23 का दायरा: अनुच्छेद 23 मानव तस्करी, बेगार (बलात् श्रम) और शोषण के अन्य समान रूपों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है। इसके अंतर्गत देह व्यापार, बंधुआ मजदूरी और जबरन काम कराना असंवैधानिक घोषित किया गया है। यह प्रावधान सामाजिक-आर्थिक शोषण को समाप्त करने के उद्देश्य से जोड़ा गया है।
- अनुच्छेद 24 का दायरा: अनुच्छेद 24 बच्चों के संरक्षण से संबंधित है। इसके अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खदानों या किसी अन्य खतरनाक रोजगार में नियोजित करना पूर्णतः निषिद्ध है। यह बाल श्रम और बाल शोषण को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है।
- कथन 1: अस्पृश्यता का अन्त: अस्पृश्यता के अंत का प्रावधान अनुच्छेद 17 में किया गया है, जो समानता के अधिकार का हिस्सा है। इसका उद्देश्य सामाजिक भेदभाव को समाप्त करना है, न कि शोषण के विरुद्ध अधिकार को परिभाषित करना। इसलिए यह कथन इस अधिकार से संबंधित नहीं है।
- कथन 2: मानव देह व्यापार और बलात् श्रम का निषेध: मानव तस्करी, देह व्यापार और बलात् श्रम का निषेध अनुच्छेद 23 के अंतर्गत आता है। यह शोषण के विरुद्ध अधिकार का मूल और केंद्रीय तत्व है। अतः यह कथन सही है।
- कथन 3: कारखानों और खदानों में बच्चों की मजदूरी का निषेध: बच्चों को खतरनाक रोजगारों में नियोजित करने का निषेध अनुच्छेद 24 में निहित है। यह प्रावधान शोषण के विरुद्ध अधिकार का अभिन्न अंग है और बाल संरक्षण की संवैधानिक गारंटी देता है। इसलिए यह कथन भी सही है।
- कथन 4: अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा: अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत आती है, जो सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों से संबंधित हैं। इसका शोषण के विरुद्ध अधिकार से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। अतः यह कथन गलत है।
- आर्थिक सर्वेक्षण, 2022 – 23 के अनुसार, बढ़ते वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के जवाब में भारत सरकार ने कौन-सी राजकोषीय नीति की प्रतिक्रिया अपनाई
- खाद्य और उर्वरक सब्सिडी में कमी करना
- ईधन और आयातित उत्पादों पर कर बढ़ाना
- ईधन और कुछ आयातित उत्पादों पर कर कम करना
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) केवल 2
(b) केवल 3
(c) केवल 1
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर: (b)
व्याख्या:
वर्ष 2021–23 के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था गंभीर चुनौतियों से जूझ रही थी। आपूर्ति शृंखला में व्यवधान, कच्चे तेल और ऊर्जा कीमतों में तीव्र वृद्धि, तथा खाद्य तेल, उर्वरक और अनाज की वैश्विक कमी ने अनेक देशों के सामने मुद्रास्फीति और खाद्य सुरक्षा की समस्या खड़ी कर दी। इस संदर्भ में भारत सरकार के लिए मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना और गरीब एवं कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रमुख नीति-लक्ष्य बने।
कथन 1: खाद्य और उर्वरक सब्सिडी में कमी करना: यह कथन सही नहीं है। आर्थिक सर्वेक्षण 2022–23 के अनुसार सरकार ने खाद्य और उर्वरक सब्सिडी में कटौती नहीं की, बल्कि वैश्विक संकट के दौरान इन्हें बनाए रखा। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत लगभग 81.4 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया गया। इसी प्रकार, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि के बावजूद किसानों को संरक्षण देने के लिए उर्वरक सब्सिडी जारी रखी गई। अतः यह कथन गलत है।
कथन 2: ईंधन और आयातित उत्पादों पर कर बढ़ाना: यह कथन भी आर्थिक सर्वेक्षण के अनुरूप नहीं है। सरकार ने इस अवधि में कर बढ़ाने की नीति नहीं अपनाई, क्योंकि ऐसा करने से घरेलू मुद्रास्फीति और बढ़ती तथा उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ता। सर्वेक्षण में स्पष्ट किया गया है कि कर-वृद्धि के बजाय कर-राहत के उपायों पर बल दिया गया। इसलिए यह कथन भी गलत है।
कथन 3: ईंधन और कुछ आयातित उत्पादों पर कर कम करना: यह कथन आर्थिक सर्वेक्षण 2022–23 के अनुसार पूर्णतः सही है। सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में कटौती की तथा निर्यात शुल्क में चरणबद्ध कमी की। इसके अतिरिक्त, खाद्य तेलों और कच्चे इनपुट्स—जैसे कच्चा एवं परिष्कृत पाम तेल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल—पर आयात शुल्क घटाया गया तथा कपास आयात पर सीमा शुल्क में छूट दी गई। घरेलू आपूर्ति बनाए रखने के लिए गेहूँ उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध और चावल के निर्यात पर शुल्क लगाया गया। इन उपायों का उद्देश्य मुद्रास्फीति नियंत्रण, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना और उपभोक्ताओं व किसानों दोनों को राहत देना था।
- सूची-Ⅰ को सूची-ⅠⅠ से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-Ⅰ सूची ⅠⅠ
(सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम) (हिताधिकारी/लाभार्थी का योगदान)
- प्रधानमंत्री श्रम योगी मान–धन योजना – 1. हिताधिकारी/लाभार्थी की इच्छानुसार
- प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना – 2. ₹55-₹200 प्रति माह
- प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना – 3. ₹436 प्रति वर्ष
- अटल पेंशन योजना – 4. ₹20 प्रति वर्ष
कूट :
A B C D
(a) 3 2 1 4
(b) 1 2 3 4
(c) 2 3 4 1
(d) 2 4 1 3
उत्तर: (c)
व्याख्या:
(A) प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन योजना
प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन योजना वर्ष 2019 में आरम्भ की गई। यह असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए एक स्वैच्छिक एवं अंशदायी पेंशन योजना है। इसमें लाभार्थी का मासिक अंशदान उसकी प्रवेश आयु पर निर्भर करता है, जो ₹55 से ₹200 प्रति माह के बीच होता है। 60 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद योजना के अंतर्गत ₹3000 प्रति माह की सुनिश्चित पेंशन प्रदान की जाती है। इसलिए प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन योजना का सही सुमेलन ₹55–₹200 प्रति माह से है।
(B) प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना
प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना वर्ष 2015 में प्रारम्भ की गई थी। यह एक जीवन बीमा योजना है, जिसके अंतर्गत किसी भी कारण से मृत्यु होने पर ₹2 लाख का बीमा कवर प्रदान किया जाता है। इस योजना के लिए लाभार्थी को ₹436 प्रति वर्ष का प्रीमियम देना होता है, जो बैंक खाते से स्वतः कट जाता है। अतः प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना का सही सुमेलन ₹436 प्रति वर्ष है।
(C) प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना
प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना भी वर्ष 2015 में शुरू की गई थी और यह एक दुर्घटना बीमा योजना है। इसके अंतर्गत दुर्घटना में मृत्यु या पूर्ण विकलांगता की स्थिति में ₹2 लाख तथा आंशिक विकलांगता की स्थिति में ₹1 लाख की बीमा राशि दी जाती है। इस योजना का वार्षिक प्रीमियम मात्र ₹20 है। इसलिए प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना का सही सुमेलन ₹20 प्रति वर्ष है।
(D) अटल पेंशन योजना
अटल पेंशन योजना वर्ष 2015 में आरम्भ की गई और यह मुख्यतः असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए एक दीर्घकालिक पेंशन योजना है। इसमें लाभार्थी अपनी पसंद के अनुसार ₹1000 से ₹5000 प्रति माह तक की पेंशन चुन सकता है। अंशदान की राशि चुनी गई पेंशन और प्रवेश आयु (18–40 वर्ष) पर निर्भर करती है। इसलिए इसमें अंशदान की कोई निश्चित राशि नहीं होती, बल्कि यह हिताधिकारी की इच्छानुसार निर्धारित होती है।
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A): विकास को जीवन स्तर और कल्याण में वृद्धि के रूप में परिभाषित किया जाता है।
कारण (R) : प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि विकास की पर्याप्त माप नहीं है।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: (c)
व्याख्या:
- अभिकथन (A) यह स्पष्ट करता है कि विकास को जीवन स्तर और समग्र कल्याण में वृद्धि के रूप में समझा जाना चाहिए। आधुनिक अर्थशास्त्र में विकास को केवल सकल घरेलू उत्पाद या राष्ट्रीय आय की वृद्धि तक सीमित नहीं माना जाता। विकास का वास्तविक अर्थ बेहतर जीवन स्तर, स्वास्थ्य और पोषण की उपलब्धता, शिक्षा के अवसर, सामाजिक सुरक्षा, मानवीय गरिमा तथा अवसरों की समानता से जुड़ा हुआ है। इसी कारण विकास को एक बहुआयामी प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, जिसे संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और मानव विकास दृष्टिकोण, विशेषकर अमर्त्य सेन के क्षमता दृष्टिकोण द्वारा स्पष्ट किया गया है। अतः अभिकथन (A) सही है।
- कारण (R) में कहा गया है कि प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि विकास की पर्याप्त माप नहीं है। यह कथन भी सही है, क्योंकि प्रति व्यक्ति आय केवल औसत आय को दर्शाती है और आय के वितरण में मौजूद असमानताओं को नहीं दिखाती। इसके अतिरिक्त, यह यह भी स्पष्ट नहीं करती कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, सामाजिक सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता जैसी आवश्यक सुविधाएँ कितनी सुलभ हैं। कई बार दो देशों की प्रति व्यक्ति आय समान हो सकती है, परंतु एक देश में मानव विकास के संकेतक बेहतर हों और दूसरे में गरीबी, कुपोषण तथा असमानता अधिक हो।
- चूँकि प्रति व्यक्ति आय विकास का पूर्ण और पर्याप्त संकेतक नहीं है, इसलिए विकास को केवल आय-वृद्धि के बजाय जीवन स्तर और मानव कल्याण के व्यापक संदर्भ में परिभाषित किया जाता है। इसी आधार पर विकास की बहुआयामी अवधारणा सामने आती है। इस प्रकार कारण (R), अभिकथन (A) की तार्किक और सैद्धांतिक रूप से सही व्याख्या करता है।
- निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए तथा इन्हें सही कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए, सबसे पहले से लेकर आखिरी गतिविधि तक :
- प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना
- ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम
- प्रधानमंत्री रोजगार योजना
- वाल्मीकि अंबेडकर आवास योजना
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:
(a) 3, 2, 1,4
(b) 1, 2, 3, 4
(c) 2, 3, 4, 1
(d) 4, 2, 1, 3
उत्तर: (a)
व्याख्या:
- प्रधानमंत्री रोजगार योजना — 1993
प्रधानमंत्री रोजगार योजना की शुरुआत वर्ष 1993 में पी. वी. नरसिंह राव सरकार के दौरान की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के शिक्षित बेरोज़गार युवाओं को स्वरोज़गार के लिए प्रोत्साहित करना था। यह योजना बैंक ऋण और सरकारी सब्सिडी के संयोजन पर आधारित थी। 1990 के दशक के उदारीकरण काल में यह रोज़गार सृजन की पहली प्रमुख सरकारी पहल मानी जाती है।
- ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम — 1995
ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 1995 में हुई। इसे खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग द्वारा कार्यान्वित किया गया। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में लघु एवं कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर गैर-कृषि रोजगार के अवसर सृजित करना था। यह योजना प्रधानमंत्री रोजगार योजना के बाद ग्रामीण-केंद्रित रोजगार नीति के रूप में सामने आई।
- प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना — 2000
प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना का शुभारंभ वर्ष 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा किया गया। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना था। इस योजना के अंतर्गत प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य, पेयजल, आवास और पोषण जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया। यह योजना केवल रोज़गार तक सीमित न होकर समग्र ग्रामीण विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी।
- वाल्मीकि अंबेडकर आवास योजना — 2001
वाल्मीकि अंबेडकर आवास योजना की शुरुआत वर्ष 2001 में की गई। इसका मुख्य उद्देश्य शहरी गरीबों, विशेषकर झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले वंचित वर्गों को आवास सुविधा प्रदान करना था। सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों पर केंद्रित यह योजना आगे चलकर जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन जैसी शहरी विकास योजनाओं की पृष्ठभूमि बनी।
- भारत के संविधान में निम्नलिखित में से क्या कथित है/हैं?
- राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होगा।
- संसद राष्ट्रपति और दोनों सदनों से मिलकर बनेगी।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) केवल 1
(b) न तो 1 और न ही 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) केवल 2
उत्तर: (c )
व्याख्या:
- कथन 1 में कहा गया है कि राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होगा। यह कथन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 59(1) पर आधारित है, जो स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था करता है कि राष्ट्रपति न तो संसद के किसी सदन का सदस्य हो सकता है और न ही किसी राज्य के विधानमंडल का। यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित होने से पहले लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य होता है, तो राष्ट्रपति पद ग्रहण करते ही उसका संसदीय सदस्यत्व स्वतः समाप्त हो जाता है। इसका उद्देश्य राष्ट्रपति को राजनीतिक निष्पक्षता और संवैधानिक तटस्थता प्रदान करना है। अतः कथन 1 सही है।
- कथन 2 में कहा गया है कि संसद राष्ट्रपति और दोनों सदनों से मिलकर बनेगी। यह कथन अनुच्छेद 79 पर आधारित है, जिसके अनुसार संसद में राष्ट्रपति तथा दो सदन—लोकसभा और राज्यसभा—शामिल होते हैं। राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग होता है और विधेयकों पर स्वीकृति देना, संसद का अधिवेशन आहूत करना, सत्रावसान करना तथा लोकसभा का विघटन जैसी महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिकाएँ निभाता है। हालांकि राष्ट्रपति संसद का सदस्य नहीं होता, फिर भी वह संसद का अविभाज्य घटक है। इसलिए कथन 2 भी सही है।
143.निम्नलिखित कथन पर विचार कीजिए :
भारतीय संविधान में कोई संशोधन लाने का उपक्रम किया जा सकता है :
- लोक सभा द्वारा
- राज्य सभा द्वारा
- राज्य विधान-मंडलों द्वारा
- भारत के राष्ट्रपति द्वारा
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) 2, 3 और 4
(b) केवल 1
(c) 1, 2 और 3
(d) 1 और 2
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368(2) में यह स्पष्ट रूप से प्रावधान किया गया है कि संविधान में संशोधन के लिए विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसका आशय यह है कि संविधान संशोधन की पहल केवल संसद के भीतर ही संभव है और यह लोकसभा या राज्यसभा—किसी भी सदन से हो सकती है।
- कथन 1: लोकसभा द्वारा: लोकसभा संसद का एक सदन है और अनुच्छेद 368 के अंतर्गत उसे संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। इतिहास में अनेक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन—जैसे 42वाँ, 44वाँ, 73वाँ और 74वाँ संशोधन—लोकसभा में ही प्रस्तुत किए गए थे। इसलिए यह कथन सही है।
- कथन 2: राज्यसभा द्वारा: राज्यसभा भी संसद का ही सदन है और संविधान संशोधन की प्रक्रिया में उसे लोकसभा के समान अधिकार प्राप्त हैं। अनुच्छेद 368 में दोनों सदनों के बीच कोई भेद नहीं किया गया है। अतः राज्यसभा में भी संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया जा सकता है। इस प्रकार यह कथन भी सही है।
- कथन 3: राज्य विधान-मंडलों द्वारा: राज्य विधानसभाएँ संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत नहीं कर सकतीं। उनकी भूमिका केवल कुछ विशेष संशोधनों के अनुमोदन तक सीमित होती है, विशेषकर वे संशोधन जो संघीय ढाँचे से संबंधित होते हैं, जैसे केंद्र–राज्य संबंध या न्यायपालिका से जुड़े प्रावधान। पहल और अनुमोदन दो भिन्न प्रक्रियाएँ हैं, और पहल का अधिकार केवल संसद को है। इसलिए यह कथन गलत है।
- कथन 4: भारत के राष्ट्रपति द्वारा: भारत के राष्ट्रपति को संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत करने का कोई अधिकार नहीं है। उनकी भूमिका संसद द्वारा पारित संशोधन विधेयक पर अनुच्छेद 111 के अंतर्गत स्वीकृति देने तक सीमित है। राष्ट्रपति को इस प्रकार के विधेयक पर न तो वीटो का अधिकार है और न ही उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेजने का। अतः यह कथन भी गलत है।
- भारत के निर्वाचन आयुक्त के निम्नलिखित में से कौन-से कार्य हैं?
- लोक सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष तथा राज्य सभा के उपसभापति के पदों के लिए निर्वाचन करवाना।
- नगर पालिकाओं और नगर निगमों के लिए निर्वाचन करवाना ।
- उपर्युक्त निर्वाचन से उत्पन्न सभी संदेहों और विवादों का निर्णयन।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) 1 और 3
(b) 2 और 3
(c) 1 और 2
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर: (d)
व्याख्या:
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण भारत के निर्वाचन आयोग को सौंपता है। निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त शामिल होते हैं। इसका दायरा केवल उन चुनावों तक सीमित है जिनका उल्लेख संविधान में स्पष्ट रूप से किया गया है।
- लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष तथा राज्यसभा उपसभापति के पदों के लिए निर्वाचन कराना निर्वाचन आयोग का कार्य नहीं है। इन पदों का चुनाव संबंधित सदनों के सदस्य स्वयं करते हैं। ये चुनाव संसद की आंतरिक प्रक्रियाओं के अंतर्गत आते हैं और इन पर अनुच्छेद 122 के तहत न्यायालयी हस्तक्षेप भी सीमित है। अतः निर्वाचन आयोग की इन चुनावों में कोई भूमिका नहीं होती, इसलिए कथन 1 गलत है।
- नगरपालिकाओं और नगर निगमों के चुनाव भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा नहीं कराए जाते। ये चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा संपन्न कराए जाते हैं। संविधान के अनुच्छेद 243K पंचायती राज संस्थाओं और अनुच्छेद 243ZA नगर निकायों के लिए स्वतंत्र राज्य निर्वाचन आयोग की व्यवस्था करते हैं। इस प्रकार, नगर निकाय चुनाव भारत के निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते, इसलिए कथन 2 भी गलत है।
- चुनावों से उत्पन्न संदेहों और विवादों का निर्णयन निर्वाचन आयोग द्वारा नहीं, बल्कि न्यायालयों द्वारा किया जाता है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों से संबंधित विवादों के लिए चुनाव याचिकाएँ उच्च न्यायालय में दायर की जाती हैं, जैसा कि अनुच्छेद 329 में प्रावधान है। स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़े विवाद संबंधित राज्य कानूनों और न्यायालयों के अंतर्गत आते हैं। निर्वाचन आयोग की भूमिका चुनावों के संचालन तक सीमित है, न कि न्यायिक निर्णय देने तक। अतः कथन 3 भी गलत है।
- निम्नलिखित में से कौन सा एक सही सुमेलित नहीं है?
(a) अशोक मेहता समिति –पंचायती राज संस्थाएँ
(b) सन्थानम समिति –पंचायती राज वित्त
(c) जी.वी.के. राव समिति– प्रखंड स्तर पर नियोजन
(d) दंतवाला समिति –ग्रामीण ऋण
उत्तर: (b)
व्याख्या:
| विकल्प | समिति का नाम | गठन वर्ष / संदर्भ | संबंधित क्षेत्र | प्रमुख उद्देश्य / सिफारिशें | सुमेलन की स्थिति |
| (a) | अशोक मेहता समिति | 1977 (जनता सरकार) | पंचायती राज संस्थाएँ | • पंचायती राज व्यवस्था की समीक्षा • द्वि-स्तरीय ढाँचे (जिला व मंडल) की सिफारिश • जिला को प्रमुख प्रशासनिक इकाई बनाना • राजनीतिक दलों की भागीदारी | सही |
| (b) | सन्थानम समिति | 1962 | भ्रष्टाचार निरोध | • सार्वजनिक प्रशासन में भ्रष्टाचार की जाँच • सतर्कता तंत्र को सुदृढ़ करना • केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की स्थापना की सिफारिश | गलत (पंचायती राज वित्त से असंबंधित) |
| (c) | जी. वी. के. राव समिति | 1985 | प्रखंड / जिला स्तर पर नियोजन | • पंचायती राज संस्थाओं को पुनर्जीवित करना • जिला को नियोजन की मूल इकाई बनाना • जिला परिषद को विकास का केंद्र बनाना • नियमित पंचायत चुनाव | सही |
| (d) | दंतवाला समिति | 1971 | ग्रामीण ऋण एवं कृषि वित्त | • ग्रामीण गरीबों को संस्थागत ऋण उपलब्ध कराना • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) के गठन का समर्थन • ग्रामीण विकास में ऋण की भूमिका पर बल | सही |
- निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही सुमेलित नहीं है?
(a) अनुच्छेद 156 – राज्यपाल की पदावधि (टर्म)
(b) अनुच्छेद 155 – राज्यपाल को हटाना
(c) अनुच्छेद 153 – राज्यपाल का पद
(d) अनुच्छेद 154 – राज्यपाल का कार्यकारी प्राधिकार
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- (a) अनुच्छेद 156 : अनुच्छेद 156 राज्यपाल की पदावधि से संबंधित है। इसके अनुसार राज्यपाल सामान्यतः पाँच वर्ष के लिए पद धारण करता है, परंतु वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है। इसका अर्थ यह है कि राज्यपाल को निश्चित और सुरक्षित कार्यकाल का अधिकार नहीं होता तथा राष्ट्रपति जब चाहे उसे पद से हटा सकता है।
- (b) अनुच्छेद 155 : अनुच्छेद 155 राज्यपाल की नियुक्ति से संबंधित है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रपति राज्यपाल की नियुक्ति करता है। राज्यपाल को हटाने का प्रावधान अनुच्छेद 156 के अंतर्गत राष्ट्रपति के प्रसाद सिद्धांत पर आधारित है। अतः अनुच्छेद 155 को राज्यपाल को हटाना से जोड़ना गलत है।
- (c) अनुच्छेद 153 : अनुच्छेद 153 यह निर्धारित करता है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। यह अनुच्छेद राज्यपाल के पद के अस्तित्व और अनिवार्यता को स्थापित करता है। सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 के बाद यह भी स्पष्ट हो गया कि एक ही व्यक्ति एक से अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है।
- (d) अनुच्छेद 154 : अनुच्छेद 154 के अनुसार राज्य की कार्यकारी शक्ति राज्यपाल में निहित होती है। व्यवहार में इस शक्ति का प्रयोग राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से करता है, जैसा कि अनुच्छेद 163 में प्रावधान है।
- सहमति की आयु अधिनियम, 1891 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह बंबई के एक पारसी सुधारक बेहरामजी मालाबारी थे, जिन्होंने इस कानून की वकालत की थी।
- इस अधिनियम को बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व वाली चरमपंथी शाखा ने समर्थन दिया था।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं ?
(a) 1 और 2 दोनों
(b) केवल 1
(c) केवल 2
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b)
व्याख्या:
- सहमति की आयु अधिनियम, 1891 औपनिवेशिक भारत में सामाजिक सुधारों से संबंधित एक अत्यंत विवादास्पद कानून था। इस अधिनियम का उद्देश्य बाल-विवाह और बालिकाओं के शारीरिक शोषण को रोकना था। इसके अंतर्गत विवाहिता लड़की के साथ सहमति की आयु को 10 वर्ष से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दिया गया। यद्यपि यह परिवर्तन आज के मानकों से सीमित प्रतीत होता है, किंतु उस समय यह भारतीय समाज की रूढ़िगत परंपराओं में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप माना गया।
- कथन 1 में कहा गया है कि इस कानून की वकालत बंबई के एक पारसी सुधारक बेहरामजी मालाबारी ने की थी। यह कथन सही है। बेहरामजी मालाबारी उन्नीसवीं शताब्दी के प्रमुख सामाजिक सुधारकों में से थे, जिन्होंने बाल-विवाह, बालिकाओं की अल्प आयु में वैवाहिक सहवास और महिलाओं की दयनीय स्थिति के विरुद्ध सशक्त अभियान चलाया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार, भारतीय नेताओं और प्रेस के माध्यम से यह तर्क दिया कि अत्यल्प आयु की बालिकाओं के साथ वैवाहिक संबंध न केवल अमानवीय हैं, बल्कि स्वास्थ्य और नैतिकता—दोनों के लिए घातक हैं। उनके प्रयासों और सार्वजनिक दबाव के परिणामस्वरूप ही 1891 का सहमति की आयु अधिनियम अस्तित्व में आया।
- कथन 2 में यह कहा गया है कि इस अधिनियम को बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व वाली चरमपंथी शाखा ने समर्थन दिया था। यह कथन गलत है। वास्तव में, तिलक और उनके समर्थकों ने इस कानून का तीव्र विरोध किया था। तिलक का तर्क था कि विवाह और पारिवारिक जीवन जैसे विषय धार्मिक और सामाजिक परंपराओं के अंतर्गत आते हैं, जिनमें औपनिवेशिक सरकार को हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने इसे भारतीय समाज पर पश्चिमी नैतिक मूल्यों को थोपने का प्रयास माना और इसे स्वराज्य तथा सांस्कृतिक स्वायत्तता के विरुद्ध बताया। तिलक का यह विरोध सामाजिक सुधार के विरुद्ध नहीं, बल्कि विदेशी शासन द्वारा किए जा रहे हस्तक्षेप के विरुद्ध था।
- उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय समाज में सामाजिक सुधार बनाम सांस्कृतिक स्वायत्तता की बहस गहराई से मौजूद थी। जहाँ एक ओर उदारवादी और समाज-सुधारक वर्ग सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने के लिए कानूनी हस्तक्षेप का समर्थन कर रहा था, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रवादी चरमपंथी वर्ग इसे औपनिवेशिक दखल के रूप में देख रहा था। यही कारण है कि सहमति की आयु अधिनियम ने भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के भीतर वैचारिक विभाजन को भी उजागर किया।
- नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें से एक को अभिकथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
अभिकथन (A) : शिवाजी को बड़े देशमुखों के विरोध का सामना करना पड़ा।
कारण (R) : ये देशमुख स्वतंत्र मराठा राज्य के पक्ष में नहीं थे और बीजापुर के सामंत ही बने रहना चाहते थे।
नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :
(a) (A) सही है, किन्तु (R) गलत है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
(c) (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
(d) (A) गलत है, किन्तु (R) सही है।
उत्तर: (c )
व्याख्या:
- अभिकथन (A) यह कहता है कि शिवाजी को बड़े देशमुखों के विरोध का सामना करना पड़ा। ऐतिहासिक रूप से देशमुख मराठा समाज में बड़े भू-स्वामी, स्थानीय राजस्व संग्राहक और सैन्य संसाधनों के स्वामी थे। वे प्रायः बीजापुर सल्तनत के अधीन सामंती पदों पर कार्यरत थे। जब शिवाजी ने स्वराज्य की स्थापना और एक स्वतंत्र मराठा राज्य के निर्माण का प्रयास किया, तो कई बड़े देशमुखों ने इसका विरोध किया। इसका मुख्य कारण यह था कि शिवाजी की केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था, प्रत्यक्ष राजस्व नीति और किलों पर शाही नियंत्रण से देशमुखों की पारंपरिक स्वायत्तता और विशेषाधिकारों को चुनौती मिलती थी। इसलिए अभिकथन (A) सही है।
- कारण (R) में कहा गया है कि ये देशमुख स्वतंत्र मराठा राज्य के पक्ष में नहीं थे और बीजापुर के सामंत बने रहना चाहते थे। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से स्पष्ट है कि अधिकांश बड़े देशमुखों को बीजापुर सल्तनत से जागीरें, पद और संरक्षण प्राप्त था। उन्हें आशंका थी कि एक स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना के बाद शिवाजी उनके अधिकारों को सीमित कर देंगे। शिवाजी राज्य-निष्ठा, प्रत्यक्ष शासकीय नियंत्रण तथा सैन्य और राजस्व सुधारों पर बल देते थे, जबकि देशमुख सामंती स्वायत्तता और पुराने शक्ति-संतुलन को बनाए रखना चाहते थे। इस कारण (R) भी सही है।
- क्योंकि बड़े देशमुख स्वतंत्र मराठा राज्य के समर्थक नहीं थे और बीजापुर के अधीन बने रहना चाहते थे, इसलिए उन्होंने शिवाजी के स्वराज्य आंदोलन का विरोध किया। इस प्रकार कारण (R), अभिकथन (A) की व्याख्या भी करता है।
- अंडमान तथा निकोबार द्वीपसमूह में निम्नलिखित में से किस कारण से प्रलयकारी प्रवाल विरंजन हुआ तथा प्रवालों की सामूहिक मृत्यु हो गई थी ?
(a) हिंद महासागर में तापमान में 4°C की कमी
(b) भारी सागरीय प्रदूषण
(c) तटीय क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों में वृद्धि
(d) हिंद महासागर के तापमान में 2°C की वृद्धि
उत्तर : (d)
व्याख्या:
- प्रवाल विरंजन : प्रवाल समुद्री जीव हैं जो अपने ऊतकों में जूजैन्थेला नामक सूक्ष्म सहजीवी शैवाल के साथ रहते हैं। ये शैवाल प्रकाश-संश्लेषण द्वारा प्रवालों को भोजन, रंग और ऊर्जा प्रदान करते हैं, जबकि प्रवाल उन्हें आश्रय और पोषक तत्व देते हैं। यह सहजीविता प्रवाल भित्तियों के अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक है।
- प्रवाल विरंजन की प्रक्रिया: जब समुद्री जल का तापमान सामान्य से लगभग 1–2 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जाता है और यह स्थिति कुछ सप्ताह तक बनी रहती है, तो प्रवाल तापीय तनाव में आ जाते हैं। इस तनाव के कारण वे अपने सहजीवी शैवाल को बाहर निकाल देते हैं, जिससे उनका रंग समाप्त हो जाता है और वे सफेद दिखाई देने लगते हैं। यदि तापमान शीघ्र सामान्य स्तर पर न लौटे, तो प्रवालों की मृत्यु भी हो सकती है।
- अंडमान–निकोबार में प्रवाल विरंजन: वर्ष 1998 और 2010 में हिंद महासागर में एल-नीनो जैसी घटनाओं के कारण समुद्री सतह के तापमान में लगभग 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई। इसके परिणामस्वरूप अंडमान–निकोबार द्वीपसमूह की प्रवाल भित्तियों में व्यापक स्तर पर प्रवाल विरंजन हुआ और कई क्षेत्रों में 70 से 90 प्रतिशत तक प्रवाल क्षति देखी गई।
- हिंद महासागर में तापमान में 4 डिग्री सेल्सियस की कमी प्रवाल विरंजन का कारण नहीं हो सकती। प्रवाल अत्यधिक ठंडे जल से नहीं, बल्कि अत्यधिक गर्म जल से प्रभावित होते हैं। सामान्यतः उष्णकटिबंधीय प्रवाल 23 से 29 डिग्री सेल्सियस तापमान में विकसित होते हैं। इसलिए विकल्प (a) गलत है।
- भारी सागरीय प्रदूषण प्रवालों के लिए हानिकारक अवश्य है, किंतु यह व्यापक प्रवाल विरंजन का प्राथमिक कारण नहीं है। प्रदूषण केवल सहायक या द्वितीयक कारक के रूप में कार्य करता है। अतः विकल्प (b) भी सही नहीं है।
- तटीय क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों में वृद्धि से स्थानीय स्तर पर प्रवाल भित्तियों को नुकसान हो सकता है, जैसे ड्रेजिंग या बंदरगाह निर्माण के कारण। किंतु अंडमान–निकोबार में देखा गया व्यापक और एकसमान प्रवाल विरंजन केवल औद्योगिक गतिविधियों से नहीं समझाया जा सकता। इसलिए विकल्प (c) भी सही नहीं है।
- हिंद महासागर के तापमान में लगभग 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि प्रवाल विरंजन का प्रमुख, प्रत्यक्ष और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित कारण है। यह वृद्धि जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन और एल-नीनो जैसी घटनाओं से जुड़ी है। अतः विकल्प (d) सही है।
- जलवायु परिवर्तन और प्रवाल भित्तियाँ: प्रवाल भित्तियाँ जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिक प्रणालियाँ हैं। आईपीसीसी के अनुसार यदि वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो 70–90 प्रतिशत प्रवाल भित्तियाँ नष्ट हो सकती हैं, जबकि 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पर 99 प्रतिशत से अधिक प्रवाल भित्तियों के समाप्त होने की आशंका है।
- अशोक के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- अशोक ने धम्म की जो परिभाषा दी है, वह “राहुलोवादसुत्त” से ली गई है।
- अपने राज्याभिषेक के 14वें वर्ष में अशोक ने धम्ममहामात्र नामक एक नवीन प्रकार के कर्मचारी की नियुक्ति की।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं ?
(a) केवल 2
(b) केवल 1
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: c
व्याख्या:
- कथन 1 सही नही है: राहुलोवादसुत्त पालि बौद्ध साहित्य का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें सत्यवाद, आत्मसंयम और नैतिक अनुशासन पर बल दिया गया है। यह सही है कि अशोक की धम्म नीति बौद्ध नैतिक शिक्षाओं से प्रभावित थी, किंतु ऐतिहासिक रूप से ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि अशोक ने अपने शिलालेखों में धम्म की परिभाषा को किसी विशिष्ट बौद्ध सुत्त, विशेषकर राहुलोवादसुत्त, से सीधे ग्रहण किया हो। अशोक का धम्म मूलतः एक सार्वजनिक और व्यावहारिक नैतिक संहिता थी, जो राज्य के सभी प्रजाजनों के लिए समान रूप से लागू थी। इसमें माता–पिता और गुरुओं का सम्मान, अहिंसा, सहिष्णुता, दया और करुणा जैसे सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों पर बल दिया गया था। यह नीति संप्रदाय-निरपेक्ष थी और किसी एक धार्मिक ग्रंथ का प्रत्यक्ष अनुप्रयोग नहीं थी। इसलिए कथन 1 तथ्यात्मक रूप से गलत है।
- कथन 2 सही है: कथन 2 में कहा गया है कि अपने राज्याभिषेक के 14वें वर्ष में अशोक ने धम्ममहामात्र नामक एक नवीन प्रकार के अधिकारी की नियुक्ति की। यह कथन ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित है। अशोक के प्रमुख शिलालेखों से ज्ञात होता है कि उसने अपने शासनकाल के लगभग 13वें–14वें वर्ष के आसपास धम्ममहामात्रों की नियुक्ति की थी। धम्ममहामात्रों का प्रमुख कार्य धम्म के प्रचार–प्रसार, नैतिक आचरण की निगरानी तथा स्त्रियों, वृद्धों, बंदियों और समाज के कमजोर वर्गों के कल्याण से संबंधित था। यह मौर्य प्रशासन में एक नया और विशिष्ट पद था, जो अशोक की नैतिक एवं कल्याणकारी नीति को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए बनाया गया था। अतः कथन 2 सही है।

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